महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 450, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंतामाबभाषे देवेन्द्रः साम्ना परमवल्गुना । त्वदर्थमागतं विद्धि देवेन्द्रं मां शुचिस्मिते ॥ ७ ॥ तब देवराज इन्द्रने बड़ी मधुर वाणीमें उसे समझाते हुए कहा—'पवित्र मुसकानवाली देवि! मुझे देवताओंका राजा इन्द्र समझो! मैं तुम्हारे लिये ही यहाँतक आया हूँ ॥ ७ ॥
क्लिश्यमानमनङ्गेन त्वत्संकल्पभवेन ह । तत् सम्प्राप्तं हि मां सुभ्रू पुरा कालोऽतिवर्तते ॥ ८ ॥ 'तुम्हारा चिन्तन करनेसे मेरे हृदयमें जो काम उत्पन्न हुआ है वह मुझे बड़ा कष्ट दे रहा है। इसीसे मैं तुम्हारे निकट उपस्थित हुआ हूँ। सुन्दरी! अब देर न करो, समय बीता जा रहा है' ॥ ८ ॥
तमेवंवादिनं शक्रं शुश्राव विपुलो मुनिः । गुरुपत्न्याः शरीरस्थो ददर्श त्रिदशाधिपम् ॥ ९ ॥ देवराज इन्द्रकी यह बात गुरुपत्नीके शरीरमें बैठे हुए विपुल मुनिने भी सुनी और उन्होंने इन्द्रको देख भी लिया ॥ ९ ॥
न शशाक च सा राजन् प्रत्युत्थातुमनिन्दिता । वक्तुं च नाशकद् राजन् विष्टब्धा विपुलेन सा ॥ १० ॥ राजन्! वह अनिन्द्य सुन्दरी रुचि विपुलके द्वारा स्तम्भित होनेके कारण न तो उठ सकी और न इन्द्रको कोई उत्तर ही दे सकी ॥ १० ॥
आकारं गुरुपत्न्यास्तु स विज्ञाय भृगूद्वहः । निजग्राह महातेजा योगेन बलवत् प्रभो ॥ ११ ॥ प्रभो! गुरुपत्नीका आकार एवं चेष्टा देखकर भृगुश्रेष्ठ विपुल उसका मनोभाव ताड़ गये थे; अतः उन महा तेजस्वी मुनिने योगद्वारा उसे बलपूर्वक काबूमें रखा ॥ ११ ॥
बबन्ध योगबन्धैश्च तस्याः सर्वेन्द्रियाणि सः । तां निर्विकारां दृष्ट्वा तु पुनरेव शचीपतिः ॥ १२ ॥ उवाच व्रीडितो राजंस्तां योगबलमोहिताम् । एह्येहीति ततः सा तु प्रतिवक्तुमियेष तम् ॥ १३ ॥ उन्होंने गुरुपत्नी रुचिकी सम्पूर्ण इन्द्रियोंको योग-सम्बन्धी बन्धनोंसे बाँध लिया था। राजन्! योगबलसे मोहित हुई रुचिको काम-विकारसे शून्य देख शचीपति इन्द्र लज्जित हो गये और फिर उससे बोले—'सुन्दरी! आओ, आओ।' उनका आवाहन सुनकर वह फिर उन्हें कुछ उत्तर देनेकी इच्छा करने लगी ॥ १२-१३ ॥
स तां वाचं गुरोः पत्न्या विपुलः पर्यवर्तयत् । भोः किमागपने कृत्यमिति तस्यास्तु निःसृता ॥ १४ ॥ यह देख विपुलने गुरुपत्नीकी उस वाणीको जिसे वह कहना चाहती थी, बदल दिया। उसके मुँहसे सहसा यह निकल पड़ा—'अजी! यहाँ तुम्हारे आनेका क्या प्रयोजन