महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 43, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंततोऽस्य वितते यज्ञे नष्टोऽभूद्धव्यवाहनः । ततः सुदुःखितो राजा वाक्यमाह द्विजांस्तदा ॥ २३ ॥ तब अग्निदेव रुष्ट होकर राजाके आरम्भ हुए यज्ञमेंसे अदृश्य हो गये। इससे राजाको बड़ा दुःख हुआ और उन्होंने ब्राह्मणोंसे कहा— ॥ २३ ॥ दुष्कृतं मम किं नु स्याद् भवतां वा द्विजर्षभाः । येन नाशं जगामाग्निः कृतं कुपुरुषेष्विव ॥ २४ ॥ विप्रवरो! मुझसे या आपलोगोंसे कौन-सा ऐसा दुष्कर्म बन गया है जिससे अग्निदेव दुष्ट मनुष्योंके प्रति किये गये उपकारके समान नष्ट हो गये हैं ॥ २४ ॥ न ह्यल्पं दुष्कृतं नोऽस्ति येनाग्निर्नाशमागतः । भवतां चाथवा मह्यं तत्त्वेनैतद् विमृश्यताम् ॥ २५ ॥ ‘हमलोगोंका थोड़ा-सा अपराध नहीं है जिससे अग्निदेव अदृश्य हो गये हैं। वह अपराध आपलोगोंका है या मेरा—इसका ठीक-ठीक विचार करें’ ॥ २५ ॥ तत्र राज्ञो वचः श्रुत्वा विप्रास्ते भरतर्षभ । नियता वाग्यताश्चैव पावकं शरणं ययुः ॥ २६ ॥ भरतश्रेष्ठ! राजाकी यह बात सुनकर उन ब्राह्मणोंने शौच-संतोष आदि नियमोंके पालनपूर्वक मौन हो भगवान् अग्निदेवकी शरण ली ॥ २६ ॥ तान् दर्शयामास तदा भगवान् हव्यवाहनः । स्वं रूपं दीप्तिमत् कृत्वा शरदर्कसमद्युतिः ॥ २७ ॥ तब भगवान् हव्यवाहनने रातमें अपना तेजस्वी रूप प्रकट करके शरत्कालके सूर्यके सदृश द्युतिमान् हो उन ब्राह्मणोंको दर्शन दिया ॥ २७ ॥ ततो महात्मा तानाह दहनो ब्राह्मणर्षभान् । वरयाम्यात्मनोऽर्थाय दुर्योधनसुतामिति ॥ २८ ॥ उस समय महात्मा अग्निने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे कहा—‘मैं दुर्योधनकी पुत्रीका अपने लिये वरण करता हूँ’ ॥ २८ ॥ ततस्ते कल्यमुत्थाय तस्मै राज्ञे न्यवेदयन् । ब्राह्मणा विस्मिताः सर्वे यदुक्तं चित्रभानुना ॥ २९ ॥ यह सुनकर आश्चर्यचकित हुए सब ब्राह्मणोंने सबेरे उठकर, अग्निदेवने जो कहा था वह सब कुछ राजासे निवेदन किया ॥ २९ ॥ ततः स राजा तत् श्रुत्वा वचनं ब्रह्मवादिनाम् । अवाप्य परमं हर्षं तथेति प्राह बुद्धिमान् ॥ ३० ॥ ब्रह्मवादी ऋषियोंका यह वचन सुनकर राजाको बड़ा हर्ष हुआ और उन बुद्धिमान् नरेशने ‘तथास्तु’ कहकर अग्निदेवका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया ॥ ३० ॥ अयाचत च तं शुल्कं भगवन्तं विभावसुम् ।