भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 429, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 429

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सप्तत्रिंशोऽध्यायः

दानपात्रकी परीक्षा

युधिष्ठिर उवाच

अपूर्वश्च भवेत् पात्रमथवापि चिरोषितः ।
दूरादभ्यागतं चापि किं पात्रं स्यात् पितामह ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! दानका पात्र कौन होता है? अपरिचित पुरुष या बहुत दिनोंतक अपने साथ रहा हुआ पुरुष। अथवा किसी दूर देशसे आया हुआ मनुष्य? इनमेंसे किसको दानका उत्तम पात्र समझना चाहिये? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

क्रिया भवति केषांचिदुपांशुव्रतमुत्तमम् ।
यो यो याचेत यत् किञ्चित् सर्वं दद्याम इत्यपि ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! कितने ही याचकोंका तो यज्ञ, गुरुदक्षिणा या कुटुम्बका भरण-पोषण आदि कार्य ही मनोरथ होता है और किन्हींका उत्तम मौनव्रतसे रहकर निर्वाह करना प्रयोजन होता है। इनमेंसे जो-जो याचक जिस किसी वस्तुकी याचना करे उन सबके लिये यही कहना चाहिये कि 'हम देंगे' (किसीको निराश नहीं करना चाहिये) ॥ २ ॥

अपीडयन् भृत्यवर्गमित्येवमनुशुश्रुम ।
पीडयन् भृत्यवर्गं हि आत्मानमपकर्षति ॥ ३ ॥

परंतु हमने सुना है कि 'जिनके भरण-पोषणका अपने ऊपर भार है उस समुदायको कष्ट दिये बिना ही दाताको दान करना चाहिये। जो पोष्यवर्गको कष्ट देकर या भूखे मारकर दान करता है वह अपने आपको नीचे गिराता है' ॥ ३ ॥

अपूर्वं भावयेत् पात्रं यच्चापि स्याच्चिरोषितम् ।
दूरादभ्यागतं चापि तत्पात्रं च विदुर्बुधाः ॥ ४ ॥

इस दृष्टिसे विचार करनेपर जो पहलेसे परिचित नहीं है या जो चिरकालसे साथ रह चुका है, अथवा जो दूर देशसे आया हुआ है—इन तीनोंको ही विद्वान् पुरुष दान-पात्र समझते हैं ॥ ४ ॥

युधिष्ठिर उवाच

अपीडया च भूतानां धर्मस्याहिंसया तथा ।
पात्रं विद्यात् तु तत्त्वेन यस्मै दत्तं न संतपेत् ॥ ५ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! किसी प्राणीको पीड़ा न दी जाय और धर्ममें भी बाधा न आने पाये, इस प्रकार दान देना उचित है; परंतु पात्रकी यथार्थ पहचान कैसे हो? जिससे