भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 453, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 453

उनके गये अभी एक ही मुहूर्त बीतने पाया था कि महा तपस्वी देवशर्मा इच्छानुसार यज्ञ पूर्ण करके अपने आश्रमपर लौट आये ॥ २८ ॥

आगतेऽथ गुरौ राजन् विपुलः प्रियकर्मकृत् । रक्षितां गुरवे भार्यां न्यवेदयदनिन्दिताम् ॥ २९ ॥ राजन्! गुरुके आनेपर उनका प्रिय कार्य करनेवाले विपुलने अपने द्वारा सुरक्षित हुई उनकी सती-साध्वी भार्या रुचिको उन्हें सौंप दिया ॥ २९ ॥

अभिवाद्य च शान्तात्मा स गुरुं गुरुवत्सलः । विपुलः पर्युपातिष्ठद् यथापूर्वमशङ्कितः ॥ ३० ॥ शान्त चित्तवाले गुरुप्रेमी विपुल गुरुदेवको प्रणाम करके पहलेकी ही भाँति निर्भीक होकर उनकी सेवामें उपस्थित हुए ॥ ३० ॥

विश्रान्ताय ततस्तस्मै सहासीनाय भार्यया । निवेदयामास तदा विपुलः शक्रकर्म तत् ॥ ३१ ॥ जब गुरुजी विश्राम करके अपनी पत्नीके साथ बैठे, तब विपुलने इन्द्रकी वह सारी करतूत उन्हें बतायी ॥ ३१ ॥

तत् श्रुत्वा स मुनिस्तुष्टो विपुलस्य प्रतापवान् । बभूव शीलवृत्ताभ्यां तपसा नियमेन च ॥ ३२ ॥ यह सुनकर प्रतापी मुनि देवशर्मा विपुलके शील, सदाचार, तप और नियमसे बहुत संतुष्ट हुए ॥ ३२ ॥

विपुलस्य गुरौ वृत्तिं भक्तिमात्मनि तत्प्रभुः । धर्मे च स्थिरतां दृष्ट्वा साधु साध्वित्यभाषत ॥ ३३ ॥ विपुलकी गुरुसेवावृत्ति, अपने प्रति भक्ति और धर्मविषयक दृढ़ता देखकर गुरुने 'बहुत अच्छा, बहुत अच्छा' कहकर उनकी प्रशंसा की ॥ ३३ ॥

प्रतिलभ्य च धर्मात्मा शिष्यं धर्मपरायणम् । वरेणच्छन्दयामास देवशर्मा महामतिः ॥ ३४ ॥ परम बुद्धिमान् धर्मात्मा देवशर्माने अपने धर्म-परायण शिष्य विपुलको पाकर उन्हें इच्छानुसार वर माँगनेको कहा ॥ ३४ ॥

स्थितिं च धर्मे जग्राह स तस्माद् गुरुवत्सलः । अनुज्ञातश्च गुरुणा चचारानुत्तमं तपः ॥ ३५ ॥ गुरुवत्सल विपुलने गुरुसे यही वर माँगा कि 'मेरी धर्ममें निरन्तर स्थिति बनी रहे।' फिर गुरुकी आज्ञा लेकर उन्होंने सर्वोत्तम तपस्या आरम्भ की ॥ ३५ ॥

तथैव देवशर्मापि सभार्यः स महातपाः । निर्भयो बलवृत्रघ्नाच्चचार विजने वने ॥ ३६ ॥