महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 44, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंनित्यं सांनिध्यमिह ते चित्रभानो भवेदिति ॥ ३१ ॥
तदनन्तर उन्होंने कन्याके शुल्करूपसे भगवान् अग्निसे याचना की—'चित्रभानो! इस नगरीमें आपका सदा निवास बना रहे' ॥ ३१ ॥
तमाह भगवानग्निरेवमस्त्विति पार्थिवम् ।
ततः सांनिध्यमद्यापि माहिष्मत्यां विभावसोः ॥ ३२ ॥
यह सुनकर भगवान् अग्निने राजासे कहा, 'एवमस्तु (ऐसा ही होगा)'। तभीसे आजतक माहिष्मती नगरीमें अग्निदेवका निवास बना हुआ है ॥ ३२ ॥
दृष्टं हि सहदेवेन दिशं विजयता तदा ।
ततस्तां समलंकृत्य कन्यामाहृतवाससम् ॥ ३३ ॥
ददौ दुर्योधनो राजा पावकाय महात्मने ।
सहदेवने दक्षिण दिशाकी विजय करते समय वहाँ अग्निदेवको प्रत्यक्ष देखा था। अग्निदेवके वहाँ रहना स्वीकार कर लेनेपर राजा दुर्योधनने अपनी कन्याको सुन्दर वस्त्र पहनाकर नाना प्रकारके आभूषणोंसे अलंकृत करके महात्मा अग्निके हाथमें दे दिया ॥ ३३ ½ ॥
प्रतिजग्राह चाग्निस्तु राजकन्यां सुदर्शनाम् ॥ ३४ ॥
विधिना वेददृष्टेन वसोर्धारामिवाध्वरे ।
अग्निने वेदोक्त विधिसे राजकन्या सुदर्शनाको उसी प्रकार ग्रहण किया, जैसे वे यज्ञमें वसुधारा ग्रहण करते हैं ॥ ३४ ½ ॥
तस्या रूपेण शीलेन कुलेन वपुषा श्रिया ॥ ३५ ॥
अभवत् प्रीतिमानग्निर्गर्भे चास्या मनो दधे ।
सुदर्शनाके रूप, शील, कुल, शरीरकी आकृति और काान्तिको देखकर अग्निदेव बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसमें गर्भाधान करनेका विचार किया ॥ ३५ ½ ॥
तस्याः समभवत् पुत्रो नाम्नाऽऽग्नेयः सुदर्शनः ॥ ३६ ॥
सुदर्शनस्तु रूपेण पूर्णेन्दुसदृशोपमः ।
शिशुरेवाध्यगात् सर्वं परं ब्रह्म सनातनम् ॥ ३७ ॥
कुछ कालके पश्चात् उसके गर्भसे अग्निके एक पुत्र हुआ जिसका नाम सुदर्शन रखा गया। वह रूपमें पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर था और उसे बचपनमें ही सर्वस्वरूप सनातन परब्रह्मका ज्ञान हो गया था ॥
अथौघवान् नाम नृपो नृगस्यासीत् पितामहः ।
तस्याथौघवती कन्या पुत्रश्चौघरथोऽभवत् ॥ ३८ ॥
उन दिनों राजा नृगके पितामह ओघवान् इस पृथ्वीपर राज्य करते थे। उनके ओघवती नामवाली एक कन्या और ओघरथ नामवाला एक पुत्र था ॥ ३८ ॥
तामोघवान् ददौ तस्मै स्वयमोघवतीं सुताम् ।