महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 445, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंवे इन्द्र कभी अनुलोम संकरका रूप धारण करते हैं तो कभी विलोम संकरका। वे तोते, कौए, हंस और कोयलके रूपमें भी दिखायी देते हैं ।। ३३ ।। सिंहव्याघ्रगजानां च रूपं धारयते पुनः । दैवं दैत्यमथो राज्ञां वपुर्धारयतेऽपि च ।। ३४ ।। सिंह, व्याघ्र और हाथीके भी रूप बारंबार धारण करते हैं। देवताओं, दैत्यों तथा राजाओंके शरीर भी धारण कर लेते हैं ।। ३४ ।। अकृशो वायुभग्नाङ्गः शकुनिर्विकृतस्तथा । चतुष्पाद् बहुरूपश्च पुनर्भवति बालिशः ।। ३५ ।। वे कभी हृष्ट-पुष्ट, कभी वातरोगसे भग्न शरीरवाले और कभी पक्षी बन जाते हैं। कभी विकृत वेश बना लेते हैं। फिर कभी चौपाया (पशु), कभी बहुरूपिया और कभी गँवार बन जाते हैं ।। ३५ ।। मक्षिकामशकादीनां वपुर्धारयतेऽपि च । न शक्यमस्य ग्रहणं कर्तुं विपुल केनचित् ।। ३६ ।। अपि विश्वकृता तात येन सृष्टमिदं जगत् । पुनरन्तर्हितः शक्रो दृश्यते ज्ञानचक्षुषा ।। ३७ ।। वे मक्खी और मच्छर आदिके भी रूप धारण करते हैं। विपुल! कोई भी उन्हें पकड़ नहीं सकता। तात! औरोंकी तो बात ही क्या है? जिन्होंने इस संसारको बनाया है वे विधाता भी उन्हें अपने काबूमें नहीं कर सकते। अन्तर्धान हो जानेपर इन्द्र केवल ज्ञानदृष्टिसे दिखायी देते हैं ।। ३६-३७ ।। वायुभूतश्च स पुनर्देवराजो भवत्युत । एवं रूपाणि सततं कुरुते पाकशासनः ।। ३८ ।। फिर वे वायुरूप होकर तुरंत ही देवराजके रूपमें प्रकट हो जाते हैं। इस तरह पाकशासन इन्द्र सदा नये-नये रूप धारण करता और बदलता रहता है ।। ३८ ।। तस्माद् विपुल यत्नेन रक्षेमां तनुमध्यमाम् । यथा रुचिं नावलिहेद् देवेन्द्रो भृगुसत्तम ।। ३९ ।। क्रतावुपहिते न्यस्तं हविः श्वेव दुरात्मवान् । भृगुश्रेष्ठ विपुल! इसलिये तुम यत्नपूर्वक इस तनुमध्यमा रुचिकी रक्षा करना जिससे दुरात्मा देवराज इन्द्र यज्ञमें रखे हुए हविष्यको चाटनेकी इच्छावाले कुत्तेकी भाँति मेरी पत्नी रुचिका स्पर्श न कर सके ।। एवमाख्याय स मुनिर्यज्ञकारोऽगमत् तदा ।। ४० ।। देवशर्मा महाभागस्ततो भरतसत्तम । भरतश्रेष्ठ! ऐसा कहकर महाभाग देवशर्मा मुनि यज्ञ करनेके लिये चले गये ।। ४० १/२ ।। विपुलस्तु वचः श्रुत्वा गुरोश्चिन्तामुपेयिवान् ।। ४१ ।।