भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 451, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 451

है?' ।। १४ ।। वक्त्राच्छशाङ्कसदृशाद् वाणी संस्कारभूषणा । व्रीडिता सा तु तद्वाक्यमुक्त्वा परवशा तदा ।। १५ ।। उस चन्द्रोपम मुखसे जब यह संस्कृत वाणी प्रकट हुई तब वह पराधीन हुई रुचि वह वाक्य कह देनेके कारण बहुत लज्जित हुई ।। १५ ।। पुरन्दरश्च तत्रस्थो बभूव विमना भृशम् । स तद्वैकृतमालक्ष्य देवराजो विशाम्पते ।। १६ ।। अवैक्षत सहस्राक्षस्तदा दिव्येन चक्षुषा । स ददर्श मुनिं तस्याः शरीरान्तरगोचरम् ।। १७ ।। वहाँ खड़े हुए इन्द्र उसकी पूर्वोक्त बात सुनकर मन-ही-मन बहुत दुःखी हुए। प्रजानाथ! उसके मनोविकार एवं भाव-परिवर्तनको लक्ष्य करके सहस्र नेत्रोंवाले देवराज इन्द्रने दिव्य दृष्टिसे उसकी ओर देखा। फिर तो उसके शरीरके भीतर विपुल मुनिपर उनकी दृष्टि पड़ी ।। १६-१७ ।। प्रतिबिम्बमिवादर्शे गुरुपत्न्याः शरीरगम् । स तं घोरेण तपसा युक्तं दृष्ट्वा पुरन्दरः ।। १८ ।। प्रावेपत सुसंत्रस्तः शापभीतस्तदा विभो । जैसे दर्पणमें प्रतिबिम्ब दिखायी देता है उसी प्रकार वे गुरुपत्नीके शरीरमें परिलक्षित हो रहे थे। प्रभो! घोर तपस्यासे युक्त विपुल मुनिको देखते ही इन्द्र शापके भयसे संत्रस्त हो थर-थर काँपने लगे ।। १८ १/२ ।। विमुच्य गुरुपत्नीं तु विपुलः सुमहातपाः । स्वकलेवरमाविश्य शक्रं भीतमथाब्रवीत् ।। १९ ।। इसी समय महातपस्वी विपुल गुरुपत्नीको छोड़कर अपने शरीरमें आ गये और डरे हुए इन्द्रसे बोले— ।। १९ ।।

विपुल उवाच

अजितेन्द्रिय दुर्बुद्धे पापात्मक पुरन्दर । न चिरं पूजयिष्यन्ति देवास्त्वां मानुषास्तथा ।। २० ।। विपुलने कहा— 'पापात्मा पुरन्दर! तेरी बुद्धि बड़ी खोटी है। तू सदा इन्द्रियोंका गुलाम बना रहता है। यदि यही दशा रही तो अब देवता तथा मनुष्य अधिक कालतक तेरी पूजा नहीं करेंगे ।। २० ।। किं नु तद्विस्मृतं शक्र न तन्मनसि ते स्थितम् । गौतमेनासि यन्मुक्तो भगाङ्कपरिचिह्नितः ।। २१ ।।