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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 470, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 470

तथा सिद्धयन्ति ते मन्त्रा नादत्तायाः कथंचन ।। २५ ।। कन्याके कुटुम्बीजनोंकी अनुमति मिलनेपर वैवाहिक मन्त्र और होमका प्रयोग करना चाहिये, तभी वे मन्त्र सिद्ध (सफल) होते हैं, अर्थात् वह मन्त्रोंद्वारा विवाह किया हुआ माना जाता है। जिस कन्याका माता-पिताके द्वारा दान नहीं किया गया उसके लिये किये गये मन्त्र-प्रयोग किसी तरह सिद्ध नहीं होते, अर्थात् वह विवाह मन्त्रोंद्वारा किया हुआ नहीं माना जाता ।। २५ ।।

यस्त्वत्र मन्त्रसमयो भार्यापत्योर्मिथः कृतः । तमेवाहुर्गरीयांसं यश्चासौ ज्ञातिभिः कृतः ।। २६ ।। पति और पत्नीमें भी परस्पर मन्त्रोच्चारणपूर्वक जो प्रतिज्ञा होती है वही श्रेष्ठ मानी जाती है, और यदि उसके लिये बन्धु-बान्धवोंका समर्थन प्राप्त हो तब तो और उत्तम बात है ।। २६ ।।

देवदत्तां पतिर्भार्यां वेत्ति धर्मस्य शासनात् । स दैवीं मानुषीं वाचमनृतां पर्युदस्यति ।। २७ ।। धर्मशास्त्रकी आज्ञाके अनुसार न्यायतः प्राप्त हुई पत्नीको पति अपने प्रारब्धकर्मके अनुसार मिली हुई भार्या समझता है। इस प्रकार वह दैवयोगसे प्राप्त हुई पत्नीको ग्रहण करता है। तथा मनुष्योंकी झूठी बातको—उस विवाहको अयोग्य बतानेवाली वार्ताको अग्राह्य कर देता है ।। २७ ।।

युधिष्ठिर उवाच

कन्यायां प्राप्तशुल्कायां ज्यायांश्चेदाव्रजेद् वरः । धर्मकामार्थसम्पन्नो वाच्यमत्रानृतं न वा ।। २८ ।। **युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! यदि एक वरसे कन्याका विवाह पक्का करके उसका मूल्य ले लिया गया हो और पीछे उससे भी श्रेष्ठ धर्म, अर्थ और कामसे सम्पन्न अत्यन्त योग्य वर मिल जाय तो पहले जिससे मूल्य लिया गया है उससे झूठ बोलना—उसको कन्या देनेसे इनकार कर देना चाहिये या नहीं? ।। २८ ।।

तस्मिन्नुभयतोदोषे कुर्वन् श्रेयः समाचरेत् । अयं नः सर्वधर्माणां धर्मश्चिन्त्यतमो मतः ।। २९ ।। इसमें दोनों दशाओंमें दोष प्राप्त होता है—यदि बन्धुजनोंकी सम्मतिसे मूल्य लेकर निश्चित किये हुए विवाहको उलट दिया जाय तो वचन-भंगका दोष लगता है और श्रेष्ठ वरका उल्लंघन करनेसे कन्याके हितको हानि पहुँचानेका दोष प्राप्त होता है। ऐसी दशामें कन्यादाता क्या करे; जिससे वह कल्याणका भागी हो? हम तो सम्पूर्ण धर्मोंमें इस कन्यादानरूप धर्मको ही अधिक चिन्तन अर्थात् विचारके योग्य मानते हैं ।। २९ ।।

तत्त्वं जिज्ञासमानानां चक्षुर्भवतु नो भवान् ।

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