महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइन्द्र! क्या तू उस घटनाको भूल गया? क्या तेरे मनमें उसकी याद नहीं रह गयी है? जब कि महर्षि गौतमने तेरे सारे शरीरमें भगके (हजार) चिह्न बनाकर तुझे जीवित छोड़ा था? ।। २१ ।।
जाने त्वां बालिशमतिमकृतात्मानमस्थिरम् । ममेयं रक्ष्यते मूढ गच्छ पाप यथागतम् ।। २२ ।। मैं जानता हूँ कि तू मूर्ख है, तेरा मन वशमें नहीं और तू महाचंचल है। पापी मूढ़! यह स्त्री मेरे द्वारा सुरक्षित है। तू जैसे आया है, उसी तरह लौट जा ।। २२ ।।
नाहं त्वामद्य मूढात्मन् दहेयं हि स्वतेजसा । कृपायमानस्तु न ते दग्धुमिच्छामि वासव ।। २३ ।। मूढचित्त इन्द्र! मैं अपने तेजसे तुझे जलाकर भस्म कर सकता हूँ। केवल दया करके ही तुझे इस समय जलाना नहीं चाहता ।। २३ ।।
स च घोरतमो धीमान् गुरुर्मे पापचेतसम् । दृष्ट्वा त्वां निर्दहेदद्य क्रोधदीप्तेन चक्षुषा ।। २४ ।। मेरे बुद्धिमान् गुरु बड़े भयंकर हैं। वे तुझ पापात्माको देखते ही आज क्रोधसे उदीप्त हुई दृष्टिद्वारा दग्ध कर डालेंगे ।। २४ ।।
नैवं तु शक्र कर्तव्यं पुनर्मान्याश्च ते द्विजाः । मा गमः ससुतामात्यः क्षयं ब्रह्मबलार्दितः ।। २५ ।। इन्द्र! आजसे फिर कभी ऐसा काम न करना। तुझे ब्राह्मणोंका सम्मान करना चाहिये, अन्यथा कहीं ऐसा न हो कि तुझे ब्रह्मतेजसे पीड़ित होकर पुत्रों और मन्त्रियोंसहित कालके गालमें जाना पड़े ।। २५ ।।
अमरोऽस्मीति यद्बुद्धिं समास्थाय प्रवर्त्तसे । मावमंस्था न तपसा नसाध्यं नाम किंचन ।। २६ ।। मैं अमर हूँ—ऐसी बुद्धिका आश्रय लेकर यदि तू स्वेच्छाचारमें प्रवृत्त हो रहा है तो (मैं तुझे सचेत किये देता हूँ) यों किसी तपस्वीका अपमान न किया कर; क्योंकि तपस्यासे कोई भी कार्य असाध्य नहीं है (तपस्वी अमरोंको भी मार सकता है) ।। २६ ।।
भीष्म उवाच
तत् श्रुत्वा वचनं शक्रो विपुलस्य महात्मनः । अकिंचिदुक्त्वा व्रीडार्तस्तत्रैवान्तरधीयत ।। २७ ।। भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! महात्मा विपुलका वह कथन सुनकर इन्द्र बहुत लज्जित हुए और कुछ भी उत्तर न देकर वहीं अन्तर्धान हो गये ।। २७ ।।
मुहूर्तयाते तस्मिंस्तु देवशर्मा महातपाः । कृत्वा यज्ञं यथाकाममाजगाम स्वमाश्रमम् ।। २८ ।।