महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयह हमारे सुननेमें आया है। इसलिये पाणिग्रहण होनेके पहलेतक वर और कन्या आपसमें एक-दूसरेके लिये प्रार्थना कर सकते हैं ।। ३५ ।।
नानिष्टाय प्रदातव्या कन्या इत्यृषिचोदितम्।
तन्मूलं काममूलस्य प्रजनस्येति मे मतिः ।। ३६ ।।
महर्षियोंका मत है कि अयोग्य वरको कन्या नहीं देनी चाहिये; क्योंकि सुयोग्य पुरुषको कन्यादान करना ही काम-सम्बन्धी सुख और सुयोग्य संतानकी उत्पत्तिका कारण है। ऐसा मेरा विचार है ।। ३६ ।।
समीक्ष्य च बहून् दोषान् संवासाद् विद्धि पाण्ययोः।
यथा निष्ठाकरं शुल्कं न जात्वासीत् तथा शृणु ।। ३७ ।।
कन्याके क्रय-विक्रयमें बहुत-से दोष हैं। इस बातको तुम अधिक कालतक सोचने-विचारनेके बाद स्वयं समझ लोगे। केवल मूल्य दे देनेसे विवाहका अन्तिम निश्चय नहीं हो जाता है। पहले भी कभी ऐसा नहीं हुआ था, इस विषयमें तुम सुनो ।। ३७ ।।
अहं विचित्रवीर्यस्य द्वे कन्ये समुदावहम्।
जित्वा च मागधान् सर्वान् काशीनाथ च कोसलान् ।। ३८ ।।
मैं विचित्रवीर्यके विवाहके लिये मगध, काशी तथा कोशलदेशके समस्त वीरोंको पराजित करके काशिराजकी दो* कन्याओंको हर लाया था ।। ३८ ।।
गृहीतपाणिरेकाऽऽसीत् प्राप्तशुल्का पराभवत्।
कन्या गृहीता तत्रैव विसर्ज्या इति मे पिता ।। ३९ ।।
अब्रवीदितरां कन्यामावहेति स कौरवः।
अप्यन्याननुपप्रच्छ शङ्कमानः पितुर्वचः ।। ४० ।।
उनमेंसे एक कन्या अम्बा अपना हाथ शाल्वराजके हाथमें दे चुकी थी; अर्थात् मन-ही-मन उनको अपना पति मान चुकी थी। दूसरी (दो कन्याओं)-का काशिराजको शुल्क प्राप्त हो गया था। इसलिये मेरे पिता (चाचा) कुरुवंशी बाह्लीकने वहीं कहा कि ‘जो कन्या पाणिगृहीत हो चुकी है उसका त्याग कर दो और दूसरी कन्याका (जिनके लिये शुल्कमात्र लिया गया है) विवाह करो।’ मुझे चाचाजीके इस कथनमें संदेह था, इसलिये मैंने दूसरोंसे भी इसके विषयमें पूछा ।। ३९-४० ।।
अतीव ह्यस्य धर्मेच्छा पितुर्मेऽभ्यधिकाभवत्।
ततोऽहमब्रुवं राजन्नाचारेप्सुरिदं वचः।
आचारं तत्त्वतो वेत्तुमिच्छामि च पुनः पुनः ।। ४१ ।।
परंतु इस विषयमें मेरे चाचाजीकी बहुत प्रबल इच्छा थी कि धर्मका पालन हो (अतः वे पाणिगृहीता कन्याके त्यागपर अधिक जोर दे रहे थे)। राजन्! तदनन्तर मैं आचार जाननेकी इच्छासे बोला—‘पिताजी! मैं इस विषयमें यह ठीक-ठीक जानना चाहता हूँ कि परम्परागत आचार क्या है?’ ।। ४१ ।।