महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 446, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंरक्षां च परमां चक्रे देवराजान्महाबलात् । गुरुकी बात सुनकर विपुल बड़ी चिन्तामें पड़ गये और महाबली देवराजसे उस स्त्रीकी बड़ी तत्परताके साथ रक्षा करने लगे ॥ ४१ ½ ॥ किं नु शक्यं मया कर्तुं गुरुदाराभिरक्षणे ॥ ४२ ॥ मायावी हि सुरेन्द्रोऽसौ दुर्धर्षश्चापि वीर्यवान् । उन्होंने मन-ही-मन सोचा, 'मैं गुरुपत्नीकी रक्षाके लिये क्या कर सकता हूँ, क्योंकि वह देवराज इन्द्र मायावी होनेके साथ ही बड़ा दुर्धर्ष और पराक्रमी है ॥ नापिधायाश्रमं शक्यो रक्षितुं पाकशासनः ॥ ४३ ॥ उटजं वा तथा ह्यस्य नानाविधसरूपता । 'कुटी या आश्रमके दरवाजोंको बंद करके भी पाकशासन इन्द्रका आना नहीं रोका जा सकता; क्योंकि वे कई प्रकारके रूप धारण करते हैं ॥ ४३ ½ ॥ वायुरूपेण वा शक्रो गुरुपत्नीं प्रधर्षयेत् ॥ ४४ ॥ तस्मादिमां सम्प्रविश्य रुचिं स्थास्येऽहमद्य वै । सम्भव है, इन्द्र वायुका रूप धारण करके आये और गुरुपत्नीको दूषित कर डाले; इसलिये आज मैं रुचिके शरीरमें प्रवेश करके रहूँगा ॥ ४४ ½ ॥ अथवा पौरुषेणेयं न शक्या रक्षितुं मया ॥ ४५ ॥ बहुरूपो हि भगवान् श्रूयते पाकशासनः । सोऽहं योगबलादेनां रक्षिष्ये पाकशासनात् ॥ ४६ ॥ 'अथवा पुरुषार्थके द्वारा मैं इसकी रक्षा नहीं कर सकता; क्योंकि ऐश्वर्यवाली पाकशासन इन्द्र बहुरूपिया सुने जाते हैं। अतः योगबलका आश्रय लेकर ही मैं इन्द्रसे इसकी रक्षा करूँगा ॥ ४५-४६ ॥ गात्राणि गात्रैरस्याहं सम्प्रवेश्ये हि रक्षितुम् । यद्युच्छिष्टामिमां पत्नीमद्य पश्यति मे गुरुः ॥ ४७ ॥ शप्स्यत्यसंशयं कोपाद् दिव्यज्ञानो महातपाः । 'मैं गुरुपत्नीकी रक्षा करनेके लिये अपने सम्पूर्ण अंगोंसे इसके सम्पूर्ण अंगोंमें समा जाऊँगा। यदि आज मेरे गुरुजी अपनी इस पत्नीको किसी पर-पुरुषद्वारा दूषित हुई देख लेंगे तो कुपित होकर मुझे निस्संदेह शाप दे देंगे; क्योंकि वे महा तपस्वी गुरु दिव्यज्ञानसे सम्पन्न हैं ॥ ४७ ½ ॥ न चेयं रक्षितुं शक्या यथान्या प्रमदा नृभिः ॥ ४८ ॥ मायावी हि सुरेन्द्रोऽसावहो प्राप्तोऽस्मि संशयम् ।