महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
है?' ।। १४ ।। वक्त्राच्छशाङ्कसदृशाद् वाणी संस्कारभूषणा । व्रीडिता सा तु तद्वाक्यमुक्त्वा परवशा तदा ।। १५ ।। उस चन्द्रोपम मुखसे जब यह संस्कृत वाणी प्रकट हुई तब वह पराधीन हुई रुचि वह वाक्य कह देनेके कारण बहुत लज्जित हुई ।। १५ ।। पुरन्दरश्च तत्रस्थो बभूव विमना भृशम् । स तद्वैकृतमालक्ष्य देवराजो विशाम्पते ।। १६ ।। अवैक्षत सहस्राक्षस्तदा दिव्येन चक्षुषा । स ददर्श मुनिं तस्याः शरीरान्तरगोचरम् ।। १७ ।। वहाँ खड़े हुए इन्द्र उसकी पूर्वोक्त बात सुनकर मन-ही-मन बहुत दुःखी हुए। प्रजानाथ! उसके मनोविकार एवं भाव-परिवर्तनको लक्ष्य करके सहस्र नेत्रोंवाले देवराज इन्द्रने दिव्य दृष्टिसे उसकी ओर देखा। फिर तो उसके शरीरके भीतर विपुल मुनिपर उनकी दृष्टि पड़ी ।। १६-१७ ।। प्रतिबिम्बमिवादर्शे गुरुपत्न्याः शरीरगम् । स तं घोरेण तपसा युक्तं दृष्ट्वा पुरन्दरः ।। १८ ।। प्रावेपत सुसंत्रस्तः शापभीतस्तदा विभो । जैसे दर्पणमें प्रतिबिम्ब दिखायी देता है उसी प्रकार वे गुरुपत्नीके शरीरमें परिलक्षित हो रहे थे। प्रभो! घोर तपस्यासे युक्त विपुल मुनिको देखते ही इन्द्र शापके भयसे संत्रस्त हो थर-थर काँपने लगे ।। १८ १/२ ।। विमुच्य गुरुपत्नीं तु विपुलः सुमहातपाः । स्वकलेवरमाविश्य शक्रं भीतमथाब्रवीत् ।। १९ ।। इसी समय महातपस्वी विपुल गुरुपत्नीको छोड़कर अपने शरीरमें आ गये और डरे हुए इन्द्रसे बोले— ।। १९ ।।
विपुल उवाच
अजितेन्द्रिय दुर्बुद्धे पापात्मक पुरन्दर । न चिरं पूजयिष्यन्ति देवास्त्वां मानुषास्तथा ।। २० ।। विपुलने कहा— 'पापात्मा पुरन्दर! तेरी बुद्धि बड़ी खोटी है। तू सदा इन्द्रियोंका गुलाम बना रहता है। यदि यही दशा रही तो अब देवता तथा मनुष्य अधिक कालतक तेरी पूजा नहीं करेंगे ।। २० ।। किं नु तद्विस्मृतं शक्र न तन्मनसि ते स्थितम् । गौतमेनासि यन्मुक्तो भगाङ्कपरिचिह्नितः ।। २१ ।।
इन्द्र! क्या तू उस घटनाको भूल गया? क्या तेरे मनमें उसकी याद नहीं रह गयी है? जब कि महर्षि गौतमने तेरे सारे शरीरमें भगके (हजार) चिह्न बनाकर तुझे जीवित छोड़ा था? ।। २१ ।।
जाने त्वां बालिशमतिमकृतात्मानमस्थिरम् । ममेयं रक्ष्यते मूढ गच्छ पाप यथागतम् ।। २२ ।। मैं जानता हूँ कि तू मूर्ख है, तेरा मन वशमें नहीं और तू महाचंचल है। पापी मूढ़! यह स्त्री मेरे द्वारा सुरक्षित है। तू जैसे आया है, उसी तरह लौट जा ।। २२ ।।
नाहं त्वामद्य मूढात्मन् दहेयं हि स्वतेजसा । कृपायमानस्तु न ते दग्धुमिच्छामि वासव ।। २३ ।। मूढचित्त इन्द्र! मैं अपने तेजसे तुझे जलाकर भस्म कर सकता हूँ। केवल दया करके ही तुझे इस समय जलाना नहीं चाहता ।। २३ ।।
स च घोरतमो धीमान् गुरुर्मे पापचेतसम् । दृष्ट्वा त्वां निर्दहेदद्य क्रोधदीप्तेन चक्षुषा ।। २४ ।। मेरे बुद्धिमान् गुरु बड़े भयंकर हैं। वे तुझ पापात्माको देखते ही आज क्रोधसे उदीप्त हुई दृष्टिद्वारा दग्ध कर डालेंगे ।। २४ ।।
नैवं तु शक्र कर्तव्यं पुनर्मान्याश्च ते द्विजाः । मा गमः ससुतामात्यः क्षयं ब्रह्मबलार्दितः ।। २५ ।। इन्द्र! आजसे फिर कभी ऐसा काम न करना। तुझे ब्राह्मणोंका सम्मान करना चाहिये, अन्यथा कहीं ऐसा न हो कि तुझे ब्रह्मतेजसे पीड़ित होकर पुत्रों और मन्त्रियोंसहित कालके गालमें जाना पड़े ।। २५ ।।
अमरोऽस्मीति यद्बुद्धिं समास्थाय प्रवर्त्तसे । मावमंस्था न तपसा नसाध्यं नाम किंचन ।। २६ ।। मैं अमर हूँ—ऐसी बुद्धिका आश्रय लेकर यदि तू स्वेच्छाचारमें प्रवृत्त हो रहा है तो (मैं तुझे सचेत किये देता हूँ) यों किसी तपस्वीका अपमान न किया कर; क्योंकि तपस्यासे कोई भी कार्य असाध्य नहीं है (तपस्वी अमरोंको भी मार सकता है) ।। २६ ।।
भीष्म उवाच
तत् श्रुत्वा वचनं शक्रो विपुलस्य महात्मनः । अकिंचिदुक्त्वा व्रीडार्तस्तत्रैवान्तरधीयत ।। २७ ।। भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! महात्मा विपुलका वह कथन सुनकर इन्द्र बहुत लज्जित हुए और कुछ भी उत्तर न देकर वहीं अन्तर्धान हो गये ।। २७ ।।
मुहूर्तयाते तस्मिंस्तु देवशर्मा महातपाः । कृत्वा यज्ञं यथाकाममाजगाम स्वमाश्रमम् ।। २८ ।।
उनके गये अभी एक ही मुहूर्त बीतने पाया था कि महा तपस्वी देवशर्मा इच्छानुसार यज्ञ पूर्ण करके अपने आश्रमपर लौट आये ॥ २८ ॥
आगतेऽथ गुरौ राजन् विपुलः प्रियकर्मकृत् । रक्षितां गुरवे भार्यां न्यवेदयदनिन्दिताम् ॥ २९ ॥ राजन्! गुरुके आनेपर उनका प्रिय कार्य करनेवाले विपुलने अपने द्वारा सुरक्षित हुई उनकी सती-साध्वी भार्या रुचिको उन्हें सौंप दिया ॥ २९ ॥
अभिवाद्य च शान्तात्मा स गुरुं गुरुवत्सलः । विपुलः पर्युपातिष्ठद् यथापूर्वमशङ्कितः ॥ ३० ॥ शान्त चित्तवाले गुरुप्रेमी विपुल गुरुदेवको प्रणाम करके पहलेकी ही भाँति निर्भीक होकर उनकी सेवामें उपस्थित हुए ॥ ३० ॥
विश्रान्ताय ततस्तस्मै सहासीनाय भार्यया । निवेदयामास तदा विपुलः शक्रकर्म तत् ॥ ३१ ॥ जब गुरुजी विश्राम करके अपनी पत्नीके साथ बैठे, तब विपुलने इन्द्रकी वह सारी करतूत उन्हें बतायी ॥ ३१ ॥
तत् श्रुत्वा स मुनिस्तुष्टो विपुलस्य प्रतापवान् । बभूव शीलवृत्ताभ्यां तपसा नियमेन च ॥ ३२ ॥ यह सुनकर प्रतापी मुनि देवशर्मा विपुलके शील, सदाचार, तप और नियमसे बहुत संतुष्ट हुए ॥ ३२ ॥
विपुलस्य गुरौ वृत्तिं भक्तिमात्मनि तत्प्रभुः । धर्मे च स्थिरतां दृष्ट्वा साधु साध्वित्यभाषत ॥ ३३ ॥ विपुलकी गुरुसेवावृत्ति, अपने प्रति भक्ति और धर्मविषयक दृढ़ता देखकर गुरुने 'बहुत अच्छा, बहुत अच्छा' कहकर उनकी प्रशंसा की ॥ ३३ ॥
प्रतिलभ्य च धर्मात्मा शिष्यं धर्मपरायणम् । वरेणच्छन्दयामास देवशर्मा महामतिः ॥ ३४ ॥ परम बुद्धिमान् धर्मात्मा देवशर्माने अपने धर्म-परायण शिष्य विपुलको पाकर उन्हें इच्छानुसार वर माँगनेको कहा ॥ ३४ ॥
स्थितिं च धर्मे जग्राह स तस्माद् गुरुवत्सलः । अनुज्ञातश्च गुरुणा चचारानुत्तमं तपः ॥ ३५ ॥ गुरुवत्सल विपुलने गुरुसे यही वर माँगा कि 'मेरी धर्ममें निरन्तर स्थिति बनी रहे।' फिर गुरुकी आज्ञा लेकर उन्होंने सर्वोत्तम तपस्या आरम्भ की ॥ ३५ ॥
तथैव देवशर्मापि सभार्यः स महातपाः । निर्भयो बलवृत्रघ्नाच्चचार विजने वने ॥ ३६ ॥
महा तपस्वी देवशर्मा भी बल और वृत्रासुरका वध करनेवाले इन्द्रसे निर्भय हो पत्नीसहित उस निर्जन वनमें विचरने लगे ।। ३६ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विपुलोपाख्याने एकचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४१ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विपुलका उपाख्यानविषयक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४१ ।।
द्विचत्वारिंशोऽध्यायः
विपुलका गुरुकी आज्ञासे दिव्य पुष्प लाकर उन्हें देना और अपने द्वारा किये गये दुष्कर्मका स्मरण करना
भीष्म उवाच
विपुलस्त्वकरोत् तीव्रं तपः कृत्वा गुरोर्वचः ।
तपोयुक्तमथात्मानममन्यत स वीर्यवान् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! विपुलने गुरुकी आज्ञाका पालन करके बड़ी कठोर तपस्या की। इससे उनकी शक्ति बहुत बढ़ गयी और वे अपनेको बड़ा भारी तपस्वी मानने लगे ॥ १ ॥
स तेन कर्मणा स्पर्धन् पृथिवीं पृथिवीपते ।
चचार गतभीः प्रीतो लब्धकीर्तिर्वरो नृप ॥ २ ॥
पृथ्वीनाथ! विपुल उस तपस्याद्वारा मन-ही-मन गर्वका अनुभव करके दूसरोंसे स्पर्धा रखने लगे। नरेश्वर! उन्हें गुरुसे कीर्ति और वरदान दोनों प्राप्त हो चुके थे; अतः वे निर्भय एवं संतुष्ट होकर पृथ्वीपर विचरने लगे ॥ २ ॥
उभौ लोकौ जितौ चापि तथैवामन्यत प्रभुः ।
कर्मणा तेन कौरव्य तपसा विपुलेन च ॥ ३ ॥
कुरुनन्दन! शक्तिशाली विपुल उस गुरुपत्नी-संरक्षणरूपी कर्म तथा प्रचुर तपस्याद्वारा ऐसा समझने लगे कि मैंने दोनों लोक जीत लिये ॥ ३ ॥
अथ काले व्यतिक्रान्ते कस्मिंश्चित् कुरुनन्दन ।
रुच्या भगिन्या आदानं प्रभूतधनधान्यवत् ॥ ४ ॥
कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले युधिष्ठिर! तदनन्तर कुछ समय बीत जानेपर गुरुपत्नी रुचिकी बड़ी बहिनके यहाँ विवाहोत्सवका अवसर उपस्थित हुआ, जिसमें प्रचुर धन-धान्यका व्यय होनेवाला था ॥ ४ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु दिव्या काचिद् वराङ्गना ।
बिभ्रती परमं रूपं जगामाथ विहायसा ॥ ५ ॥
उन्हीं दिनों एक दिव्य लोककी सुन्दरी दिव्यांगना परम मनोहर रूप धारण किये आकाशमार्गसे कहीं जा रही थी ॥ ५ ॥
तस्याः शरीरात् पुष्पाणि पतितानि महीतले ।
तस्याश्रमस्याविदूरे दिव्यगन्धानि भारत ॥ ६ ॥
भारत! उसके शरीरसे कुछ दिव्य पुष्प, जिनसे दिव्य सुगन्ध फैल रही थी, देवशर्माके आश्रमके पास ही पृथ्वीपर गिरे ॥ ६ ॥
तान्यगृह्णात् ततो राजन् रुचिर्र्ललितलोचना ।
तदा निमन्त्रकस्तस्या अङ्गेभ्यः क्षिप्रमागमत् ॥ ७ ॥
राजन्! तब मनोहर नेत्रोंवाली रुचिने वे फूल ले लिये। इतनेमें ही अंगदेशसे उसका शीघ्र ही बुलावा आ गया ॥ ७ ॥
तस्या हि भगिनी तात ज्येष्ठा नाम्ना प्रभावती ।
भार्या चित्ररथस्याथ बभूवाङ्ङ्गेश्वरस्य वै ॥ ८ ॥
तात! रुचिकी बड़ी बहिन, जिसका नाम प्रभावती था, अंगराज चित्ररथको ब्याही गयी थी ॥ ८ ॥
पिनह्य तानि पुष्पाणि केशेषु वरवर्णिनी ।
आमन्त्रिता ततोऽगच्छद् रुचिरङ्गपतेर्गृहम् ॥ ९ ॥
उन दिव्य फूलोंको अपने केशोंमें गूँथकर सुन्दरी रुचि अंगराजके घर आमन्त्रित होकर गयी ॥ ९ ॥
पुष्पाणि तानि दृष्ट्वा तु तदाङ्गेन्द्रवराङ्गना ।
भगिनीं चोदयामास पुष्पार्थे चारुलोचना ॥ १० ॥
उस समय सुन्दर नेत्रोंवाली अंगराजकी सुन्दरी रानी प्रभावतीने उन फूलोंको देखकर अपनी बहिनसे वैसे ही फूल मँगवा देनेका अनुरोध किया ॥ १० ॥
सा भर्त्रे सर्वमाचष्ट रुचिः सुरुचिरानना ।
भगिन्या भाषितं सर्वमृषिस्तच्चाभ्यनन्दत ॥ ११ ॥
आश्रममें लौटनेपर सुन्दर मुखवाली रुचिने बहिनकी कही हुई सारी बातें अपने स्वामीसे कह सुनायीं। सुनकर ऋषिने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली ॥ ११ ॥
ततो विपुलमानाय्य देवशर्मा महातपाः ।
पुष्पार्थे चोदयामास गच्छ गच्छेति भारत ॥ १२ ॥
भारत! तब महा तपस्वी देवशर्माने विपुलको बुलवाकर उन्हें फूल लानेके लिये आदेश दिया और कहा, ‘जाओ, जाओ’ ॥ १२ ॥
विपुलस्तु गुरोर्वाक्यमविचार्य महातपाः ।
स तथेत्यब्रवीद् राजंस्तं च देशं जगाम ह ॥ १३ ॥
यस्मिन् देशे तु तान्यासन् पतितानि नभस्तलात् ।
अम्लानान्यपि तत्रासन् कुसुमान्यपराण्यपि ॥ १४ ॥
राजन्! गुरुकी आज्ञा पाकर महा तपस्वी विपुल उसपर कोई अन्यथा विचार न करके ‘बहुत अच्छा’ कहते हुए उस स्थानकी ओर चल दिये जहाँ आकाशसे वे फूल गिरे थे। वहाँ और भी बहुत-से फूल पड़े हुए थे, जो कुम्हलाये नहीं थे ॥ १३-१४ ॥
स ततस्तानि जग्राह दिव्यानि रुचिराणि च ।
प्राप्तानि स्वेन तपसा दिव्यगन्धानि भारत ॥ १५ ॥
भारत! तदनन्तर अपने तपसे प्राप्त हुए उन दिव्य सुगन्धसे युक्त मनोहर दिव्य पुष्पोंको विपुलने उठा लिया ॥ १५ ॥
सम्प्राप्य तानि प्रीतात्मा गुरोर्वचनकारकः ।
तदा जगाम तूर्णं च चम्पां चम्पकमालिनीम् ॥ १६ ॥
गुरुकी आज्ञाका पालन करनेवाले विपुल उन फूलोंको पाकर मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और तुरंत ही चम्पाके वृक्षोंसे घिरी हुई चम्पा नगरीकी ओर चल दिये ॥ १६ ॥
स वने निर्जने तात ददर्श मिथुनं नृणाम् ।
चक्रवत् परिवर्तन्तं गृहीत्वा पाणिना करम् ॥ १७ ॥
तात! एक निर्जन वनमें आनेपर उन्होंने स्त्री-पुरुषके एक जोड़ेको देखा, जो एक-दूसरेका हाथ पकड़कर कुम्हारके चाकके समान घूम रहे थे ॥ १७ ॥
तत्रैकस्तूर्णमगमत् तत्पदे च विवर्तयन् ।
एकस्तु न तदा राजंश्चक्रतुः कलहं ततः ॥ १८ ॥
राजन्! उनमेंसे एकने अपनी चाल तेज कर दी और दूसरेने वैसा नहीं किया। इसपर दोनों आपसमें झगड़ने लगे ॥ १८ ॥
त्वं शीघ्रं गच्छसीत्येकोऽब्रवीन्नेति तथा परः ।
नेति नेति च तौ राजन् परस्परमथोचतुः ॥ १९ ॥
नरेश्वर! एकने कहा—‘तुम जल्दी-जल्दी चलते हो।’ दूसरेने कहा, ‘नहीं।’ इस प्रकार दोनों एक-दूसरेपर दोषारोपण करते हुए एक-दूसरेको ‘नहीं-नहीं’ कह रहे थे ॥ १९ ॥
तयोर्विस्पर्धतोरेवं शपथोऽयमभूत् तदा ।
सहसोद्दिश्य विपुलं ततो वाक्यमथोचतुः ॥ २० ॥
इस प्रकार एक-दूसरेसे स्पर्धा रखते हुए उन दोनोंमें शपथ खानेकी नौबत आ गयी। फिर तो सहसा विपुलको लक्ष्य करके वे दोनों इस प्रकार बोले— ॥
आवयोरनृतं प्राह यस्तस्याभूद् द्विजस्य वै ।
विपुलस्य परे लोके या गतिः सा भवेदिति ॥ २१ ॥
‘हमलोगोंमेंसे जो भी झूठ बोलता है उसकी वही गति होगी जो परलोकमें ब्राह्मण विपुलके लिये नियत हुई है’ ॥ २१ ॥
एतत् श्रुत्वा तु विपुलो विषण्णवदनोऽभवत् ।
एवं तीव्रतपाश्चाहं कष्टश्चायं परिश्रमः ॥ २२ ॥
यह सुनकर विपुलके मुँहपर विषाद छा गया। ‘मैं ऐसी कठोर तपस्या करनेवाला हूँ तो भी मेरी दुर्गति होगी। तब तो तपस्या करनेका वह घोर परिश्रम कष्टदायक ही सिद्ध हुआ ॥ २२ ॥
मिथुनस्यास्य किं मे स्यात् कृतं पापं यथा गतिः । अनिष्टा सर्वभूतानां कीर्तितानेन मेऽद्य वै ॥ २३ ॥ ‘मेरा ऐसा कौन-सा पाप है जिसके अनुसार मेरी वह दुर्गति होगी जो समस्त प्राणियोंके लिये अनिष्ट है एवं इस स्त्री-पुरुषके जोड़ेको मिलनेवाली है, जिसका इन्होंने आज मेरे समक्ष वर्णन किया है’ ॥ २३ ॥ एवं संचिन्तयन्नेव विपुलो राजसत्तम । अवाङ्मुखो दीनमना दध्यौ दुष्कृतमात्मनः ॥ २४ ॥ नृपश्रेष्ठ! ऐसा सोचते हुए ही विपुल नीचे मुँह किये दीनचित्त हो अपने दुष्कर्मका स्मरण करने लगे ॥ २४ ॥ ततः षडन्यान् पुरुषानक्षैः काञ्चनराजतैः । अपश्यद् दीव्यमानान् वै लोभहर्षान्वितांस्तथा ॥ २५ ॥ कुर्वतः शपथं तेन यः कृतो मिथुनेन तु । विपुलं वै समुद्दिश्य तेऽपि वाक्यमथाब्रुवन् ॥ २६ ॥ तदनन्तर विपुलको दूसरे छः पुरुष दिखायी पड़े, जो सोने-चाँदीके पासे लेकर जूआ खेल रहे थे और लोभ तथा हर्षमें भरे हुए थे। वे भी वही शपथ कर रहे थे जो पहले स्त्री-पुरुषके जोड़ेने की थी। उन्होंने विपुलको लक्ष्य करके कहा— ॥ २५-२६ ॥
लोभमास्थाय योऽस्माकं विषमं कर्तुमुत्सहेत् । विपुलस्य परे लोके या गतिस्तामवाप्नुयात् ।। २७ ।। ‘हमलोगोंमेंसे जो लोभका आश्रय लेकर बेईमानी करनेका साहस करेगा, उसको वही गति मिलेगी, जो परलोकमें विपुलको मिलनेवाली है— ।। २७ ।।
एतत् श्रुत्वा तु विपुलो नापश्यद् धर्मसंकरम् । जन्मप्रभृति कौरव्य कृतपूर्वमथात्मनः ।। २८ ।। कुरुनन्दन! यह सुनकर विपुलने जन्मसे लेकर वर्तमान समयतकके अपने समस्त कर्मोंका स्मरण किया; किंतु कभी कोई धर्मके साथ पापका मिश्रण हुआ हो, ऐसा नहीं दिखायी दिया ।। २८ ।।
सम्प्रदध्यौ तथा राजन्नग्नावग्निरिवाहितः । दह्यमानेन मनसा शापं श्रुत्वा तथाविधम् ।। २९ ।। राजन्! परंतु अपने विषयमें वैसा शाप सुनकर जैसे एक आगमें दूसरी आग रख दी गयी हो और उसकी ज्वाला और भी बढ़ गयी हो, उसी प्रकार विपुलका हृदय शोकाग्निसे दग्ध होने लगा और उसी अवस्थामें वे पुनःअपने कार्योंपर विचार करने लगे ।। २९ ।।
तस्य चिन्तयतस्तात वह्व्यो दिननिशा ययुः ।
इदमासीन्मनसि स रुच्या रक्षणकारितम् ।। ३० ।।
तात! इस प्रकार चिन्ता करते हुए उनके कई दिन और कई रातें बीत गयीं। तब गुरुपत्नी रुचिकी रक्षाके कारण उनके मनमें ऐसा विचार उठा— ।। ३० ।।
लक्षणं लक्षणेनैव वदनं वदनेन च ।
विधाय न मया चोक्तं सत्यमेतद् गुरोस्तथा ।। ३१ ।।
‘मैंने जब गुरुपत्नीकी रक्षाके लिये उनके शरीरमें सूक्ष्मरूपसे प्रवेश किया था तब मेरी लक्षणेन्द्रिय उनकी लक्षणेन्द्रियसे और मुख उनके मुखसे संयुक्त हुआ था। ऐसा अनुचित कार्य करके भी मैंने गुरुजीको यह सच्ची बात नहीं बतायी’ ।। ३१ ।।
एतदात्मनि कौरव्य दुष्कृतं विपुलस्तदा ।
अमन्यत महाभाग तथा तच्च न संशयः ।। ३२ ।।
महाभाग कुरुनन्दन! उस समय विपुलने अपने मनमें इसीको पाप माना और निस्संदेह बात भी ऐसी ही थी ।। ३२ ।।
स चम्पां नगरीमेत्य पुष्पाणि गुरवे ददौ ।
पूजयामास च गुरुं विधिवत् स गुरुप्रियः ।। ३३ ।।
चम्पानगरीमें जाकर गुरुप्रेमी विपुलने वे फूल गुरुजीको अर्पित कर दिये और उनका विधिपूर्वक पूजन किया ।। ३३ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विपुलोपाख्याने
द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विपुलका
उपाख्यानविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४२ ।।
त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः
देवशर्माका विपुलको निर्दोष बताकर समझाना और भीष्मका युधिष्ठिरको स्त्रियोंकी रक्षाके लिये आदेश देना
भीष्म उवाच
तमागतमभिप्रेक्ष्य शिष्यं वाक्यमथाब्रवीत् ।
देवशर्मा महातेजा यत् तत् शृणु जनाधिप ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**नरेश्वर! अपने शिष्य विपुलको आया हुआ देख महातेजस्वी देवशर्माने उनसे जो बात कही, वही बताता हूँ, सुनो ॥ १ ॥
देवशर्मोवाच
किं ते विपुल दृष्टं वै तस्मिन् शिष्य महावने ।
ते त्वां जानन्ति विपुल आत्मा च रुचिरेव च ॥ २ ॥
**देवशर्माने पूछा—**मेरे प्रिय शिष्य विपुल! तुमने उस महान् वनमें क्या देखा था? वे लोग तो तुम्हें जानते हैं। उन्हें तुम्हारी अन्तरात्माका तथा मेरी पत्नी रुचिका भी पूरा परिचय प्राप्त है ॥ २ ॥
विपुल उवाच
ब्रह्मर्षे मिथुनं किं तत् के च ते पुरुषा विभो ।
ये मां जानन्ति तत्त्वेन यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ ३ ॥
**विपुलने कहा—**ब्रह्मर्षे! मैंने जिसे देखा था, वह स्त्री-पुरुषका जोड़ा कौन था? तथा वे छः पुरुष भी कौन थे जो मुझे अच्छी तरह जानते थे और जिनके विषयमें आप भी मुझसे पूछ रहे हैं? ॥ ३ ॥
देवशर्मोवाच
यद् वै तन्मिथुनं ब्रह्मन्नहोरात्रं हि विद्धि तत् ।
चक्रवत् परिवर्तैत तत् ते जानाति दुष्कृतम् ॥ ४ ॥
ये च ते पुरुषा विप्र अक्षैर्दीव्यन्ति हृष्टवत् ।
ऋतूंस्तानभिजानीहि ते ते जानन्ति दुष्कृतम् ॥ ५ ॥
**देवशर्माने कहा—**ब्रह्मन्! तुमने जो स्त्री-पुरुषका जोड़ा देखा था उसे दिन और रात्रि समझो। वे दोनों चक्रवत् घूमते रहते हैं, अतः उन्हें तुम्हारे पापका पता है। विप्रवर! तथा जो अत्यन्त हर्षमें भरकर जूआ खेलते हुए छः पुरुष दिखायी दिये उन्हें छः ऋतु जानो; वे भी तुम्हारे पापको जानते हैं ॥ ४-५ ॥
न मां कश्चिद् विजानीत इति कृत्वा न विश्वसेत् ।
नरो रहसि पापात्मा पापकं कर्म वै द्विज ॥ ६ ॥
ब्रह्मन्! पापात्मा मनुष्य एकान्तमें पापकर्म करके ऐसा विश्वास न करे कि कोई मुझे इस पापकर्ममें लिप्त नहीं जानता है॥ ६ ॥
कुर्वाणं हि नरं कर्म पापं रहसि सर्वदा ।
पश्यन्ति ऋतवश्चापि तथा दिननिशेऽप्युत ॥ ७ ॥
एकान्तमें पापकर्म करते हुए पुरुषको ऋतुएँ तथा रात-दिन सदा देखते रहते हैं॥ ७॥
तथैव हि भवेयुस्ते लोकाः पापकृतो यथा ।
कृत्वा नाचक्षतः कर्म मम तच्च यथाकृतम् ॥ ८ ॥
तुमने मेरी स्त्रीकी रक्षा करते समय जिस प्रकार वह पापकर्म किया था, उसे करके भी मुझे बताया नहीं था; अतः तुम्हें वे ही पापाचारियोंके लोक मिल सकते थे॥ ८॥
ते त्वां हर्षस्मितं दृष्ट्वा गुरोः कर्मानिवेदकम् ।
स्मारयन्तस्तथा प्राहुस्ते यथा श्रुतवान् भवान् ॥ ९ ॥
गुरुको अपना पापकर्म न बताकर हर्ष और अभिमानमें भरा देख वे पुरुष तुम्हें अपने कर्मकी याद दिलाते हुए वैसी बातें बोल रहे थे, जिन्हें तुमने अपने कानों सुना है॥ ९॥
अहोरात्रं विजानाति ऋतवश्चापि नित्यशः ।
पुरुषे पापकं कर्म शुभं वा शुभकर्मिणः ॥ १० ॥
पापीमें जो पापकर्म है और शुभकर्मी मनुष्यमें जो शुभकर्म है, उन सबको दिन, रात और ऋतुएँ सदा जानती रहती हैं॥ १०॥
तत् त्वया मम यत् कर्म व्यभिचाराद् भयात्मकम् ।
नाख्यातमिति जानन्तस्ते त्वामाहुस्तथा द्विज ॥ ११ ॥
ब्रह्मन्! तुमने मुझसे अपना वह कर्म नहीं बताया जो व्यभिचार-दोषके कारण भयरूप था। वे जानते थे, इसलिये उन्होंने तुम्हें बता दिया॥ ११॥
तेनैव हि भवेयुस्ते लोकाः पापकृतो यथा ।
कृत्वा नाचक्षतः कर्म मम यच्च त्वया कृतम् ॥ १२ ॥
पापकर्म करके न बतानेवाले पुरुषको, जैसा कि तुमने मेरे साथ किया है, वे ही पापाचारियोंके लोक प्राप्त होते हैं॥ १२॥
त्वयाशक्या च दुर्वृत्त्या रक्षितुं प्रमदा द्विज ।
न च त्वं कृतवान् किंचिदतः प्रीतोऽस्मि तेन ते ॥ १३ ॥
ब्रह्मन्! यौवनमदसे उन्मत्त रहनेवाली उस स्त्रीकी (उसके शरीरमें प्रवेश किये बिना) रक्षा करना तुम्हारे वशकी बात नहीं थी। अतः तुमने अपनी ओरसे कोई पाप नहीं किया; इसलिये मैं तुमपर प्रसन्न हूँ॥
(मनोदोषविहीनानां न दोषः स्यात् तथा तव ।
अन्यथाऽऽलिङ्ग्यते कान्ता स्नेहेन दुहितान्यथा ।। जो मानसिक दोषसे रहित हैं उन्हें पाप नहीं लगता। यही बात तुम्हारे लिये भी हुई है। अपनी प्राणवल्लभा पत्नीका आलिंगन और भावसे किया जाता है और अपनी पुत्रीका और भावसे; अर्थात् उसे वात्सल्यस्नेहसे गले लगाया जाता है ।। निष्कषायो विशुद्धस्त्वं रुच्यावेशान्न दूषितः ।) तुम्हारे मनमें राग नहीं है। तुम सर्वथा विशुद्ध हो, इसलिये रुचिके शरीरमें प्रवेश करके भी दूषित नहीं हुए हो ।। यदि त्वहं त्वां दुर्वृत्तमद्राक्षं द्विजसत्तम । शपेयं त्वामहं क्रोधान्न मेऽत्रास्ति विचारणा ।। १४ ।। द्विजश्रेष्ठ! यदि मैं इस कर्ममें तुम्हारा दुराचार देखता तो कुपित होकर तुम्हें शाप दे देता और ऐसा करके मेरे मनमें कोई अन्यथा विचार या पश्चात्ताप नहीं होता ।। १४ ।। सज्जन्ति पुरुषे नार्यः पुंसां सोऽर्थश्च पुष्कलः । अन्यथारक्षतः शापोऽभविष्यत् ते मतिश्च मे ।। १५ ।। स्त्रियाँ पुरुषमें आसक्त होती हैं और पुरुषोंका भी इसमें पूर्णतः वैसा ही भाव होता है। यदि तुम्हारा भाव उसकी रक्षा करनेके विपरीत होता तो तुम्हें शाप अवश्य प्राप्त होता और मेरा विचार तुम्हें शाप देनेका अवश्य हो जाता ।। १५ ।। रक्षिता च त्वया पुत्र मम चापि निवेदिता । अहं ते प्रीतिमांस्तात स्वस्थः स्वर्गं गमिष्यसि ।। १६ ।। बेटा! तुमने यथाशक्ति मेरी स्त्रीकी रक्षा की है और यह बात मुझे बतायी है, अतः मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तात! तुम स्वस्थ रहकर स्वर्गलोकमें जाओगे ।। इत्युक्त्वा विपुलं प्रीतो देवशर्मा महार्नृषिः । मुमोद स्वर्गमास्थाय सहभार्यः सशिष्यकः ।। १७ ।। विपुलसे ऐसा कहकर प्रसन्न हुए महर्षि देवशर्मा अपनी पत्नी और शिष्यके साथ स्वर्गमें जाकर वहाँका सुख भोगने लगे ।। १७ ।। इदमाख्यातवांश्चापि ममाख्यानं महामुनिः । मार्कण्डेयः पुरा राजन् गङ्गाकूले कथान्तरे ।। १८ ।। राजन्! पूर्वकालमें गंगाके तटपर कथा-वार्ताके बीचमें ही महामुनि मार्कण्डेयने मुझे यह आख्यान सुनाया था ।। १८ ।। तस्माद् ब्रवीमि पार्थ त्वां स्त्रियो रक्ष्याः सदैव च । उभयं दृश्यते तासु सततं साध्वसाधु च ।। १९ ।। अतः कुन्तीनन्दन! मैं तुमसे कहता हूँ कि तुम्हें स्त्रियोंकी सदा ही रक्षा करनी चाहिये। स्त्रियोंमें भली और बुरी दोनों बातें हमेशा देखी जाती हैं ।। १९ ।। स्त्रियः साध्यो महाभागाः सम्मता लोकमातरः ।
धारयन्ति महीं राजन्निमां सवनकाननाम् ॥ २० ॥
राजन्! यदि स्त्रियाँ साध्वी एवं पतिव्रता हों तो बड़ी सौभाग्यशालिनी होती हैं। संसारमें उनका आदर होता है और वे सम्पूर्ण जगत्की माता समझी जाती हैं। इतना ही नहीं, वे अपने पातिव्रत्यके प्रभावसे वन और काननोंसहित इस सम्पूर्ण पृथ्वीको धारण करती हैं ॥
असाध्यश्चापि दुर्वृत्ताः कुलघ्नाः पापनिश्चयाः ।
विज्ञेया लक्षणैर्दुष्टैः स्वगात्रसहजैर्नृप ॥ २१ ॥
किंतु दुराचारिणी असती स्त्रियाँ कुलका नाश करनेवाली होती हैं, उनके मनमें सदा पाप ही बसता है। नरेश्वर! फिर ऐसी स्त्रियोंको उनके शरीरके साथ ही उत्पन्न हुए बुरे लक्षणोंसे पहचाना जा सकता है ॥
एवमेतासु रक्षा वै शक्या कर्तुं महात्मभिः ।
अन्यथा राजशार्दूल न शक्या रक्षितुं स्त्रियः ॥ २२ ॥
नृपश्रेष्ठ! महामनस्वी पुरुषोंद्वारा ही ऐसी स्त्रियोंकी इस प्रकार रक्षा की जा सकती है; अन्यथा स्त्रियोंकी रक्षा असम्भव है ॥ २२ ॥
एता हि मनुजव्याघ्र तीक्ष्णास्तीक्ष्णपराक्रमाः ।
नासामस्ति प्रियो नाम मैथुने सङ्गमेति यः ॥ २३ ॥
पुरुषसिंह! ये स्त्रियाँ तीखे स्वभावकी तथा दुस्सह शक्तिवाली होती हैं। कोई भी पुरुष इनका प्रिय नहीं है। मैथुनकालमें जो इनका साथ देता है वही उतने ही समयके लिये प्रिय होता है ॥ २३ ॥
एताः कृत्याश्च कार्याश्च कृताश्च भरतर्षभ ।
न चैकस्मिन् रमन्त्येताः पुरुषे पाण्डुनन्दन ॥ २४ ॥
भरतश्रेष्ठ! पाण्डुनन्दन! ये स्त्रियाँ कृत्याओंके समान मनुष्योंके प्राण लेनेवाली होती हैं। उन्हें जब पहले पुरुष स्वीकार कर लेता है तब आगे चलकर वे दूसरेके स्वीकार करने योग्य भी बन जाती हैं, अर्थात् व्यभिचारदोषके कारण एक पुरुषको छोड़कर दूसरेपर आसक्त हो जाती हैं। किसी एक ही पुरुषमें इनका सदा अनुराग नहीं बना रहता ॥ २४ ॥
नासां स्नेहो नरैः कार्यस्तथैवेर्ष्या जनेश्वर ।
खेदमास्थाय भुञ्जीत धर्ममास्थाय चैव ह ॥ २५ ॥
(अनूताविह पर्वादिदोषवर्जं नराधिप ।)
नरेश्वर! मनुष्योंको स्त्रियोंके प्रति न तो विशेष आसक्त होना चाहिये और न उनसे ईर्ष्या ही करनी चाहिये। वैराग्यपूर्वक धर्मका आश्रय लेकर पर्व आदि दोषका त्याग करते हुए ऋतुस्नानके पश्चात् उनका उपभोग करना चाहिये ॥ २५ ॥
निहन्यादन्यथाकुर्वन् नरः कौरवनन्दन ।
सर्वथा राजशार्दूल मुक्तिः सर्वत्र पूज्यते ॥ २६ ॥
कौरवनन्दन! इसके विपरीत बर्ताव करनेवाला मनुष्य विनाशको प्राप्त होता है। नृपश्रेष्ठ! सर्वत्र सब प्रकारसे मोक्षका ही सम्मान किया जाता है ॥ २६ ॥
तेनैकेन तु रक्षा वै विपुलेन कृता स्त्रियाः ।
नान्यः शक्तस्त्रिलोकेऽस्मिन् रक्षितुं नृप योषितम् ॥ २७ ॥
नरेश्वर! एकमात्र विपुलने ही स्त्रीकी रक्षा की थी। इस त्रिलोकीमें दूसरा कोई ऐसा पुरुष नहीं है जो युवती स्त्रियोंकी इस प्रकार रक्षा कर सके ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विपुलोपाख्याने
त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विपुलका
उपाख्यानविषयक तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २९ श्लोक हैं)
चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः
कन्या-विवाहके सम्बन्धमें पात्रविषयक विभिन्न विचार
युधिष्ठिर उवाच
यन्मूलं सर्वधर्माणां स्वजनस्य गृहस्य च ।
पितृदेवातिथीनां च तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! जो समस्त धर्मोंका, कुटुम्बीजनोंका, घरका तथा देवता, पितर और अतिथियोंका मूल है, उस कन्यादानके विषयमें मुझे कुछ उपदेश कीजिये ॥ १ ॥
अयं हि सर्वधर्माणां धर्मश्चिन्त्यतमो मतः ।
कीदृशस्य प्रदेया स्यात् कन्येति वसुधाधिप ॥ २ ॥
पृथ्विनाथ! सब धर्मोंसे बढ़कर यही चिन्तन करने योग्य धर्म माना गया है कि कैसे पात्रको कन्या देनी चाहिये? ॥ २ ॥
भीष्म उवाच
शीलवृत्ते समाज्ञाय विद्यां योनिं च कर्म च ।
सद्भिरेवं प्रदातव्या कन्या गुणयुते वरे ॥ ३ ॥
भीष्मजीने कहा— बेटा! सत्पुरुषोंको चाहिये कि वे पहले वरके शील-स्वभाव, सदाचार, विद्या, कुल, मर्यादा और कार्योंकी जाँच करें। फिर यदि वह सभी दृष्टियोंसे गुणवान् प्रतीत हो तो उसे कन्या प्रदान करें ॥ ३ ॥
ब्राह्मणानां सतामेष ब्राह्मो धर्मो युधिष्ठिर ।
आवाह्यमावहेदेवं यो दद्यादनुकूलतः ॥ ४ ॥
शिष्टानां क्षत्रियाणां च धर्म एष सनातनः ।
युधिष्ठिर! इस प्रकार ब्याहने योग्य वरको बुलाकर उसके साथ कन्याका विवाह करना उत्तम ब्राह्मणोंका धर्म—ब्राह्मविवाह है। जो धन आदिके द्वारा वरपक्षको अनुकूल करके कन्यादान किया जाता है, वह शिष्ट ब्राह्मण और क्षत्रियोंका सनातन धर्म कहा जाता है। (इसीको प्राजापत्य विवाह कहते हैं) ॥ ४ १/२ ॥
आत्माभिप्रेतमुत्सृज्य कन्याभिप्रेत एव यः ॥ ५ ॥
अभिप्रेता च या यस्य तस्मै देया युधिष्ठिर ।
गान्धर्वमिति तं धर्मं प्राहुर्वेदविदो जनाः ॥ ६ ॥
युधिष्ठिर! जब कन्याके माता-पिता अपने पसंद किये हुए वरको छोड़कर जिसे कन्या पसंद करती हो तथा जो कन्याको चाहता हो ऐसे वरके साथ उस कन्याका विवाह करते हैं,
तब वेदवेत्ता पुरुष उस विवाहको गान्धर्व धर्म (गान्धर्व विवाह) कहते हैं ।। धनेन बहुधा क्रीत्वा सम्प्रलोभ्य च बान्धवान् । असुराणां नृपैतं वै धर्ममाहुर्मनीषिणः ॥ ७ ॥ नरेश्वर! कन्याके बन्धु-बान्धवोंको लोभमें डालकर उन्हें बहुत-सा धन देकर जो कन्याको खरीद लिया जाता है, इसे मनीषी पुरुष असुरोंका धर्म (आसुर विवाह) कहते हैं ॥ ७ ॥ हत्वा छित्त्वा च शीर्षाणि रुदतां रुदतीं गृहात् । प्रसह्य हरणं तात राक्षसो विधिरुच्यते ॥ ८ ॥ तात! इसी प्रकार कन्याके रोते हुए अभिभावकोंको मारकर, उनके मस्तक काटकर रोती हुई कन्याको उसके घरसे बलपूर्वक हर लाना राक्षसोंका काम (राक्षस विवाह) बताया जाता है ॥ ८ ॥ पञ्चानां तु त्रयो धर्म्या द्वावधम्र्यौ युधिष्ठिर । पैशाचश्चासुरश्चैव न कर्तव्यो कथंचन ॥ ९ ॥ युधिष्ठिर! इन पाँच (ब्राह्म, प्राजापत्य, गान्धर्व, आसुर और राक्षस) विवाहोंमेंसे पूर्वकथित तीन विवाह धर्मानुकूल हैं और शेष दो पापमय हैं। आसुर और राक्षस विवाह किसी प्रकार भी नहीं करने चाहिये³। ॥ ९ ॥ ब्राह्मः क्षात्रोऽथ गान्धर्व एते धर्म्या नरर्षभ । पृथग् वा यदि वा मिश्राः कर्तव्या नात्र संशयः ॥ १० ॥ नरश्रेष्ठ! ब्राह्म, क्षात्र (प्राजापत्य) तथा गान्धर्व—ये तीन विवाह धर्मानुकूल बताये गये हैं। ये पृथक् हों या अन्य विवाहोंसे मिश्रित—करने ही योग्य हैं। इसमें संशय नहीं है ॥ १० ॥ तिस्रो भार्या ब्राह्मणस्य द्वे भार्ये क्षत्रियस्य तु । वैश्यः स्वजात्यां विन्देत तास्वपत्यं समं भवेत् ॥ ११ ॥ ब्राह्मणके लिये तीन भार्याएँ बतायी गयी हैं (ब्राह्मण-कन्या, क्षत्रिय-कन्या और वैश्य-कन्या), क्षत्रियके लिये दो भार्याएँ कही गयी हैं (क्षत्रिय-कन्या और वैश्य-कन्या)। वैश्य केवल अपनी ही जातिकी कन्याके साथ विवाह करे। इन स्त्रियोंसे जो संतानें उत्पन्न होती हैं वे पिताके समान वर्णवाली होती हैं (माताओंके कुल या वर्णके कारण उनमें कोई तारतम्य नहीं होता) ॥ ११ ॥ ब्राह्मणी तु भवेज्ज्येष्ठा क्षत्रिया क्षत्रियस्य तु । रत्यर्थमपि शूद्रा स्यान्नेत्याहुरपरे जनाः ॥ १२ ॥ ब्राह्मणकी पत्नियोंमें ब्राह्मण-कन्या श्रेष्ठ मानी जाती है, क्षत्रियके लिये क्षत्रिय-कन्या श्रेष्ठ है (वैश्यकी तो एक ही पत्नी होती है; अतः वह श्रेष्ठ है ही)। कुछ लोगोंका मत है कि
रतिके लिये शूद्र-जातिकी कन्यासे भी विवाह किया जा सकता है; परंतु और लोग ऐसा नहीं मानते (वे शूद्र-कन्याको त्रैवर्णिकोंके लिये अग्राह्य बतलाते हैं) ।। १२ ।। अपत्यजन्म शूद्रायां न प्रशंसन्ति साधवः । शूद्रायां जनयन् विप्रः प्रायश्चित्ती विधीयते ।। १३ ।। श्रेष्ठ पुरुष ब्राह्मणका शूद्र-कन्याके गर्भसे संतान उत्पन्न करना अच्छा नहीं मानते। शूद्राके गर्भसे संतान उत्पन्न करनेवाला ब्राह्मण प्रायश्चित्तका भागी होता है ।। त्रिंशद्वर्षो दशवर्षां भार्यां विन्देत नग्निकाम् । एकविंशतिवर्षो वा सप्तवर्षामवाप्नुयात् ।। १४ ।। तीस वर्षका पुरुष दस वर्षकी कन्याको, जो रजस्वला न हुई हो, पत्नीरूपमें प्राप्त करे। अथवा इक्कीस वर्षका पुरुष सात वर्षकी कुमारीके साथ विवाह करे ।। १४ ।। यस्यास्तु न भवेद् भ्राता पिता वा भरतर्षभ । नोपयच्छेत तां जातु पुत्रिकाधर्मिणी हि सा ।। १५ ।। भरतश्रेष्ठ! जिस कन्याके पिता अथवा भाई न हों, उसके साथ कभी विवाह नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह पुत्रिका-धर्मवाली मानी जाती है ।। १५ ।। त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत कन्या ऋतुमती सती । चतुर्थे त्वथ सम्प्राप्ते स्वयं भर्तारमर्जयेत् ।। १६ ।। (यदि पिता, भ्राता आदि अभिभावक ऋतुमती होनेके पहले कन्याका विवाह न कर दें तो) ऋतुमती होनेके पश्चात् तीन वर्षतक कन्या अपने विवाहकी बाट देखे। चौथा वर्ष लगनेपर वह स्वयं ही किसीको अपना पति बना ले ।। १६ ।। प्रजा न हीयते तस्या रतिश्च भरतर्षभ । अतोऽन्यथा वर्तमाना भवेद् वाच्या प्रजापतेः ।। १७ ।। भरतश्रेष्ठ! ऐसा करनेपर उस कन्याका उस पुरुषके साथ किया हुआ सम्बन्ध तथा उससे होनेवाली संतान निम्न श्रेणीकी नहीं समझी जाती। इसके विपरीत बर्ताव करनेवाली स्त्री प्रजापतिकी दृष्टिमें निन्दनीय होती है ।। १७ ।। असपिण्डा च या मातुरसगोत्रा च या पितुः । इत्येतामनुगच्छेत तं धर्मं मनुरब्रवीत् ।। १८ ।। जो कन्या माताकी सपिण्ड और पिताके गोत्रकी न हो, उसीका अनुगमन करे। इसे मनुजीने धर्मानुकूल बताया है³ ।। १८ ।।
युधिष्ठिर उवाच
शुल्कमन्येन दत्तं स्याद् ददानीत्याह चापरः । बलादन्यः प्रभाषेत धनमन्यः प्रदर्शयेत् ।। १९ ।। पाणिगृहीता चान्यः स्यात् कस्य भार्या पितामह ।
तत्त्वं जिज्ञासमानानां चक्षुर्भवतु नो भवान् ॥ २० ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! यदि एक मनुष्यने विवाह पक्का करके कन्याका मूल्य दे दिया हो, दूसरेने मूल्य देनेका वादा करके विवाह पक्का किया हो, तीसरा उसी कन्याको बलपूर्वक ले जानेकी बात कर रहा हो, चौथा उसके भाई-बन्धुओंको विशेष धनका लोभ दिखाकर ब्याह करनेको तैयार हो और पाँचवाँ उसका पाणिग्रहण कर चुका हो तो धर्मतः उसकी कन्या किसकी पत्नी मानी जायगी? हमलोग इस विषयमें यथार्थ तत्त्वको जानना चाहते हैं। आप हमारे लिये नेत्र (पथ-प्रदर्शक) हों ॥ १९-२० ॥
भीष्म उवाच
यत् किंचित् कर्म मानुष्यं संस्थानाय प्रदृश्यते ।
मन्त्रवन्मन्त्रितं तस्य मृषावादस्तु पातकः ॥ २१ ॥
**भीष्मजीने कहा—**भारत! मनुष्योंके हितसे सम्बन्ध रखनेवाला जो कोई भी कर्म है, वह व्यवस्थाके लिये देखा जाता है। समस्त विचारवान् पुरुष एकत्र होकर जब यह विचार कर लें कि 'अमुक कन्या अमुक पुरुषको देनी चाहिये' तो यह व्यवस्था ही विवाहका निश्चय करनेवाली होती है। जो झूठ बोलकर इस व्यवस्थाको उलट देता है, वह पापका भागी होता है॥
भार्यापत्यृत्विगाचार्याः शिष्योपाध्याय एव च ।
मृषोक्ते दण्डमर्हन्ति नेत्याहुरपरे जनाः ॥ २२ ॥
भार्या, पति, ऋत्विज्, आचार्य, शिष्य और उपाध्याय भी यदि उपर्युक्त व्यवस्थाके विरुद्ध झूठ बोलें तो दण्डके भागी होते हैं। परंतु दूसरे लोग उन्हें दण्डके भागी नहीं मानते हैं ॥ २२ ॥
न ह्याकामेन संवासं मनुरेवं प्रशंसति ।
अयशस्यमधर्म्यं च यन्मृषा धर्मकोपनम् ॥ २३ ॥
अकाम पुरुषके साथ सकामा कन्याका सहवास हो, इसे मनु अच्छा नहीं मानते हैं। अतः सर्वसम्मतिसे निश्चित किये हुए विवाहको मिथ्या करनेका प्रयत्न अयश और अधर्मका कारण होता है। वह धर्मको नष्ट करनेवाला माना गया है ॥ २३ ॥
नैकान्तो दोष एकस्मिंस्तदा केनोपपद्यते ।
धर्मतो यां प्रयच्छन्ति यां च क्रीणन्ति भारत ॥ २४ ॥
भारत! कन्याके भाई-बन्धु जिस कन्याको धर्मपूर्वक पाणिग्रहणकी विधिसे दान कर देते हैं अथवा जिसे मूल्य लेकर दे डालते हैं, उस कन्याको धर्मपूर्वक विवाह करनेवाला अथवा मूल्य देकर खरीदनेवाला यदि अपने घर ले जाय तो इसमें किसी प्रकारका दोष नहीं होता। भला उस दशामें दोषकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? ॥ २४ ॥
बन्धुभिः समनुज्ञाते मन्त्रहोमौ प्रयोजयेत् ।
तथा सिद्धयन्ति ते मन्त्रा नादत्तायाः कथंचन ।। २५ ।। कन्याके कुटुम्बीजनोंकी अनुमति मिलनेपर वैवाहिक मन्त्र और होमका प्रयोग करना चाहिये, तभी वे मन्त्र सिद्ध (सफल) होते हैं, अर्थात् वह मन्त्रोंद्वारा विवाह किया हुआ माना जाता है। जिस कन्याका माता-पिताके द्वारा दान नहीं किया गया उसके लिये किये गये मन्त्र-प्रयोग किसी तरह सिद्ध नहीं होते, अर्थात् वह विवाह मन्त्रोंद्वारा किया हुआ नहीं माना जाता ।। २५ ।।
यस्त्वत्र मन्त्रसमयो भार्यापत्योर्मिथः कृतः । तमेवाहुर्गरीयांसं यश्चासौ ज्ञातिभिः कृतः ।। २६ ।। पति और पत्नीमें भी परस्पर मन्त्रोच्चारणपूर्वक जो प्रतिज्ञा होती है वही श्रेष्ठ मानी जाती है, और यदि उसके लिये बन्धु-बान्धवोंका समर्थन प्राप्त हो तब तो और उत्तम बात है ।। २६ ।।
देवदत्तां पतिर्भार्यां वेत्ति धर्मस्य शासनात् । स दैवीं मानुषीं वाचमनृतां पर्युदस्यति ।। २७ ।। धर्मशास्त्रकी आज्ञाके अनुसार न्यायतः प्राप्त हुई पत्नीको पति अपने प्रारब्धकर्मके अनुसार मिली हुई भार्या समझता है। इस प्रकार वह दैवयोगसे प्राप्त हुई पत्नीको ग्रहण करता है। तथा मनुष्योंकी झूठी बातको—उस विवाहको अयोग्य बतानेवाली वार्ताको अग्राह्य कर देता है ।। २७ ।।
युधिष्ठिर उवाच
कन्यायां प्राप्तशुल्कायां ज्यायांश्चेदाव्रजेद् वरः । धर्मकामार्थसम्पन्नो वाच्यमत्रानृतं न वा ।। २८ ।। **युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! यदि एक वरसे कन्याका विवाह पक्का करके उसका मूल्य ले लिया गया हो और पीछे उससे भी श्रेष्ठ धर्म, अर्थ और कामसे सम्पन्न अत्यन्त योग्य वर मिल जाय तो पहले जिससे मूल्य लिया गया है उससे झूठ बोलना—उसको कन्या देनेसे इनकार कर देना चाहिये या नहीं? ।। २८ ।।
तस्मिन्नुभयतोदोषे कुर्वन् श्रेयः समाचरेत् । अयं नः सर्वधर्माणां धर्मश्चिन्त्यतमो मतः ।। २९ ।। इसमें दोनों दशाओंमें दोष प्राप्त होता है—यदि बन्धुजनोंकी सम्मतिसे मूल्य लेकर निश्चित किये हुए विवाहको उलट दिया जाय तो वचन-भंगका दोष लगता है और श्रेष्ठ वरका उल्लंघन करनेसे कन्याके हितको हानि पहुँचानेका दोष प्राप्त होता है। ऐसी दशामें कन्यादाता क्या करे; जिससे वह कल्याणका भागी हो? हम तो सम्पूर्ण धर्मोंमें इस कन्यादानरूप धर्मको ही अधिक चिन्तन अर्थात् विचारके योग्य मानते हैं ।। २९ ।।
तत्त्वं जिज्ञासमानानां चक्षुर्भवतु नो भवान् ।