महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाक्षात् देवताओंने सनातनकालसे मेरे लिये जो खाद्य नियत कर दिया है वही मुझे मिलना चाहिये। प्राचीनकालसे लोग इस बातको जानते हैं कि बाज कबूतर खाते हैं ।। २१ ।।
उशीनर कपोते तु यदि स्नेहस्तवानघ । ततस्त्वं मे प्रयच्छाद्य स्वमांसं तुलया धृतम् ।। २२ ।। निष्पाप महाराज उशीनर! यदि आपको इस कबूतरपर बड़ा स्नेह है तो आप मुझे इसके बराबर अपना ही मांस तराजूपर तौलकर दे दीजिये ।। २२ ।।
राजोवाच
महाननुग्रहो मेऽद्य यस्त्वमेवमिहात्थ माम् । बाढमेव करिष्यामीत्युक्त्वासौ राजसत्तमः ।। २३ ।। उत्कृत्योत्कृत्य मांसानि तुलया समतोलयत् । राजाने कहा—'बाज! तुमने ऐसी बात कहकर मुझपर बड़ा अनुग्रह किया। बहुत अच्छा, मैं ऐसा ही करूँगा।' यों कहकर नृपश्रेष्ठ उशीनरने अपना मांस काट-काटकर तराजूपर रखना आरम्भ किया ।। २३ १/२ ।।
अन्तःपुरे ततस्तस्य स्त्रियो रत्नविभूषिताः ।। २४ ।। हाहाभूता विनिष्क्रान्ताः श्रुत्वा परमदुःखिताः । यह समाचार सुनकर अन्तःपुरकी रत्नविभूषित रानियाँ बहुत दुःखी हुईं और हाहाकार करती हुई बाहर निकल आयीं ।। २४ १/२ ।।
तासां रुदितशब्देन मन्त्रिभृत्यजनस्य च ।। २५ ।। बभूव सुमहान् नादो मेघगम्भीरनिःस्वनः । उनके रोनेके शब्दसे तथा मन्त्रियों और भृत्यजनोंके हाहाकारसे मेघकी गम्भीर गर्जनाके समान वहाँ बड़ा भारी कोलाहल मच गया ।। २५ १/२ ।।
निरुद्धं गगनं सर्वं शुभ्रं मेघैः समन्ततः ।। २६ ।। मही प्रचलिता चासीत् तस्य सत्येन कर्मणा । सारा शुभ्र आकाश सब ओरसे मेघोंद्वारा आच्छादित हो गया। उनके सत्यकर्मके प्रभावसे पृथ्वी काँपने लगी ।। २६ १/२ ।।
स राजा पार्श्वतश्चैव बाहुभ्यामूरुतश्च यत् ।। २७ ।। तानि मांसानि संच्छिद्य तुलां पूरयतेऽशनैः । तथापि न समस्तेन कपोतेन बभूव ह ।। २८ ।। राजा अपनी पसलियों, भुजाओं और जाँघोंसे मांस काटकर जल्दी-जल्दी तराजू भरने लगे। तथापि वह मांसराशि उस कबूतरके बराबर नहीं हुई ।। २७-२८ ।।
अस्थिभूतो यदा राजा निर्मांसो रुधिरस्रवः ।