भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 473, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 473

ततो मयैवमुक्ते तु वाक्ये धर्मभृतां वरः । पिता मम महाराज बाह्लीको वाक्यमब्रवीत् ॥ ४२ ॥ महाराज! मेरे ऐसा कहनेपर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ मेरे चाचा बाह्लीक इस प्रकार बोले— ॥ ४२ ॥

यदि वः शुल्कतो निष्ठा न पाणिग्रहणात् तथा । लाजान्तरमुपासीत प्राप्तशुल्क इति स्मृतिः ॥ ४३ ॥ ‘यदि तुम्हारे मतमें मूल्य देनेमात्रसे ही विवाहका पूर्ण निश्चय हो जाता है, पाणिग्रहणसे नहीं, तब तो स्मृतिका यह कथन ही व्यर्थ होगा कि कन्याका पिता एक वरसे शुल्क ले लेनेपर भी दूसरे किसी गुणवान् वरका आश्रय ले सकता है। अर्थात् पहलेको छोड़कर दूसरे गुणवान् वरसे अपनी कन्याका विवाह कर सकता है ॥

न हि धर्मविदः प्राहुः प्रमाणं वाक्यतः स्मृतम् । येषां वै शुल्कतो निष्ठा न पाणिग्रहणात् तथा ॥ ४४ ॥ जिनका यह मत है कि शुल्कसे ही विवाहका निश्चय होता है, पाणिग्रहणसे नहीं, उनके इस कथनको धर्मज्ञ पुरुष प्रमाण नहीं मानते हैं ॥ ४४ ॥

प्रसिद्धं भाषितं दाने नैषां प्रत्यायकं पुनः । ये मन्यन्ते क्रयं शुल्कं न ते धर्मविदो नराः ॥ ४५ ॥ ‘कन्यादानके विषयमें तो लोगोंका कथन भी प्रसिद्ध है’ अर्थात् सब लोग यही कहते हैं कि कन्यादान हुआ है। अतः जो शुल्कसे ही विवाह निश्चय मानते हैं उनके कथनकी प्रतीति करानेवाला कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं होता। जो क्रय और शुल्कको मान्यता देते हैं वे मनुष्य धर्मज्ञ नहीं हैं ॥ ४५ ॥

न चैतेभ्यः प्रदातव्या न वोढव्या तथाविधा । न ह्येव भार्या क्रेतव्या न विक्रेया कथंचन ॥ ४६ ॥ ‘ऐसे लोगोंको कन्या नहीं देनी चाहिये और जो बेची जा रही हो ऐसी कन्याके साथ विवाह नहीं करना चाहिये; क्योंकि भार्या किसी प्रकार भी खरीदने या विक्रय करनेकी वस्तु नहीं है ॥ ४६ ॥

ये च क्रीणन्ति दासीं च विक्रीणन्ति तथैव च । भवेत् तेषां तथा निष्ठा लुब्धानां पापचेतसाम् ॥ ४७ ॥ ‘जो दासियोंको खरीदते और बेचते हैं वे बड़े लोभी और पापात्मा हैं। ऐसे ही लोगोंमें पत्नीको भी खरीदने-बेचनेकी निष्ठा होती है ॥ ४७ ॥

अस्मिन्नर्थे सत्यवन्तं पर्यपृच्छन्त वै जनाः । कन्यायाः प्राप्तशुल्कायाः शुल्कदः प्रशमं गतः ॥ ४८ ॥ पाणिग्रहीता वान्यः स्यादत्र नो धर्मसंशयः । तन्नश्छिन्धि महाप्राज्ञ त्वं हि वै प्राज्ञसम्मतः ॥ ४९ ॥