महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 474, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस विषयमें पहलेके लोगोंने सत्यवान्से पूछा था कि 'महाप्राज्ञ! यदि कन्याका शुल्क देनेके पश्चात् शुल्क देनेवालेकी मृत्यु हो जाय तो उसका पाणिग्रहण दूसरा कोई कर सकता है या नहीं? इसमें हमें धर्मविषयक संदेह हो गया है। आप इसका निवारण कीजिये; क्योंकि आप ज्ञानी पुरुषोंद्वारा सम्मानित हैं॥ ४८-४९॥ तत्त्वं जिज्ञासमानानां चक्षुर्भवतु नो भवान्। तानेवं ब्रुवतः सर्वान् सत्यवान् वाक्यमब्रवीत्॥ ५०॥ 'हमलोग इस विषयमें यथार्थ बात जानना चाहते हैं। आप हमारे लिये पथप्रदर्शक होइये।' उन लोगोंके इस प्रकार कहनेपर सत्यवान्ने कहा—॥ ५०॥ यत्रेष्टं तत्र देया स्यान्नात्र कार्या विचारणा। कुर्वते जीवतोऽप्येवं मृते नैवास्ति संशयः॥ ५१॥ 'जहाँ उत्तम पात्र मिलता हो वहीं कन्या देनी चाहिये। इसके विपरीत कोई विचार मनमें नहीं लाना चाहिये। मूल्य देनेवाला यदि जीवित हो तो भी सुयोग्य वरके मिलनेपर सज्जन पुरुष उसीके साथ कन्याका विवाह करते हैं। फिर उसके मर जानेपर अन्यत्र करें—इसमें तो संदेह ही नहीं है॥ ५१॥ देवरं प्रविशेत् कन्या तप्येद् वापि तपः पुनः। तमेवानुगता भूत्वा पाणिग्राहस्य काम्यया॥ ५२॥ 'शुल्क देनेवालेकी मृत्यु हो जानेपर उसके छोटे भाईको वह कन्या पतिरूपमें ग्रहण करे अथवा जन्मान्तरमें उसी पतिको पानेकी इच्छासे उसीका अनुसरण (चिन्तन) करती हुई आजीवन कुमारी रहकर तपस्या करे॥ ५२॥ लिखन्त्येव तु केषांचिदपरेषां शनैरपि। इति ये संवदन्त्यत्र त एतं निश्चयं विदुः॥ ५३॥ तत्पाणिग्रहणात् पूर्वमन्तरं यत्र वर्तते। सर्वमङ्गलमन्त्रं वै मृषावादस्तु पातकः॥ ५४॥ 'किन्हींके मतमें अक्षतयोनि कन्याको स्वीकार करनेका अधिकार है। दूसरोंके मतमें यह मन्दप्रवृत्ति—अवैध कार्य है। इस प्रकार जो विवाद करते हैं, वे अन्तमें इसी निश्चयपर पहुँचते हैं कि कन्याका पाणिग्रहण होनेसे पहलेका वैवाहिक मंगलाचार और मन्त्रप्रयोग हो जानेपर भी जहाँ अन्तर या व्यवधान पड़ जाय; अर्थात् अयोग्य वरको छोड़कर किसी दूसरे योग्य वरके साथ कन्या ब्याह दी जाय तो दाताको केवल मिथ्याभाषणका पाप लगता है (पाणिग्रहणसे पूर्व कन्या विवाहित नहीं मानी जाती है)॥ ५३-५४॥ पाणिग्रहणमन्त्राणां निष्ठा स्यात् सप्तमे पदे। पाणिग्रहस्य भार्या स्याद् यस्य चाद्भिः प्रदीयते। इति देयं वदन्त्यत्र त एनं निश्चयं विदुः॥ ५५॥