महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 471, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदेतत् सर्वमाचक्ष्व न हि तृप्यामि कथ्यताम् ॥ ३० ॥ हम इस विषयमें यथार्थ तत्त्वको जानना चाहते हैं। आप हमारे पथप्रदर्शक होइये। इन सब बातोंको स्पष्टरूपसे बताइये। मैं आपकी बातें सुननेसे तृप्त नहीं हो रहा हूँ। अतः आप इस विषयका प्रतिपादन कीजिये ॥ ३० ॥
भीष्म उवाच
नैव निष्ठाकरं शुल्कं ज्ञात्वाऽऽसीत् तेन नाहृतम् । न हि शुल्कपराः सन्तः कन्यां ददति कर्हिचित् ॥ ३१ ॥ भीष्मजीने कहा— राजन्! मूल्य दे देनेसे ही विवाहका अन्तिम निश्चय नहीं हो जाता (उसमें परिवर्तनकी सम्भावना रहती ही है)। यह समझकर ही मूल्य देनेवाला मूल्य देता है और फिर उसे वापस नहीं माँगता। सज्जन पुरुष कभी-कभी मूल्य लेकर भी किसी विशेष कारणवश कन्यादान नहीं करते हैं ॥ ३१ ॥
अन्यैर्गुणैरुपेतं तु शुल्कं याचन्ति बान्धवाः । अलंकृत्वा वहस्वेति यो दद्यादनुकूलतः ॥ ३२ ॥ कन्याके भाई-बन्धु किसीसे मूल्य तभी माँगते हैं जब वह विपरीत गुण (अधिक अवस्था आदि)-से युक्त होता है। यदि वरको बुलाकर कहा जाय कि ‘तुम मेरी कन्याको आभूषण पहनाकर इसके साथ विवाह कर लो’ और ऐसा कहनेपर वह उसके लिये आभूषण देकर विवाह करे तो यह धर्मानुकूल ही है ॥ ३२ ॥
यच्च तां च ददत्येवं न शुल्कं विक्रयो न सः । प्रतिगृह्य भवेद् देयमेष धर्मः सनातनः ॥ ३३ ॥ क्योंकि इस प्रकार जो कन्याके लिये आभूषण लेकर कन्यादान किया जाता है, वह न तो मूल्य है और न विक्रय ही; इसलिये कन्याके लिये कोई वस्तु स्वीकार करके कन्याका दान करना सनातन धर्म है ॥
दास्यामि भवते कन्यामिति पूर्वं न भाषितम् । ये चाहुर्ये च नाहुर्ये ये चावश्यं वदन्त्युत ॥ ३४ ॥ जो लोग भिन्न-भिन्न व्यक्तियोंसे कहते हैं कि ‘मैं आपको अपनी कन्या दूँगा’, जो कहते हैं ‘नहीं दूँगा’ और जो कहते हैं ‘अवश्य दूँगा’ उनकी ये सभी बातें कन्या देनेके पहले नही कही हुई के ही तुल्य हैं ॥ ३४ ॥
तस्मादा ग्रहणात् पाणेर्याचयन्ति परस्परम् । कन्यावरः पुरा दत्तो मरुद्भिरिति नः श्रुतम् ॥ ३५ ॥ जबतक कन्याका पाणिग्रहण संस्कार सम्पन्न न हो जाय तबतक कन्याको माँगना चाहिये। ऐसा कन्याओंके लिये मरुद्गणोंने पहले वर दिया है, अर्थात् अधिकार दिया है—