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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

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सप्तत्रिंशोऽध्यायः

दानपात्रकी परीक्षा

युधिष्ठिर उवाच

अपूर्वश्च भवेत् पात्रमथवापि चिरोषितः ।
दूरादभ्यागतं चापि किं पात्रं स्यात् पितामह ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! दानका पात्र कौन होता है? अपरिचित पुरुष या बहुत दिनोंतक अपने साथ रहा हुआ पुरुष। अथवा किसी दूर देशसे आया हुआ मनुष्य? इनमेंसे किसको दानका उत्तम पात्र समझना चाहिये? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

क्रिया भवति केषांचिदुपांशुव्रतमुत्तमम् ।
यो यो याचेत यत् किञ्चित् सर्वं दद्याम इत्यपि ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! कितने ही याचकोंका तो यज्ञ, गुरुदक्षिणा या कुटुम्बका भरण-पोषण आदि कार्य ही मनोरथ होता है और किन्हींका उत्तम मौनव्रतसे रहकर निर्वाह करना प्रयोजन होता है। इनमेंसे जो-जो याचक जिस किसी वस्तुकी याचना करे उन सबके लिये यही कहना चाहिये कि 'हम देंगे' (किसीको निराश नहीं करना चाहिये) ॥ २ ॥

अपीडयन् भृत्यवर्गमित्येवमनुशुश्रुम ।
पीडयन् भृत्यवर्गं हि आत्मानमपकर्षति ॥ ३ ॥

परंतु हमने सुना है कि 'जिनके भरण-पोषणका अपने ऊपर भार है उस समुदायको कष्ट दिये बिना ही दाताको दान करना चाहिये। जो पोष्यवर्गको कष्ट देकर या भूखे मारकर दान करता है वह अपने आपको नीचे गिराता है' ॥ ३ ॥

अपूर्वं भावयेत् पात्रं यच्चापि स्याच्चिरोषितम् ।
दूरादभ्यागतं चापि तत्पात्रं च विदुर्बुधाः ॥ ४ ॥

इस दृष्टिसे विचार करनेपर जो पहलेसे परिचित नहीं है या जो चिरकालसे साथ रह चुका है, अथवा जो दूर देशसे आया हुआ है—इन तीनोंको ही विद्वान् पुरुष दान-पात्र समझते हैं ॥ ४ ॥

युधिष्ठिर उवाच

अपीडया च भूतानां धर्मस्याहिंसया तथा ।
पात्रं विद्यात् तु तत्त्वेन यस्मै दत्तं न संतपेत् ॥ ५ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! किसी प्राणीको पीड़ा न दी जाय और धर्ममें भी बाधा न आने पाये, इस प्रकार दान देना उचित है; परंतु पात्रकी यथार्थ पहचान कैसे हो? जिससे

दिया हुआ दान पीछे संतापका कारण न बने ॥ ५ ॥

भीष्म उवाच

ऋत्विक् पुरोहिताचार्याः शिष्यसम्बन्धिबान्धवाः । सर्वे पूज्याश्च मान्याश्च श्रुतवन्तोऽनसूयकाः ॥ ६ ॥ **भीष्मजीने कहा—**बेटा! ऋत्विक्, पुरोहित, आचार्य, शिष्य, सम्बन्धी, बान्धव, विद्वान् और दोष-दृष्टिसे रहित पुरुष—ये सभी पूजनीय और माननीय हैं ॥ ६ ॥

अतोऽन्यथा वर्तमानाः सर्वे नार्हन्ति सत्क्रियाम् । तस्मान्नित्यं परीक्षेत पुरुषान् प्रणिधाय वै ॥ ७ ॥ इनसे भिन्न प्रकारके तथा भिन्न बर्ताववाले जो लोग हैं, वे सब सत्कारके पात्र नहीं हैं; अतः एकाग्रचित्त होकर प्रतिदिन सुपात्र पुरुषोंकी परीक्षा करनी चाहिये ॥

अक्रोधः सत्यवचनमहिंसा दम आर्जवम् । अद्रोहोऽनभिमानश्च ह्रीस्तितिक्षा दमः शमः ॥ ८ ॥ यस्मिन्नेतानि दृश्यन्ते न चाकार्याणि भारत । स्वभावतो निविष्टानि तत्पात्रं मानमर्हति ॥ ९ ॥ भारत! क्रोधका अभाव, सत्य-भाषण, अहिंसा, इन्द्रियसंयम, सरलता, द्रोहहीनता, अभिमानशून्यता, लज्जा, सहनशीलता, दम और मनोनिग्रह—ये गुण जिनमें स्वभावतः दिखायी दें और धर्मविरुद्ध कार्य दृष्टिगोचर न हों, वे ही दानके उत्तम पात्र और सम्मानके अधिकारी हैं ॥ ८-९ ॥

तथा चिरोषितं चापि सम्प्रत्यागतमेव च । अपूर्वं चैव पूर्वं च तत्पात्रं मानमर्हति ॥ १० ॥ जो पुरुष बहुत दिनोंतक अपने साथ रहा हो, एवं जो कहींसे तत्काल आया हो, वह पहलेका परिचित हो या अपरिचित, वह दानका पात्र और सम्मानका अधिकारी है ॥ १० ॥

अप्रामाण्यं च वेदानां शास्त्राणां चाभिलङ्घनम् । अव्यवस्था च सर्वत्र एतान्नाशनमात्मनः ॥ ११ ॥ वेदोंको अप्रामाणिक मानना, शास्त्रकी आज्ञाका उल्लङ्घन करना तथा सर्वत्र अव्यवस्था फैलाना—ये सब अपना ही नाश करनेवाले हैं ॥ ११ ॥

भवेत् पण्डितमानी यो ब्राह्मणो वेदनिन्दकः । आन्वीक्षिकीं तर्कविद्यामनुरक्तो निरर्थिकाम् ॥ १२ ॥ हेतुवादान् ब्रुवन् सत्सु विजेताहेतुवादिकः । आक्रोष्टा चातिवक्ता च ब्राह्मणानां सदैव हि ॥ १३ ॥ सर्वाभिशङ्की मूढश्च बालः कटुकवागपि ।

बोद्धव्यस्तादृशस्तात नरं श्वानं हि तं विदुः ॥ १४ ॥
जो ब्राह्मण अपने पाण्डित्यका अभिमान करके व्यर्थके तर्कका आश्रय लेकर वेदोंकी निन्दा करता है, आन्वीक्षिकी निरर्थक तर्कविद्यामें अनुराग रखता है, सत्पुरुषोंकी सभामें कोरी तर्ककी बातें कहकर विजय पाता, शास्त्रानुकूल युक्तियोंका प्रतिपादन नहीं करता, जोर-जोरसे हल्ला मचाता और ब्राह्मणोंके प्रति सदा अतिवाद (अमर्यादित वचन)-का प्रयोग करता है, जो सबपर संदेह करता है, जो बालकों और मूर्खोंका-सा व्यवहार करता तथा कटुवचन बोलता है, तात! ऐसे मनुष्यको अस्पृश्य समझना चाहिये। विद्वान् पुरुषोंने ऐसे पुरुषको कुत्ता माना है ॥ १२—१४ ॥
यथा श्वा भषितुं चैव हन्तुं चैवावसज्जते ।
एवं सम्भाषणार्थाय सर्वशास्त्रवधाय च ॥ १५ ॥
जैसे कुत्ता भौंकने और काटनेके लिये निकट आ जाता है, उसी प्रकार वह बहस करने और शास्त्रोंका खण्डन करनेके लिये इधर-उधर दौड़ता-फिरता है (ऐसा व्यक्ति दानका पात्र नहीं है) ॥ १५ ॥
लोकयात्रा च द्रष्टव्या धर्मश्चात्महितानि च ।
एवं नरो वर्तमानः शाश्वतीर्वर्धते समाः ॥ १६ ॥
मनुष्यको जगत्के व्यवहारपर दृष्टि डालनी चाहिये। धर्म और अपने कल्याणके उपायोंपर भी विचार करना चाहिये। ऐसा करनेवाला मनुष्य सदा ही अभ्युदयशील होता है ॥ १६ ॥
ऋणमुन्मुच्य देवानाम्ऋषीणां च तथैव च ।
पितॄणामथ विप्राणामतिथीनां च पञ्चमम् ॥ १७ ॥
पर्यायेण विशुद्धेन सुविनीतेन कर्मणा ।
एवं गृहस्थः कर्माणि कुर्वन् धर्मान्न हीयते ॥ १८ ॥
जो यज्ञ-यागादि करके देवताओंके ऋणसे, वेदोंका स्वाध्याय करके ऋषियोंके ऋणसे, श्रेष्ठ पुत्रकी उत्पत्ति तथा श्राद्ध करके पितरोंके ऋणसे, दान देकर ब्राह्मणोंके ऋणसे और आतिथ्य सत्कार करके अतिथियोंके ऋणसे मुक्त होता है तथा क्रमशः विशुद्ध और विनययुक्त प्रयत्नसे शास्त्रोक्त कर्मोंका अनुष्ठान करता है, वह गृहस्थ कभी धर्मसे भ्रष्ट नहीं होता ॥ १७-१८ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पात्रपरीक्षायां सप्तत्रिंशोऽध्यायः
॥ ३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें पात्रकी परीक्षाविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥

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अष्टत्रिंशोऽध्यायः

पञ्चचूड़ा अप्सराका नारदजीसे स्त्रियोंके दोषोंका वर्णन करना

युधिष्ठिर उवाच

स्त्रीणां स्वभावमिच्छामि श्रोतुं भरतसत्तम ।
स्त्रियो हि मूलं दोषाणां लघुचित्ता हि ताः स्मृताः ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**भरतश्रेष्ठ! मैं स्त्रियोंके स्वभावका वर्णन सुनना चाहता हूँ; क्योंकि सारे दोषोंकी जड़ स्त्रियाँ ही हैं। वे ओछी बुद्धिवाली मानी गयी हैं ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
नारदस्य च संवादं पुंश्चल्या पञ्चचूडया ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! इस विषयमें देवर्षि नारदका अप्सरा पञ्चचूड़ाके साथ जो संवाद हुआ था, उसी प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ २ ॥

लोकाननुचरन् सर्वान् देवर्षिर्नारदः पुरा ।
ददर्शाप्सरसं ब्राह्मीं पञ्चचूडामनिन्दिताम् ॥ ३ ॥
पहलेकी बात है, सम्पूर्ण लोकोंमें विचरते हुए देवर्षि नारदने एक दिन ब्रह्मलोककी अनिन्द्य सुन्दरी अप्सरा पञ्चचूड़ाको देखा ॥ ३ ॥

तां दृष्ट्वा चारुसर्वाङ्गीं पप्रच्छाप्सरसं मुनिः ।
संशयो हृदि कश्चिन्मे ब्रूहि तन्मे सुमध्यमे ॥ ४ ॥
मनोहर अंगोंसे युक्त उस अप्सराको देखकर मुनिने उसके सामने अपना प्रश्न रखा—‘सुमध्यमे! मेरे हृदयमें एक महान् संदेह है। उसके विषयमें मुझे यथार्थ बात बताओ’ ॥ ४ ॥

भीष्म उवाच

एवमुक्ताथ सा विप्रं प्रत्युवाचाथ नारदम् ।
विषये सति वक्ष्यामि समर्थं मन्यसे च माम् ॥ ५ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! नारदजीके ऐसा कहनेपर पंचचूड़ा अप्सराने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया—‘यदि आप मुझे उस प्रश्नका उत्तर देनेके योग्य मानते हैं और वह बताने योग्य है तो अवश्य बताऊँगी’ ॥ ५ ॥

नारद उवाच

न त्वामविषये भद्रे नियोक्ष्यामि कथंचन ।
स्त्रीणां स्वभावमिच्छामि त्वत्तः श्रोतुं वरानने ॥ ६ ॥
नारदजीने कहा— भद्रे! मैं तुम्हें ऐसी बात बतानेके लिये नहीं कहूँगा जो कहने योग्य न हो; अथवा तुम्हारा विषय न हो। सुमुखि! मैं तुम्हारे मुँहसे स्त्रियोंके स्वभावका वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ ६ ॥

भीष्म उवाच

एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य देवर्षेरप्सरोत्तमा ।
प्रत्युवाच न शक्ष्यामि स्त्री सती निन्दितुं स्त्रियः ॥ ७ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! नारदजीका यह वचन सुनकर वह उत्तम अप्सरा बोली—‘देवर्षे! मैं स्त्री होकर स्त्रियोंकी निन्दा नहीं कर सकती ॥ ७ ॥
विदितास्ते स्त्रियो याश्च यादृशाश्च स्वभावतः ।
न मामर्हसि देवर्षे नियोक्तुं कार्य ईदृशे ॥ ८ ॥
‘संसारमें जैसी स्त्रियाँ हैं और उनके जैसे स्वभाव हैं, वे सब आपको विदित हैं; अतः देवर्षे! आप मुझे ऐसे कार्यमें न लगावें' ॥ ८ ॥
तामुवाच स देवर्षिः सत्यं वद सुमध्यमे ।
मृषावादे भवेद् दोषः सत्ये दोषो न विद्यते ॥ ९ ॥
तब देवर्षिने उससे कहा—‘सुमध्यमे! तुम सच्ची बात बताओ। झूठ बोलनेमें दोष लगता है। सच कहनेमें कोई दोष नहीं है' ॥ ९ ॥
इत्युक्ता सा कृतमतिरभवच्चारुहासिनी ।
स्त्रीदोषान् शाश्वतान् सत्यान् भाषितुं सम्प्रचक्रमे ॥ १० ॥
उनके इस प्रकार समझानेपर उस मनोहर हास्यवाली अप्सराने कहनेके लिये दृढ़ निश्चय करके स्त्रियोंके सच्चे और स्वाभाविक दोषोंको बताना आरम्भ किया ॥ १० ॥

पञ्चचूडोवाच

कुलीना रूपवत्यश्च नाथवत्यश्च योषितः ।
मर्यादासु न तिष्ठन्ति स दोषः स्त्रीषु नारद ॥ ११ ॥
पंचचूड़ा बोली— नारदजी! कुलीन, रूपवती और सनाथ युवतियाँ भी मर्यादाके भीतर नहीं रहती हैं। यह स्त्रियोंका दोष है ॥ ११ ॥
न स्त्रीभ्यः किञ्चिदन्यद् वै पापीयस्तरमस्ति वै ।
स्त्रियो हि मूलं दोषाणां तथा त्वमपि वेत्थ ह ॥ १२ ॥
स्त्रियोंसे बढ़कर पापिष्ठ दूसरा कोई नहीं है। स्त्रियाँ सारे दोषोंकी जड़ हैं, इस बातको आप भी अच्छी तरह जानते हैं ॥ १२ ॥
समाज्ञातान्ॠद्धिमतः प्रतिरूपान् वशे स्थितान् ।

पतीनन्तरमासाद्य नालं नार्यः प्रतीक्षितुम् ॥ १३ ॥ यदि स्त्रियोंको दूसरोंसे मिलनेका अवसर मिल जाय तो वे सद्गुणोंमें विख्यात, धनवान्, अनुपम रूप-सौन्दर्यशाली तथा अपने वशमें रहनेवाले पतियोंकी भी प्रतीक्षा नहीं कर सकतीं ॥ १३ ॥

असद्धर्मस्त्वयं स्त्रीणामस्माकं भवति प्रभो । पापीयसो नरान् यद् वै लज्जां त्यक्त्वा भजामहे ॥ १४ ॥ प्रभो! हम स्त्रियोंमें यह सबसे बड़ा पातक है कि हम पापीसे पापी पुरुषोंको भी लाज छोड़कर स्वीकार कर लेती हैं ॥ १४ ॥

स्त्रियं हि यः प्रार्थयते संनिकर्षं च गच्छति । ईषच्च कुरुते सेवां तमेवेच्छन्ति योषितः ॥ १५ ॥ जो पुरुष किसी स्त्रीको चाहता है, उसके निकटतक पहुँचता है और उसकी थोड़ी-सी सेवा कर देता है, उसीको वे युवतियाँ चाहने लगती हैं ॥ १५ ॥

अनर्थित्वान्मनुष्याणां भयात् परिजनस्य च । मर्यादायाममर्यादाः स्त्रियस्तिष्ठन्ति भर्तृषु ॥ १६ ॥ स्त्रियोंमें स्वयं मर्यादाका कोई ध्यान नहीं रहता। जब उनको कोई चाहनेवाला पुरुष न मिले और परिजनोंका भय बना रहे तथा पति पास हों, तभी ये नारियाँ मर्यादाके भीतर रह पाती हैं ॥ १६ ॥

नासां कश्चिदगम्योऽस्ति नासां वयसि निश्चयः । विरूपं रूपवन्तं वा पुमानित्येव भुञ्जते ॥ १७ ॥ इनके लिये कोई भी पुरुष ऐसा नहीं है जो अगम्य हो। उनका किसी अवस्था-विशेषपर भी निश्चय नहीं रहता। कोई रूपवान् हो या कुरूप; पुरुष है—इतना ही समझकर स्त्रियाँ उसका उपभोग करती हैं ॥ १७ ॥

न भयान्नाप्यनुक्रोशान्नार्थहेतोः कथंचन । न ज्ञातिकुलसम्बन्धात् स्त्रियस्तिष्ठन्ति भर्तृषु ॥ १८ ॥ स्त्रियाँ न तो भयसे, न दयासे, न धनके लोभसे और न जाति या कुलके सम्बन्धसे ही पतियोंके पास टिकती हैं ॥ १८ ॥

यौवने वर्तमानानां मृष्टाभरणवाससाम् । नारीणां स्वैरवृत्तीनां स्पृहयन्ति कुलस्त्रियः ॥ १९ ॥ जो जवान हैं, सुन्दर गहने और अच्छे कपड़े पहनती हैं, ऐसी स्वेच्छाचारिणी स्त्रियोंके चरित्रको देखकर कितनी ही कुलवती स्त्रियाँ भी वैसी ही बननेकी इच्छा करने लगती हैं ॥ १९ ॥

याश्च शश्वद् बहुमता रक्ष्यन्ते दयिताः स्त्रियः । अपि ताः सम्प्रसज्जन्ते कुब्जान्धजडवामनैः ॥ २० ॥

जो बहुत सम्मानित और पतिकी प्यारी स्त्रियाँ हैं, जिनकी सदा अच्छी तरह रखवाली की जाती है वे भी घरमें आने-जानेवाले कुबड़ों, अन्धों, गूँगों और बौनोंके साथ भी फँस जाती हैं ॥ २० ॥
पङ्गुष्वथ च देवर्षे ये चान्ये कुत्सिता नराः ।
स्त्रीणामगम्यो लोकेऽस्मिन् नास्ति कश्चिन्महामुने ॥ २१ ॥
महामुनि देवर्षे! जो पंगु हैं अथवा जो अत्यन्त घृणित मनुष्य हैं, उनमें भी स्त्रियोंकी आसक्ति हो जाती है। इस संसारमें कोई भी पुरुष स्त्रियोंके लिये अगम्य नहीं है ॥ २१ ॥
यदि पुंसां गतिर्ब्रह्मन् कथंचिन्नोपपद्यते ।
अप्यन्योन्यं प्रवर्तन्ते न हि तिष्ठन्ति भर्तृषु ॥ २२ ॥
ब्रह्मन्! यदि स्त्रियोंको पुरुषकी प्राप्ति किसी प्रकार भी सम्भव न हो और पति भी दूर गये हों तो वे आपसमें ही कृत्रिम उपायोंसे ही मैथुनमें प्रवृत्त हो जाती हैं ॥ २२ ॥
अलाभात् पुरुषाणां हि भयात् परिजनस्य च ।
वधबन्धभयाच्चापि स्वयं गुप्ता भवन्ति ताः ॥ २३ ॥
पुरुषोंके न मिलनेसे, घरके दूसरे लोगोंके भयसे तथा वध और बन्धनके डरसे ही स्त्रियाँ सुरक्षित रहती हैं ॥ २३ ॥
चलस्वभावा दुःसेव्या दुर्ग्राह्या भावतस्तथा ।
प्राज्ञस्य पुरुषस्येह यथा वाचस्तथा स्त्रियः ॥ २४ ॥
स्त्रियोंका स्वभाव चंचल होता है। उनका सेवन बहुत ही कठिन काम है। इनका भाव जल्दी किसीके समझमें नहीं आता; ठीक उसी तरह, जैसे विद्वान् पुरुषकी वाणी दुर्बोध होती है ॥ २४ ॥
नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां नापगानां महोदधिः ।
नान्तकः सर्वभूतानां न पुंसां वामलोचनाः ॥ २५ ॥
अग्नि कभी ईंधनसे तृप्त नहीं होती, समुद्र कभी नदियोंसे तृप्त नहीं होता, मृत्यु समस्त प्राणियोंको एक साथ पा जाय तो भी उनसे तृप्त नहीं होती; इसी प्रकार सुन्दर नेत्रोंवाली युवतियाँ पुरुषोंसे कभी तृप्त नहीं होतीं ॥ २५ ॥
इदमन्यच्च देवर्षे रहस्यं सर्वयोषिताम् ।
दृष्ट्वैव पुरुषं हृद्यं योनिः प्रक्लिद्यते स्त्रियाः ॥ २६ ॥
देवर्षे! सम्पूर्ण रमणियोंके सम्बन्धमें दूसरी भी रहस्यकी बात यह है कि किसी मनोरम पुरुषको देखते ही स्त्रीकी योनि गीली हो जाती है ॥ २६ ॥
कामानांमपि दातारं कर्तारं मनसां प्रियम् ।
रक्षितारं न मृष्यन्ति स्वभर्तारमलं स्त्रियः ॥ २७ ॥
सम्पूर्ण कामनाओंके दाता तथा मनचाही करनेवाला पति भी यदि उनकी रक्षामें तत्पर रहनेवाला हो तो वे अपने पतिके शासनको भी सहन नहीं कर सकतीं ॥ २७ ॥

न कामभोगान् विपुलान् नालंकारान् न संश्रयान् ।
तथैव बहु मन्यन्ते यथा रत्यामनुग्रहम् ॥ २८ ॥
वे न तो काम-भोगकी प्रचुर सामग्रीको, न अच्छे-अच्छे गहनोंको और न उत्तम घरोंको ही उतना अधिक महत्त्व देती हैं, जैसा कि रतिके लिये किये गये अनुग्रहको ॥ २८ ॥

अन्तकः पवनो मृत्युः पातालं वडवामुखम् ।
क्षुरधारा विषं सर्पो वह्निरित्येकतः स्त्रियः ॥ २९ ॥
यमराज, वायु, मृत्यु, पाताल, बड़वानल, छुरेकी धार, विष, सर्प और अग्नि—ये सब विनाशके हेतु एक तरफ और स्त्रियाँ अकेली एक तरफ बराबर हैं ॥ २९ ॥

यतश्च भूतानि महान्ति पञ्च
यतश्च लोका विहिता विधात्रा ।
यतः पुमांसः प्रमदाश्च निर्मिता-
स्तदैव दोषाः प्रमदासु नारद ॥ ३० ॥
नारद! जहाँसे पाँचों महाभूत उत्पन्न हुए हैं, जहाँसे विधाताने सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि की है तथा जहाँसे पुरुषों और स्त्रियोंका निर्माण हुआ है, वहींसे स्त्रियोंमें ये दोष भी रचे गये हैं (अर्थात् ये स्त्रियोंके स्वाभाविक दोष हैं) ॥ ३० ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पञ्चचूडानारदसंवादे अष्टत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें पंचचूड़ा और नारदका संवादविषयक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३८ ॥

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एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

स्त्रियोंकी रक्षाके विषयमें युधिष्ठिरका प्रश्न

युधिष्ठिर उवाच

इमे वै मानवा लोके स्त्रीषु सज्जन्त्यभीक्ष्णशः ।
मोहेन परमाविष्टा देवसृष्टेन पार्थिव ॥ १ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**पृथ्वीनाथ! संसारके ये मनुष्य विधाताद्वारा उत्पन्न किये गये महान् मोहेसे आविष्ट हो सदा ही स्त्रियोंमें आसक्त होते हैं ॥ १ ॥

स्त्रियश्च पुरुषेष्वेव प्रत्यक्षं लोकसाक्षिकम् ।
अत्र मे संशयस्तीव्रो हृदि सम्परिवर्तते ॥ २ ॥
इसी तरह स्त्रियाँ भी पुरुषोंमें ही आसक्त होती हैं। यह बात प्रत्यक्ष देखी जाती है और लोग इसके साक्षी हैं। इस बातको लेकर मेरे मनमें भारी संदेह खड़ा हो गया है ॥ २ ॥

कथमासां नराः सङ्गं कुर्वते कुरुनन्दन ।
स्त्रियो वा केषु रज्यन्ते विरज्यन्ते च ताः पुनः ॥ ३ ॥
कुरुनन्दन! पुरुष क्यों इन स्त्रियोंका संग करते हैं? अथवा स्त्रियाँ भी किस निमित्तसे पुरुषोंमें अनुरक्त एवं विरक्त होती हैं ॥ ३ ॥

इति ताः पुरुषव्याघ्र कथं शक्यास्तु रक्षितुम् ।
प्रमदाः पुरुषेणेह तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ४ ॥
पुरुषसिंह! पुरुष यौवनसे उन्मत्त स्त्रियोंकी रक्षा कैसे कर सकता है? यह विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा करें ॥ ४ ॥

एता हि रममाणास्तु वञ्चयन्तीह मानवान् ।
न चासां मुच्यते कश्चित् पुरुषो हस्तमागतः ॥ ५ ॥
ये रमण करती हुई भी यहाँ पुरुषोंको ठगती रहती हैं। इनके हाथमें आया हुआ कोई भी पुरुष इनसे बचकर नहीं जा सकता ॥ ५ ॥

गावो नवतृणानीव गृह्णन्त्येता नवं नवम् ।
शम्बरस्य च या माया माया या नमुचेरपि ॥ ६ ॥
बलेः कुम्भीनसेश्चैव सर्वास्ता योषितो विदुः ।
जैसे गौएँ नयी-नयी घास चरती हैं, उसी प्रकार ये नारियाँ नये-नये पुरुषको अपनाती रहती हैं। शम्बरासुरकी जो माया है तथा नमुचि, बलि और कुम्भीनसीकी जो मायाएँ हैं, उन सबको ये युवतियाँ जानती हैं ॥ ६ ½ ॥

हसन्तं प्रहसन्त्येता रुदन्तं प्ररुदन्ति च ॥ ७ ॥
अप्रियं प्रियवाक्यैश्च गृह्णते कालयोगतः ।

पुरुषको हँसते देख ये स्त्रियाँ जोर-जोरसे हँसती हैं। उसे रोते देख स्वयं भी फूट-फूटकर रोने लगती हैं और अवसर आनेपर अप्रिय पुरुषको प्रिय वचनोंद्वारा अपना लेती हैं ।। ७ १/२ ।।
उशना वेद यच्छास्त्रं यच्च वेद बृहस्पतिः ।। ८ ।।
स्त्रीबुद्ध्या न विशिष्येत तास्तु रक्ष्याः कथं नरैः ।
जिस नीतिशास्त्रको शुक्राचार्य जानते हैं, जिसे बृहस्पति जानते हैं, वह भी स्त्रीकी बुद्धिसे बढ़कर नहीं है। ऐसी स्त्रियोंकी रक्षा पुरुष कैसे कर सकते हैं ।। ८ १/२ ।।
अनृतं सत्यमित्याहुः सत्यं चापि तथानृतम् ।। ९ ।।
इति यास्ताः कथं वीर संरक्ष्याः पुरुषैरिह ।
वीर! जिनके झूठको भी सच और सचको भी झूठ बताया गया है, ऐसी स्त्रियोंकी रक्षा पुरुष यहाँ कैसे कर सकते हैं? ।। ९ १/२ ।।
स्त्रीणां बुद्धयर्थनिष्कर्षार्दथशास्त्राणि शत्रुहन् ।। १० ।।
बृहस्पतिप्रभृतिभिर्मन्ये सद्भिः कृतानि वै ।
शत्रुघाती नरेश! मुझे तो ऐसा लगता है कि स्त्रियोंकी बुद्धिमें जो अर्थ भरा है, उसीका निष्कर्ष (सारांश) लेकर बृहस्पति आदि सत्पुरुषोंने नीतिशास्त्रोंकी रचना की है ।। १० १/२ ।।
सम्पूज्यमानाः पुरुषैर्विकुर्वन्ति मनो नृषु ।। ११ ।।
अपास्ताश्च तथा राजन् विकुर्वन्ति मनः स्त्रियः ।
नरेश्वर! पुरुषोंद्वारा सम्मानित होनेपर भी ये रमणियाँ उनका मन विकृत कर देती हैं और उनके द्वारा तिरस्कृत होनेपर भी उनके मनमें विकार उत्पन्न कर देती हैं ।। ११ १/२ ।।
इमाः प्रजा महाबाहो धार्मिक्य इति नः श्रुतम् ।। १२ ।।
सत्कृतासत्कृताश्चापि विकुर्वन्ति मनः सदा ।
कस्ताः शक्तो रक्षितुं स्यादिति मे संशयो महान् ।। १३ ।।
महाबाहो! हमने सुन रखा है कि ये स्त्रीरूपिणी प्रजाएँ बड़ी धार्मिक होती हैं (जैसा कि सावित्री आदिके जीवनसे प्रत्यक्ष हो चुका है); फिर भी ये स्त्रियाँ सम्मानित हों या असम्मानित, सदा ही पुरुषोंके मनमें विकार उत्पन्न करती रहती हैं। उनकी रक्षा कौन कर सकता है? यही मेरे मनमें महान् संशय है ।। १२-१३ ।।
तथा ब्रूहि महाभाग कुरूणां वंशवर्धन ।
यदि शक्या कुरुश्रेष्ठ रक्षा तासां कदाचन ।।
कर्तुं वा कृतपूर्वं वा तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ।। १४ ।।
महाभाग! कुरुकुलवर्धन! कुरुश्रेष्ठ! यदि किसी प्रकार कभी भी उनकी रक्षा की जा सके तो वह बताइये। यदि किसीने पहले कभी किसी स्त्रीकी रक्षा की हो तो वह कथा भी मुझे विस्तारके साथ बताइये ।। १४ ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि स्त्रीस्वभावकथने एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें स्त्रियोंके स्वभावका वर्णनविषयक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३९ ॥

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चत्वारिंशोऽध्यायः

भृगुवंशी विपुलके द्वारा योगबलसे गुरुपत्नीके शरीरमें प्रवेश करके उसकी रक्षा करना

भीष्म उवाच

एवमेव महाबाहो नात्र मिथ्यास्ति किंचन ।
यथा ब्रवीषि कौरव्य नारीं प्रति जनाधिप ॥ १ ॥
भीष्मजीने कहा— महाबाहो! कुरुनन्दन! ऐसी ही बात है। नरेश्वर! नारियोंके सम्बन्धमें तुम जो कुछ कह रहे हो, उसमें तनिक भी मिथ्या नहीं है ॥ १ ॥

अत्र ते वर्तयिष्यामि इतिहासं पुरातनम् ।
यथा रक्षा कृता पूर्वं विपुलेन महात्मना ॥ २ ॥
इस विषयमें मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास बताऊँगा कि पूर्वकालमें महात्मा विपुलने किस प्रकार एक स्त्री (गुरुपत्नी)-की रक्षा की थी ॥ २ ॥

प्रमदाश्च यथा सृष्टा ब्रह्मणा भरतर्षभ ।
यदर्थं तच्च ते तात प्रवक्ष्यामि नराधिप ॥ ३ ॥
भरतश्रेष्ठ! तात! नरेश्वर! ब्रह्माजीने जिस प्रकार और जिस उद्देश्यसे युवतियोंकी सृष्टि की है, वह सब मैं तुम्हें बताऊँगा ॥ ३ ॥

न हि स्त्रीभ्यः परं पुत्र पापीयः किंचिदस्ति वै ।
अग्निर्हि प्रमदा दीप्तो मायाश्च मयजा विभो ॥ ४ ॥
बेटा! स्त्रियोंसे बढ़कर पापिष्ठ दूसरा कोई नहीं है। यौवन-मदसे उन्मत्त रहनेवाली स्त्रियाँ वास्तवमें प्रज्वलित अग्निके समान हैं। प्रभो! वे मयदानवकी रची हुई माया हैं ॥ ४ ॥

क्षुरधारा विषं सर्पो वह्निरित्येकतः स्त्रियः ।
प्रजा इमा महाबाहो धार्मिक्य इति नः श्रुतम् ॥ ५ ॥
स्वयं गच्छन्ति देवत्वं ततो देवानियाद् भयम् ।
छुरेकी धार, विष, सर्प और आग—ये सब विनाशके हेतु एक ओर और तरुणी स्त्रियाँ एक ओर। महाबाहो! पहले यह सारी प्रजा धार्मिक थी। यह हमने सुन रखा है। वे प्रजाएँ स्वयं देवत्वको प्राप्त हो जाती थीं। इससे देवताओंको बड़ा भय हुआ ॥ ५½ ॥

अथाभ्यगच्छन् देवास्ते पितामहमरिंदम ॥ ६ ॥
निवेद्य मानसं चापि तूष्णीमासन्नधोमुखाः ।

शत्रुदमन! तब वे देवता ब्रह्माजीके पास गये और उनसे अपने मनकी बात निवेदन करके मुँह नीचे किये चुपचाप बैठ गये ॥ ६ १/२ ॥
तेषामन्तर्गतं ज्ञात्वा देवानां स पितामहः ॥ ७ ॥
मानवानां प्रमोहार्थं कृत्या नार्योऽसृजत् प्रभुः ।
उन देवताओंके मनकी बात जानकर भगवान् ब्रह्माने मनुष्योंको मोहमें डालनेके लिये कृत्यारूप नारियोंकी सृष्टि की ॥ ७ १/२ ॥
पूर्वसर्गे तु कौन्तेय साध्व्यो नार्य इहाभवन् ॥ ८ ॥
असाध्व्यस्तु समुत्पन्नाः कृत्याः सर्गात् प्रजापतेः ।
ताभ्यः कामान् यथाकामं प्रादाद्धि स पितामहः ॥ ९ ॥
कुन्तीनन्दन! सृष्टिके प्रारम्भमें यहाँ सब स्त्रियाँ पतिव्रता ही थीं। कृत्यारूप दुष्ट स्त्रियाँ तो प्रजापतिकी इस नूतन सृष्टिसे ही उत्पन्न हुई हैं। प्रजापतिने उन्हें उनकी इच्छाके अनुसार कामभाव प्रदान किया ॥ ८-९ ॥
ताः कामलुब्धाः प्रमदाः प्रबाधन्ते नरान् सदा ।
क्रोधं कामस्य देवेशः सहायं चासृजत् प्रभुः ॥ १० ॥
असज्जन्त प्रजाः सर्वाः कामक्रोधवशं गताः ।
वे मतवाली युवतियाँ कामलोलुप होकर पुरुषोंको सदा बाधा देती रहती हैं। देवेश्वर भगवान् ब्रह्माने कामकी सहायताके लिये क्रोधको उत्पन्न किया। इन्हीं काम और क्रोधके वशीभूत होकर स्त्री और पुरुषरूप सारी प्रजा परस्पर आसक्त होती है ॥ १० १/२ ॥
(द्विजानां च गुरूणां च महागुरूनृपादिनाम् ।
क्षणात् स्त्रीसङ्गकामोत्था यातनाहो निरन्तरा ॥
ब्राह्मण, गुरु, महागुरु और राजा—इन सबको स्त्रीके क्षणिक संगसे निरन्तर कामजनित यातना सहनी पड़ती है।
अरक्तमनसां नित्यं ब्रह्मचर्यामलात्मनाम् ।
तपोदमर्चनध्यानयुक्तानां शुद्धिरुत्तमा ॥)
जिनका मन कहीं आसक्त नहीं है, जिन्होंने ब्रह्मचर्यके पालनपूर्वक अपने अन्तःकरणको निर्मल बना लिया है तथा जो तपस्या, इन्द्रियसंयम और ध्यान-पूजनमें संलग्न हैं, उन्हींकी उत्तम शुद्धि होती है ॥
न च स्त्रीणां क्रियाः काश्चिदिति धर्मो व्यवस्थितः ॥ ११ ॥
निरिन्द्रिया ह्यशास्त्राश्च स्त्रियोऽनृतमिति श्रुतिः ।
शय्यासनमलंकारमन्नपानमनार्यताम् ॥ १२ ॥
दुर्वाग्भावं रतिं चैव ददौ स्त्रीभ्यः प्रजापतिः ।

स्त्रियोंके लिये किन्हीं वैदिक कर्मोंके करनेका विधान नहीं है। यही धर्मशास्त्रकी व्यवस्था है। स्त्रियाँ इन्द्रियशून्य हैं अर्थात् वे अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखनेमें असमर्थ हैं। शास्त्रज्ञानसे रहित हैं और असत्यकी मूर्ति हैं। ऐसा उनके विषयमें श्रुतिका कथन है। प्रजापतिने स्त्रियोंको शय्या, आसन, अलंकार, अन्न, पान, अनार्यता, दुर्वचन, प्रियता तथा रति प्रदान की है॥ ११-१२ १/२॥

न तासां रक्षणं शक्यं कर्तुं पुंसां कथंचन ॥ १३ ॥
अपि विश्वकृता तात कुतस्तु पुरुषैरिह ।
तात! लोकस्रष्टा ब्रह्मा-जैसा पुरुष भी स्त्रियोंकी किसी प्रकार रक्षा नहीं कर सकता, फिर साधारण पुरुषोंकी तो बात ही क्या॥ १३ १/२॥

वाचा च वधबन्धैर्वा क्लेशैर्वा विविधैस्तथा ॥ १४ ॥
न शक्या रक्षितुं नार्यस्ता हि नित्यमसंयताः ।
वाणीके द्वारा एवं वध और बन्धनके द्वारा रोककर अथवा नाना प्रकारके क्लेश देकर भी स्त्रियोंकी रक्षा नहीं की जा सकती; क्योंकि वे सदा असंयमशील होती हैं॥ १४ १/२॥

इदं तु पुरुषव्याघ्र पुरस्ताच्छ्रुतवानहम् ॥ १५ ॥
यथा रक्षा कृता पूर्वं विपुलेन गुरुस्त्रियाः ।
पुरुषसिंह! पूर्वकालमें मैंने यह सुना था कि प्राचीनकालमें महात्मा विपुलने अपनी गुरुपत्नीकी रक्षा की थी। कैसे की? यह मैं तुम्हें बता रहा हूँ॥ १५ १/२॥

ऋषिरासीन्महाभागो देवशर्मेति विश्रुतः ॥ १६ ॥
तस्य भार्या रुचिर्नाम रूपेणासदृशी भुवि ।
पहलेकी बात है, देवशर्मा नामके एक महा-भाग्यशाली ऋषि थे। उनके रुचि नामवाली एक स्त्री थी जो इस पृथ्वीपर अद्वितीय सुन्दरी थी॥ १६ १/२॥

तस्या रूपेण सम्मत्ता देवगन्धर्वदानवाः ॥ १७ ॥
विशेषेण तु राजेन्द्र वृत्रहा पाकशासनः ।
उसका रूप देखकर देवता, गन्धर्व और दानव भी मतवाले हो जाते थे। राजेन्द्र! वृत्रासुरका वध करनेवाले पाकशासन इन्द्र उस स्त्रीपर विशेषरूपसे आसक्त थे ॥

नारीणां चरितज्ञश्च देवशर्मा महामुनिः ॥ १८ ॥
यथाशक्ति यथोत्साहं भार्या तामभ्यरक्षत ।
महामुनि देवशर्मा नारियोंके चरित्रको जानते थे; अतः वे यथाशक्ति उत्साहपूर्वक उसकी रक्षा करते थे॥

पुरन्दरं च जानीते परस्त्रीकामचारिणम् ॥ १९ ॥
तस्माद् बलेन भार्याया रक्षणं स चकार ह ।

वे यह भी जानते थे कि इन्द्र बड़ा ही पर-स्त्रीलम्पट है, इसलिये वे अपनी स्त्रीकी उनसे यत्नपूर्वक रक्षा करते थे ॥ १९ १/२ ॥
स कदाचिदृषिस्तात यज्ञं कर्तुमनास्तदा ॥ २० ॥
भार्यासंरक्षणं कार्यं कथं स्यादित्यचिन्तयत् ।
तात! एक समय ऋषिने यज्ञ करनेका विचार किया। उस समय वे यह सोचने लगे कि 'यदि मैं यज्ञमें लग जाऊँ तो मेरी स्त्रीकी रक्षा कैसे होगी' ॥ २० १/२ ॥
रक्षाविधानं मनसा स संचिन्त्य महातपाः ॥ २१ ॥
आहूय दयितं शिष्यं विपुलं प्राह भार्गवम् ।
फिर उन महा तपस्वीने मन-ही-मन उसकी रक्षाका उपाय सोचकर अपने प्रिय शिष्य भृगुवंशी विपुलको बुलाकर कहा— ॥ २१ १/२ ॥

देवशर्मोवाच

यज्ञकारो गमिष्यामि रुचिं चेमां सुरेश्वरः ॥ २२ ॥
यतः प्रार्थयते नित्यं तां रक्षस्व यथाबलम् ।
देवशर्मा बोले— वत्स! मैं यज्ञ करनेके लिये जाऊँगा। तुम मेरी इस पत्नी रुचिकी यत्नपूर्वक रक्षा करना; क्योंकि देवराज इन्द्र सदा इसे प्राप्त करनेकी चेष्टामें लगा रहता है ॥ २२ १/२ ॥
अप्रमत्तेन ते भाव्यं सदा प्रति पुरन्दरम् ॥ २३ ॥
स हि रूपाणि कुरुते विविधानि भृगूत्तम ।
भृगुश्रेष्ठ! तुम्हें इन्द्रकी ओरसे सदा सावधान रहना चाहिये; क्योंकि वह अनेक प्रकारके रूप धारण करता है ॥ २३ १/२ ॥

भीष्म उवाच

इत्युक्तो विपुलस्तेन तपस्वी नियतेन्द्रियः ॥ २४ ॥
सदैवोग्रतपा राजन्नग्न्यर्कसदृशद्युतिः ।
धर्मज्ञः सत्यवादी च तथेति प्रत्यभाषत ।
पुनश्चेदं महाराज पप्रच्छ प्रस्थितं गुरुम् ॥ २५ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! गुरुके ऐसा कहनेपर अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी, जितेन्द्रिय तथा सदा ही कठोर तपमें लगे रहनेवाले धर्मज्ञ एवं सत्यवादी विपुलने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली। महाराज! फिर जब गुरुजी प्रस्थान करने लगे तब उसने पुनः इस प्रकार पूछा ॥ २४-२५ ॥

विपुल उवाच

कानि रूपाणि शक्रस्य भवन्त्यागच्छतो मुने ।

वपुस्तेजश्च कीदृग् वै तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ २६ ॥
विपुलने पूछा— मुने! इन्द्र जब आता है तब उसके कौन-कौन-से रूप होते हैं तथा उस समय उसका शरीर और तेज कैसा होता है? यह मुझे स्पष्टरूपसे बतानेकी कृपा करें ॥ २६ ॥

भीष्म उवाच

ततः स भगवांस्तस्मै विपुलाय महात्मने ।
आचचक्षे यथातत्त्वं मायां शक्रस्य भारत ॥ २७ ॥
भीष्मजी कहते हैं— भरतनन्दन! तदनन्तर भगवान् देवशर्माने महात्मा विपुलसे इन्द्रकी मायाको यथार्थरूपसे बताना आरम्भ किया ॥ २७ ॥

देवशर्मोवाच

बहुमायः स विप्रर्षे भगवान् पाकशासनः ।
तांस्तान् विकुरुते भावान् बहूनथ मुहुर्मुहुः ॥ २८ ॥
देवशर्माने कहा— ब्रह्मर्षे! भगवान् पाकशासन इन्द्र बहुत-सी मायाओंके जानकार हैं। वे बारंबार बहुत-से रूप बदलते रहते हैं ॥ २८ ॥

किरीटी वज्रधृग् धन्वी मुकुटी बद्धकुण्डलः ॥ २९ ॥
भवत्यथ मुहूर्तेन चाण्डालसमदर्शनः ।
शिखी जटी चीरवासाः पुनर्भवति पुत्रक ॥ ३० ॥
बेटा! वे कभी तो मस्तकपर किरीट-मुकुट, कानोंमें कुण्डल तथा हाथोंमें वज्र एवं धनुष धारण किये आते हैं और कभी एक ही मुहूर्तमें चाण्डालके समान दिखायी देते हैं; फिर कभी शिखा, जटा और चीरवस्त्र धारण करनेवाले ऋषि बन जाते हैं ॥ २९-३० ॥

बृहत् शरीरश्च पुनश्चीरवासाः पुनः कृशः ।
गौरं श्यामं च कृष्णं च वर्णं विकुरुते पुनः ॥ ३१ ॥
कभी विशाल एवं हृष्ट-पुष्ट शरीर धारण करते हैं तो कभी दुर्बल शरीरमें चिथड़े लपेटे दिखायी देते हैं। कभी गोरे, कभी साँवले और कभी काले रंगके रूप बदलते रहते हैं ॥ ३१ ॥

विरूपो रूपवांश्चैव युवा वृद्धस्तथैव च ।
ब्राह्मणः क्षत्रियश्चैव वैश्यः शूद्रस्तथैव च ॥ ३२ ॥
वे एक ही क्षणमें कुरूप और दूसरे ही क्षणमें रूपवान् हो जाते हैं। कभी जवान और कभी बूढ़े बन जाते हैं। कभी ब्राह्मण बनकर आते हैं तो कभी क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रका रूप बना लेते हैं ॥ ३२ ॥

प्रतिलोमोऽनुलोमश्च भवत्यथ शतक्रतुः ।
शुकवायसरूपी च हंसकोकिलरूपवान् ॥ ३३ ॥

वे इन्द्र कभी अनुलोम संकरका रूप धारण करते हैं तो कभी विलोम संकरका। वे तोते, कौए, हंस और कोयलके रूपमें भी दिखायी देते हैं ।। ३३ ।। सिंहव्याघ्रगजानां च रूपं धारयते पुनः । दैवं दैत्यमथो राज्ञां वपुर्धारयतेऽपि च ।। ३४ ।। सिंह, व्याघ्र और हाथीके भी रूप बारंबार धारण करते हैं। देवताओं, दैत्यों तथा राजाओंके शरीर भी धारण कर लेते हैं ।। ३४ ।। अकृशो वायुभग्नाङ्गः शकुनिर्विकृतस्तथा । चतुष्पाद् बहुरूपश्च पुनर्भवति बालिशः ।। ३५ ।। वे कभी हृष्ट-पुष्ट, कभी वातरोगसे भग्न शरीरवाले और कभी पक्षी बन जाते हैं। कभी विकृत वेश बना लेते हैं। फिर कभी चौपाया (पशु), कभी बहुरूपिया और कभी गँवार बन जाते हैं ।। ३५ ।। मक्षिकामशकादीनां वपुर्धारयतेऽपि च । न शक्यमस्य ग्रहणं कर्तुं विपुल केनचित् ।। ३६ ।। अपि विश्वकृता तात येन सृष्टमिदं जगत् । पुनरन्तर्हितः शक्रो दृश्यते ज्ञानचक्षुषा ।। ३७ ।। वे मक्खी और मच्छर आदिके भी रूप धारण करते हैं। विपुल! कोई भी उन्हें पकड़ नहीं सकता। तात! औरोंकी तो बात ही क्या है? जिन्होंने इस संसारको बनाया है वे विधाता भी उन्हें अपने काबूमें नहीं कर सकते। अन्तर्धान हो जानेपर इन्द्र केवल ज्ञानदृष्टिसे दिखायी देते हैं ।। ३६-३७ ।। वायुभूतश्च स पुनर्देवराजो भवत्युत । एवं रूपाणि सततं कुरुते पाकशासनः ।। ३८ ।। फिर वे वायुरूप होकर तुरंत ही देवराजके रूपमें प्रकट हो जाते हैं। इस तरह पाकशासन इन्द्र सदा नये-नये रूप धारण करता और बदलता रहता है ।। ३८ ।। तस्माद् विपुल यत्नेन रक्षेमां तनुमध्यमाम् । यथा रुचिं नावलिहेद् देवेन्द्रो भृगुसत्तम ।। ३९ ।। क्रतावुपहिते न्यस्तं हविः श्वेव दुरात्मवान् । भृगुश्रेष्ठ विपुल! इसलिये तुम यत्नपूर्वक इस तनुमध्यमा रुचिकी रक्षा करना जिससे दुरात्मा देवराज इन्द्र यज्ञमें रखे हुए हविष्यको चाटनेकी इच्छावाले कुत्तेकी भाँति मेरी पत्नी रुचिका स्पर्श न कर सके ।। एवमाख्याय स मुनिर्यज्ञकारोऽगमत् तदा ।। ४० ।। देवशर्मा महाभागस्ततो भरतसत्तम । भरतश्रेष्ठ! ऐसा कहकर महाभाग देवशर्मा मुनि यज्ञ करनेके लिये चले गये ।। ४० १/२ ।। विपुलस्तु वचः श्रुत्वा गुरोश्चिन्तामुपेयिवान् ।। ४१ ।।

रक्षां च परमां चक्रे देवराजान्महाबलात् । गुरुकी बात सुनकर विपुल बड़ी चिन्तामें पड़ गये और महाबली देवराजसे उस स्त्रीकी बड़ी तत्परताके साथ रक्षा करने लगे ॥ ४१ ½ ॥ किं नु शक्यं मया कर्तुं गुरुदाराभिरक्षणे ॥ ४२ ॥ मायावी हि सुरेन्द्रोऽसौ दुर्धर्षश्चापि वीर्यवान् । उन्होंने मन-ही-मन सोचा, 'मैं गुरुपत्नीकी रक्षाके लिये क्या कर सकता हूँ, क्योंकि वह देवराज इन्द्र मायावी होनेके साथ ही बड़ा दुर्धर्ष और पराक्रमी है ॥ नापिधायाश्रमं शक्यो रक्षितुं पाकशासनः ॥ ४३ ॥ उटजं वा तथा ह्यस्य नानाविधसरूपता । 'कुटी या आश्रमके दरवाजोंको बंद करके भी पाकशासन इन्द्रका आना नहीं रोका जा सकता; क्योंकि वे कई प्रकारके रूप धारण करते हैं ॥ ४३ ½ ॥ वायुरूपेण वा शक्रो गुरुपत्नीं प्रधर्षयेत् ॥ ४४ ॥ तस्मादिमां सम्प्रविश्य रुचिं स्थास्येऽहमद्य वै । सम्भव है, इन्द्र वायुका रूप धारण करके आये और गुरुपत्नीको दूषित कर डाले; इसलिये आज मैं रुचिके शरीरमें प्रवेश करके रहूँगा ॥ ४४ ½ ॥ अथवा पौरुषेणेयं न शक्या रक्षितुं मया ॥ ४५ ॥ बहुरूपो हि भगवान् श्रूयते पाकशासनः । सोऽहं योगबलादेनां रक्षिष्ये पाकशासनात् ॥ ४६ ॥ 'अथवा पुरुषार्थके द्वारा मैं इसकी रक्षा नहीं कर सकता; क्योंकि ऐश्वर्यवाली पाकशासन इन्द्र बहुरूपिया सुने जाते हैं। अतः योगबलका आश्रय लेकर ही मैं इन्द्रसे इसकी रक्षा करूँगा ॥ ४५-४६ ॥ गात्राणि गात्रैरस्याहं सम्प्रवेश्ये हि रक्षितुम् । यद्युच्छिष्टामिमां पत्नीमद्य पश्यति मे गुरुः ॥ ४७ ॥ शप्स्यत्यसंशयं कोपाद् दिव्यज्ञानो महातपाः । 'मैं गुरुपत्नीकी रक्षा करनेके लिये अपने सम्पूर्ण अंगोंसे इसके सम्पूर्ण अंगोंमें समा जाऊँगा। यदि आज मेरे गुरुजी अपनी इस पत्नीको किसी पर-पुरुषद्वारा दूषित हुई देख लेंगे तो कुपित होकर मुझे निस्संदेह शाप दे देंगे; क्योंकि वे महा तपस्वी गुरु दिव्यज्ञानसे सम्पन्न हैं ॥ ४७ ½ ॥ न चेयं रक्षितुं शक्या यथान्या प्रमदा नृभिः ॥ ४८ ॥ मायावी हि सुरेन्द्रोऽसावहो प्राप्तोऽस्मि संशयम् ।

'दूसरी युवतियोंकी तरह इस गुरुपत्नीकी भी मनुष्योंद्वारा रक्षा नहीं की जा सकती; क्योंकि देवराज इन्द्र बड़े मायावी हैं। अहो! मैं बड़ी संशयजनित अवस्थामें पड़ गया ।। ४८ १/२ ।।

अवश्यं करणीयं हि गुरोरिह हि शासनम् ॥ ४९ ॥ यदि त्वेतदहं कुर्यामाश्चर्यं स्यात् कृतं मया । 'यहाँ गुरुने जो आज्ञा दी है, उसका पालन मुझे अवश्य करना चाहिये। यदि मैं ऐसा कर सका तो मेरे द्वारा यह एक आश्चर्यजनक कार्य सम्पन्न होगा ।। ४९१/२ ।।

योगेनाथ प्रवेशो हि गुरुपत्न्याः कलेवरे ॥ ५० ॥ एवमेव शरीरेऽस्या निवत्स्यामि समाहितः । असक्तः पद्मपत्रस्थो जलबिन्दुर्यथाचलः ॥ ५१ ॥ 'अतः मुझे गुरुपत्नीके शरीरमें योगबलसे प्रवेश करना चाहिये। जिस प्रकार कमलके पत्तेपर पड़ी हुई जलकी बूँद उसपर निर्लिप्त भावसे स्थिर रहती है उसी प्रकार मैं भी अनासक्त भावसे गुरुपत्नीके भीतर निवास करूँगा ।। ५०-५१ ।।

निर्मुक्तस्य रजोरूपान्नापराधो भवेन्मम । यथा हि शून्यां पथिकः सभामध्यावसेत् पथि ॥ ५२ ॥ तथाद्यावासयिष्यामि गुरुपत्न्याः कलेवरम् । एवमेव शरीरेऽस्या निवत्स्यामि समाहितः ॥ ५३ ॥ 'मैं रजोगुणसे मुक्त हूँ; अतः मेरे द्वारा कोई अपराध नहीं हो सकता, जैसे राह चलनेवाला बटोही कभी किसी सूनी धर्मशालामें ठहर जाता है उसी प्रकार आज मैं सावधान होकर गुरुपत्नीके शरीरमें निवास करूँगा। इसी तरह इसके शरीरमें मेरा निवास हो सकेगा' ।। ५२-५३ ।।

इत्येवं धर्ममालोक्य वेदवेदांश्च सर्वशः । तपश्च विपुलं दृष्ट्वा गुरोरात्मन एव च ॥ ५४ ॥ इति निश्चित्य मनसा रक्षां प्रति स भार्गवः । अन्वतिष्ठत् परं यत्नं यथा तच्छृणु पार्थिव ॥ ५५ ॥ पृथ्वीनाथ! इस तरह धर्मपर दृष्टि डाल, सम्पूर्ण वेद-शास्त्रोंपर विचार करके अपनी तथा गुरुकी प्रचुर तपस्याको दृष्टिमें रखते हुए भृगुवंशी विपुलने गुरुपत्नीकी रक्षाके लिये अपने मनसे उपर्युक्त उपाय ही निश्चित किया और इसके लिये जो महान् प्रयत्न किया, वह बताता हूँ, सुनो— ।। ५४-५५ ।।

गुरुपत्नीं समासीनो विपुलः स महातपाः । उपासीनामनिन्द्याङ्गीं कथाभिः समलोभयत् ॥ ५६ ॥ 'महा तपस्वी विपुल गुरुपत्नीके पास बैठ गये और पास ही बैठी हुई निर्दोष अंगोंवाली उस रुचिको अनेक प्रकारकी कथा-वार्ता सुनाकर अपनी बातोंमें लुभाने लगे ।। ५६ ।।

नेत्राभ्यां नेत्रयोरस्या रश्मिं संयोज्य रश्मिभिः ।
विवेश विपुलः कायमाकाशं पवनो यथा ॥ ५७ ॥
‘फिर अपने दोनों नेत्रोंको उन्होंने उसके नेत्रोंकी ओर लगाया और अपने नेत्रोंकी किरणोंको उसके नेत्रोंकी किरणोंके साथ जोड़ दिया। फिर उसी मार्गसे आकाशमें प्रविष्ट होनेवाली वायुकी भाँति रुचिके शरीरमें प्रवेश किया’ ॥ ५७ ॥

लक्षणं लक्षणेनैव वदनं वदनेन च ।
अविचेष्टन्नतिष्ठद् वै छायेवान्तर्हितो मुनिः ॥ ५८ ॥
‘वे लक्षणोंसे लक्षणोंमें और मुखके द्वारा मुखमें प्रविष्ट हो कोई चेष्टा न करते हुए स्थिर भावसे स्थित हो गये। उस समय अन्तर्हित हुए विपुल मुनि छायाके समान प्रतीत होते थे’ ॥ ५८ ॥

ततो विष्टभ्य विपुलो गुरुपत्नयाः कलेवरम् ।
उवास रक्षणे युक्तो न च सा तमबुद्ध्यत ॥ ५९ ॥
‘विपुल गुरुपत्नीके शरीरको स्तम्भित करके उसकी रक्षामें संलग्न हो वहीं निवास करने लगे। परंतु रुचिको अपने शरीरमें उनके आनेका पता न चला ॥ ५९ ॥

यं कालं नागतो राजन् गुरुस्तस्य महात्मनः ।
क्रतुं समाप्य स्वगृहं तं कालं सोऽभ्यरक्षत ॥ ६० ॥
‘राजन्! जबतक महात्मा विपुलके गुरु यज्ञ पूरा करके अपने घर नहीं लौटे तबतक विपुल इसी प्रकार अपनी गुरुपत्नीकी रक्षा करते रहे’ ॥ ६० ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विपुलोपाख्याने चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विपुलका उपाख्यानविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४० ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ६२ श्लोक हैं)