महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 427, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मणास्तपसा सर्वे सिध्यन्ते वाग्बलाः सदा । भुजवीर्याश्च राजानो वागस्त्राश्च द्विजातयः ॥ १३ ॥ चन्द्रमाने कहा— दानवराज! सम्पूर्ण ब्राह्मण तपस्यासे ही सिद्ध हुए हैं। इनका बल सदा इनकी वाणीमें ही होता है। राजाओंका बल उनकी भुजाएँ हैं और ब्राह्मणोंका बल उनकी वाणी ॥ १३ ॥
प्रणवं चाप्यधीयीत ब्राह्मीर्दुर्वसतीर्वसन् । निर्मन्युरपि निर्वाणो यदि स्यात् समदर्शनः ॥ १४ ॥ पहले गुरुके घरमें ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए क्लेश-सहनपूर्वक निवास करके प्रणवसहित वेदका अध्ययन करना चाहिये। फिर अन्तमें क्रोध त्यागकर शान्तभावसे संन्यास ग्रहण करना चाहिये। यदि संन्यासी हो तो सर्वत्र समान दृष्टि रखे ॥ १४ ॥
अपि च ज्ञानसम्पन्नः सर्वान् वेदान् पितुर्गृहे । श्लाघमान इवाधीयाद् ग्राम्य इत्येव तं विदुः ॥ १५ ॥ जो सम्पूर्ण वेदोंको पिताके घरमें रहकर पढ़ता है वह ज्ञानसम्पन्न और प्रशंसनीय होनेपर भी विद्वानोंके द्वारा ग्रामीण (गँवार) ही समझा जाता है। (वास्तवमें गुरुके घरमें क्लेश-सहनपूर्वक रहकर वेद पढ़नेवाला ही श्रेष्ठ है) ॥ १५ ॥
भूमिरेतौ निगिरति सर्पो बिलशयानिव । राजानं चाप्ययोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम् ॥ १६ ॥ जैसे साँप बिलमें रहनेवाले छोटे जीवोंको निगल जाता है, उसी प्रकार युद्ध न करनेवाले क्षत्रिय और विद्याके लिये प्रवास न करनेवाले ब्राह्मणको यह पृथ्वी निगल जाती है ॥ १६ ॥
अभिमानः श्रियं हन्ति पुरुषस्याल्पमेधसः । गर्भेण दुष्यते कन्या गृहवासेन च द्विजः ॥ १७ ॥ मन्दबुद्धि पुरुषके भीतर जो अभिमान होता है वह उसकी लक्ष्मीका नाश करता है। गर्भ धारण करनेसे कन्या दूषित हो जाती है और सदा घरमें रहनेसे ब्राह्मण दूषित समझे जाते हैं ॥ १७ ॥
(विद्याविदो लोकविदः तपोबलसमन्विताः । नित्यपूज्याश्च वन्द्याश्च द्विजा लोकद्वयेच्छुभिः ॥) जो इहलोक और परलोक दोनोंको सुधारना चाहते हों, उन्हें विद्वान्, लौकिक बातोंके ज्ञाता, तपस्वी और शक्तिशाली ब्राह्मणोंकी सदा पूजा और वन्दना करनी चाहिये ॥
इत्येतन्मे पिता श्रुत्वा सोमादद्भुतदर्शनात् । ब्राह्मणान् पूजयामास तथैवाहं महाव्रतान् ॥ १८ ॥ अद्भुत दर्शनवाले चन्द्रमासे यह बात सुनकर मेरे पिताजीने महान् व्रतधारी ब्राह्मणोंका पूजन किया। वैसे ही मैं भी करता हूँ ॥ १८ ॥