महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
ततो मयैवमुक्ते तु वाक्ये धर्मभृतां वरः । पिता मम महाराज बाह्लीको वाक्यमब्रवीत् ॥ ४२ ॥ महाराज! मेरे ऐसा कहनेपर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ मेरे चाचा बाह्लीक इस प्रकार बोले— ॥ ४२ ॥
यदि वः शुल्कतो निष्ठा न पाणिग्रहणात् तथा । लाजान्तरमुपासीत प्राप्तशुल्क इति स्मृतिः ॥ ४३ ॥ ‘यदि तुम्हारे मतमें मूल्य देनेमात्रसे ही विवाहका पूर्ण निश्चय हो जाता है, पाणिग्रहणसे नहीं, तब तो स्मृतिका यह कथन ही व्यर्थ होगा कि कन्याका पिता एक वरसे शुल्क ले लेनेपर भी दूसरे किसी गुणवान् वरका आश्रय ले सकता है। अर्थात् पहलेको छोड़कर दूसरे गुणवान् वरसे अपनी कन्याका विवाह कर सकता है ॥
न हि धर्मविदः प्राहुः प्रमाणं वाक्यतः स्मृतम् । येषां वै शुल्कतो निष्ठा न पाणिग्रहणात् तथा ॥ ४४ ॥ जिनका यह मत है कि शुल्कसे ही विवाहका निश्चय होता है, पाणिग्रहणसे नहीं, उनके इस कथनको धर्मज्ञ पुरुष प्रमाण नहीं मानते हैं ॥ ४४ ॥
प्रसिद्धं भाषितं दाने नैषां प्रत्यायकं पुनः । ये मन्यन्ते क्रयं शुल्कं न ते धर्मविदो नराः ॥ ४५ ॥ ‘कन्यादानके विषयमें तो लोगोंका कथन भी प्रसिद्ध है’ अर्थात् सब लोग यही कहते हैं कि कन्यादान हुआ है। अतः जो शुल्कसे ही विवाह निश्चय मानते हैं उनके कथनकी प्रतीति करानेवाला कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं होता। जो क्रय और शुल्कको मान्यता देते हैं वे मनुष्य धर्मज्ञ नहीं हैं ॥ ४५ ॥
न चैतेभ्यः प्रदातव्या न वोढव्या तथाविधा । न ह्येव भार्या क्रेतव्या न विक्रेया कथंचन ॥ ४६ ॥ ‘ऐसे लोगोंको कन्या नहीं देनी चाहिये और जो बेची जा रही हो ऐसी कन्याके साथ विवाह नहीं करना चाहिये; क्योंकि भार्या किसी प्रकार भी खरीदने या विक्रय करनेकी वस्तु नहीं है ॥ ४६ ॥
ये च क्रीणन्ति दासीं च विक्रीणन्ति तथैव च । भवेत् तेषां तथा निष्ठा लुब्धानां पापचेतसाम् ॥ ४७ ॥ ‘जो दासियोंको खरीदते और बेचते हैं वे बड़े लोभी और पापात्मा हैं। ऐसे ही लोगोंमें पत्नीको भी खरीदने-बेचनेकी निष्ठा होती है ॥ ४७ ॥
अस्मिन्नर्थे सत्यवन्तं पर्यपृच्छन्त वै जनाः । कन्यायाः प्राप्तशुल्कायाः शुल्कदः प्रशमं गतः ॥ ४८ ॥ पाणिग्रहीता वान्यः स्यादत्र नो धर्मसंशयः । तन्नश्छिन्धि महाप्राज्ञ त्वं हि वै प्राज्ञसम्मतः ॥ ४९ ॥
इस विषयमें पहलेके लोगोंने सत्यवान्से पूछा था कि 'महाप्राज्ञ! यदि कन्याका शुल्क देनेके पश्चात् शुल्क देनेवालेकी मृत्यु हो जाय तो उसका पाणिग्रहण दूसरा कोई कर सकता है या नहीं? इसमें हमें धर्मविषयक संदेह हो गया है। आप इसका निवारण कीजिये; क्योंकि आप ज्ञानी पुरुषोंद्वारा सम्मानित हैं॥ ४८-४९॥ तत्त्वं जिज्ञासमानानां चक्षुर्भवतु नो भवान्। तानेवं ब्रुवतः सर्वान् सत्यवान् वाक्यमब्रवीत्॥ ५०॥ 'हमलोग इस विषयमें यथार्थ बात जानना चाहते हैं। आप हमारे लिये पथप्रदर्शक होइये।' उन लोगोंके इस प्रकार कहनेपर सत्यवान्ने कहा—॥ ५०॥ यत्रेष्टं तत्र देया स्यान्नात्र कार्या विचारणा। कुर्वते जीवतोऽप्येवं मृते नैवास्ति संशयः॥ ५१॥ 'जहाँ उत्तम पात्र मिलता हो वहीं कन्या देनी चाहिये। इसके विपरीत कोई विचार मनमें नहीं लाना चाहिये। मूल्य देनेवाला यदि जीवित हो तो भी सुयोग्य वरके मिलनेपर सज्जन पुरुष उसीके साथ कन्याका विवाह करते हैं। फिर उसके मर जानेपर अन्यत्र करें—इसमें तो संदेह ही नहीं है॥ ५१॥ देवरं प्रविशेत् कन्या तप्येद् वापि तपः पुनः। तमेवानुगता भूत्वा पाणिग्राहस्य काम्यया॥ ५२॥ 'शुल्क देनेवालेकी मृत्यु हो जानेपर उसके छोटे भाईको वह कन्या पतिरूपमें ग्रहण करे अथवा जन्मान्तरमें उसी पतिको पानेकी इच्छासे उसीका अनुसरण (चिन्तन) करती हुई आजीवन कुमारी रहकर तपस्या करे॥ ५२॥ लिखन्त्येव तु केषांचिदपरेषां शनैरपि। इति ये संवदन्त्यत्र त एतं निश्चयं विदुः॥ ५३॥ तत्पाणिग्रहणात् पूर्वमन्तरं यत्र वर्तते। सर्वमङ्गलमन्त्रं वै मृषावादस्तु पातकः॥ ५४॥ 'किन्हींके मतमें अक्षतयोनि कन्याको स्वीकार करनेका अधिकार है। दूसरोंके मतमें यह मन्दप्रवृत्ति—अवैध कार्य है। इस प्रकार जो विवाद करते हैं, वे अन्तमें इसी निश्चयपर पहुँचते हैं कि कन्याका पाणिग्रहण होनेसे पहलेका वैवाहिक मंगलाचार और मन्त्रप्रयोग हो जानेपर भी जहाँ अन्तर या व्यवधान पड़ जाय; अर्थात् अयोग्य वरको छोड़कर किसी दूसरे योग्य वरके साथ कन्या ब्याह दी जाय तो दाताको केवल मिथ्याभाषणका पाप लगता है (पाणिग्रहणसे पूर्व कन्या विवाहित नहीं मानी जाती है)॥ ५३-५४॥ पाणिग्रहणमन्त्राणां निष्ठा स्यात् सप्तमे पदे। पाणिग्रहस्य भार्या स्याद् यस्य चाद्भिः प्रदीयते। इति देयं वदन्त्यत्र त एनं निश्चयं विदुः॥ ५५॥
'सप्तपदीके सातवें पदमें पाणिग्रहणके मन्त्रोंकी सफलता होती है (और तभी पति-पत्नीभावका निश्चय होता है)। जिस पुरुषको जलसे संकल्प करके कन्याका दान दिया जाता है वही उसका पाणिगृहीता पति होता है और उसीकी वह पत्नी मानी जाती है। विद्वान् पुरुष इसी प्रकार कन्यादानकी विधि बताते हैं। वे इसी निश्चयपर पहुँचे हुए हैं ।। ५५ ।।
अनुकूलामनुवंशां भ्रात्रा दत्तामुपाग्निकाम् ।
परिक्रम्य यथान्यायं भार्यां विन्देद् द्विजोत्तमः ।। ५६ ।।
'जो अनुकूल हो, अपने वंशके अनुरूप हो, अपने पिता-माता या भाईके द्वारा दी गयी हो और प्रज्वलित अग्निके समीप बैठी हो, ऐसी पत्नीको श्रेष्ठ द्विज अग्निकी परिक्रमा करके शास्त्रविधिके अनुसार ग्रहण करे ।। ५६ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विवाहधर्मकथने चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विवाहधर्मका वर्णनविषयक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४४ ।।
१-स्मृतियोंमें निम्नलिखित आठ विवाह बतलाये गये हैं—ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, गान्धर्व, आसुर, राक्षस और पैशाच। किंतु यहाँ १ ब्राह्म, २ प्राजापत्य, ३ गान्धर्व, ४ आसुर और ५ राक्षस—इन्हीं पाँच विवाहोंका उल्लेख किया गया है; अतः यहाँ जो ब्राह्म विवाह है उसीमें स्मृतिकथित दैव और आर्ष विवाहोंका भी अन्तर्भाव समझना चाहिये। इसी प्रकार यहाँ बताये हुए राक्षस विवाहमें उपर्युक्त पैशाच विवाहका समावेश कर लेना चाहिये। प्राजापत्यको ही 'क्षात्र' विवाह भी कहा गया है।
२-सापिण्ड्य निवृत्तिके सम्बन्धमें स्मृतिका वचन है—वध्वा वरस्य वा तातः कूटस्थाद् यदि सप्तमः । पंचमी चेत्तयोर्माता तत्सापिण्ड्यं निवर्तते ।। अर्थात् 'यदि वर अथवा कन्याका पिता मूल पुरुषसे सातवीं पीढ़ीमें उत्पन्न हुआ है तथा माता पाँचवी पीढ़ीमें पैदा हुई है तो वर और कन्याके लिये सापिण्ड्यकी निवृत्ति हो जाती है।' पिताकी ओरका सापिण्ड्य सात पीढ़ीतक चलता है और माताका सापिण्ड्य पाँच पीढ़ीतक। सात पीढ़ीमें एक तो पिण्ड देनेवाला होता है, तीन पिण्डभागी होते हैं और तीन लेपभागी होते हैं।
* भीष्मजी काशिराजकी तीन कन्याओंको हरकर लाये थे, उनमेंसे दोको एक श्रेणीमें रखकर एकवचनका प्रयोग किया गया है, यह मानना चाहिये; तभी आदिपर्व अध्याय १०२ के वर्णनकी संगति ठीक लग सकती है।
अध्याय (पृष्ठ 476)
पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः
कन्याके विवाहका तथा कन्या और दौहित्र आदिके उत्तराधिकारका विचार
युधिष्ठिर उवाच
कन्यायाः प्राप्तशुल्कायाः पतिश्चेन्नास्ति कश्चन ।
तत्र का प्रतिपत्तिः स्यात् तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! जिस कन्याका मूल्य ले लिया गया हो उसका ब्याह करनेके लिये यदि कोई उपस्थित न हो, अर्थात् मूल्य देनेवाला परदेश चला गया हो और उसके भयसे दूसरा पुरुष भी उस कन्यासे विवाह करनेको तैयार न हो तो उसके पिताको क्या करना चाहिये? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
या पुत्रकस्य ऋद्धस्य प्रतिपाल्या तदा भवेत् ।
अथ चेन्नाहरेच्छुल्कं क्रीता शुल्कप्रदस्य सा ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! यदि संतानहीन धनीसे कन्याका मूल्य लिया गया है तो पिताका कर्तव्य है कि वह उसके लौटनेतक कन्याकी हर तरहसे रक्षा करे। खरीदी हुई कन्याका मूल्य जबतक लौटा नहीं दिया जाता तबतक वह कन्या मूल्य देनेवालेकी ही मानी जाती है ॥ २ ॥
तस्यार्थेऽपत्यमीहेत येन न्यायेन शक्नुयात् ।
न तस्मान्मन्त्रवत्कार्यं कश्चित् कुर्वीत किंचन ॥ ३ ॥
जिस न्यायोचित उपायसे सम्भव हो, उसीके द्वारा वह कन्या अपने मूल्यदाता पतिके लिये ही संतान उत्पन्न करनेकी इच्छा करे। अतः दूसरा कोई पुरुष वैदिक मन्त्रयुक्त विधिसे उसका पाणिग्रहण या और कोई कार्य नहीं कर सकता ॥ ३ ॥
स्वयंवृत्तेन साऽऽज्ञप्ता पित्रा वै प्रत्यपद्यत ।
तत् तस्यान्ये प्रशंसन्ति धर्मज्ञा नेतरे जनाः ॥ ४ ॥
सावित्रीने पिताकी आज्ञा लेकर स्वयं चुने हुए पतिके साथ सम्बन्ध स्थापित किया था। उसके इस कार्यकी दूसरे धर्मज्ञ पुरुष प्रशंसा करते हैं; परंतु कुछ लोग नहीं भी करते हैं ॥ ४ ॥
एतत् तु नापरे चक्रुरपरे जातु साधवः ।
साधूनां पुनराचारो गरीयान् धर्मलक्षणः ॥ ५ ॥
कुछ लोगोंका कहना है कि दूसरे सत्पुरुषोंने ऐसा नहीं किया है और कुछ कहते हैं कि अन्य सत्पुरुषोंने भी कभी-कभी ऐसा किया है। अतः श्रेष्ठ पुरुषोंका आचार ही धर्मका सर्वश्रेष्ठ लक्षण है ॥ ५ ॥
अस्मिन्नेव प्रकरणे सुक्रतुर्वाक्यमब्रवीत् । नप्ता विदेहराजस्य जनकस्य महात्मनः ॥ ६ ॥ इसी प्रसंगमें विदेहराज महात्मा जनकके नाती सुक्रतुने ऐसा कहा है ॥ ६ ॥
असदाचरिते मार्गे कथं स्यादनुकीर्तनम् । अत्र प्रश्नः संशयो वा सतामेवमुपालभेत् ॥ ७ ॥ दुराचारियोंके मार्गका शास्त्रोंद्वारा कैसे अनुमोदन किया जा सकता है? इस विषयमें सत्पुरुषोंके समक्ष प्रश्न, संशय अथवा उपालम्भ कैसे उपस्थित किया जा सकता है? ॥ ७ ॥
असदैव हि धर्मस्य प्रदानं धर्म आसुरः । नानुशुश्रुम जात्वेतामिमां पूर्वेषु कर्मसु ॥ ८ ॥ स्त्रियाँ सदा पिता, पति या पुत्रोंके संरक्षणमें ही रहती हैं, स्वतंत्र नहीं होतीं। यह पुरातन धर्म है। इस धर्मका खण्डन करना असत् कर्म या आसुर धर्म है। पूर्वकालके बड़े-बूढ़ोंमें विवाहके अवसरोंपर कभी इस आसुरी पद्धतिका अपनाया जाना हमने नहीं सुना है ॥ ८ ॥
भार्यापत्योर्हि सम्बन्धः स्त्रीपुंसोः स्वल्प एव तु । रतिः साधारणो धर्म इति चाह स पार्थिवः ॥ ९ ॥ पति और पत्नीका अथवा स्त्री और पुरुषका सम्बन्ध बहुत ही घनिष्ठ एवं सूक्ष्म है। रति उनका साधारण धर्म है। यह बात भी राजा सुक्रतुने कही थी ॥ ९ ॥
युधिष्ठिर उवाच
अथ केन प्रमाणेन पुंसामादीयते धनम् । पुत्रवद्धि पितुस्तस्य कन्या भवितुमर्हति ॥ १० ॥ **युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! पिताके लिये पुत्री भी तो पुत्रके ही समान होती है; फिर उसके रहते हुए किस प्रमाणसे केवल पुरुष ही धनके अधिकारी होते हैं? ॥ १० ॥
भीष्म उवाच
यथैवात्मा तथा पुत्रः पुत्रेण दुहिता समा । तस्यामात्मनि तिष्ठन्त्यां कथमन्यो धनं हरेत् ॥ ११ ॥ **भीष्मजीने कहा—**बेटा! पुत्र अपने आत्माके समान है और कन्या भी पुत्रके ही तुल्य है, अतः आत्मस्वरूप पुत्रके रहते हुए दूसरा कोई उसका धन कैसे ले सकता है? ॥ ११ ॥
मातुश्च यौतकं यत् स्यात् कुमारीभाग एव सः ।
दौहित्र एव तद् रिक्थमपुत्रस्य पितुर्हरेत् ।। १२ ।। माताको दहेजमें जो धन मिलता है उसपर कन्याका ही अधिकार है; अतः जिसके कोई पुत्र नहीं है उसके धनको पानेका अधिकारी उसका दौहित्र (नाती) ही है। वही उस धनको ले सकता है ।। १२ ।।
ददाति हि स पिण्डान् वै पितुर्मातामहस्य च । पुत्रदौहित्रयोरेव विशेषो नास्ति धर्मतः ।। १३ ।। दौहित्र अपने पिता और नानाको भी पिण्ड देता है। धर्मकी दृष्टिसे पुत्र और दौहित्रमें कोई अन्तर नहीं है ।। १३ ।।
अन्यत्र जामया सार्धं प्रजानां पुत्र ईहते । दुहितान्यत्र जातेन पुत्रेणापि विशिष्यते ।। १४ ।। अन्यत्र अर्थात् यदि पहले कन्या उत्पन्न हुई और वह पुत्ररूपमें स्वीकार कर ली गयी तथा उसके बाद पुत्र भी पैदा हुआ तो वह पुत्र उस कन्याके साथ ही पिताके धनका अधिकारी होता है। यदि दूसरेका पुत्र गोद लिया गया हो तो उस दत्तक पुत्रकी अपेक्षा अपनी सगी बेटी ही श्रेष्ठ मानी जाती है (अतः वह पैतृक धनके अधिक भागकी अधिकारिणी है) ।। १४ ।।
दौहित्रकेण धर्मेण नाज पश्यामि कारणम् । विक्रीतासु हि ये पुत्रा भवन्ति पितुरेव ते ।। १५ ।। जो कन्याएँ मूल्य लेकर बेच दी गयी हों उनसे उत्पन्न होनेवाले पुत्र केवल अपने पिताके ही उत्तराधिकारी होते हैं। उन्हें दौहित्रक धर्मके अनुसार नानाके धनका अधिकारी बनानेके लिये कोई युक्तिसंगत कारण मैं नहीं देखता ।। १५ ।।
असूयवस्त्वधर्मिष्ठाः परस्वादायिनः शठाः । आसुरादधिसम्भूता धर्माद् विषमवृत्तयः ।। १६ ।। आसुर विवाहसे जिन पुत्रोंकी उत्पत्ति होती है, वे दूसरोंके दोष देखनेवाले, पापाचारी, पराया धन हड़पनेवाले, शठ तथा धर्मके विपरीत बर्ताव करनेवाले होते हैं ।। १६ ।।
अत्र गाथा यमोद्गीताः कीर्तयन्ति पुराविदः । धर्मज्ञा धर्मशास्त्रेषु निबद्धा धर्मसेतुषु ।। १७ ।। इस विषयमें प्राचीन बातोंको जाननेवाले तथा धर्मशास्त्रों और धर्ममर्यादाओंमें स्थित रहनेवाले धर्मज्ञ पुरुष यमकी गायी हुई गाथाका इस प्रकार वर्णन करते हैं— ।। १७ ।।
यो मनुष्यः स्वकं पुत्रं विक्रीय धनमिच्छति । कन्यां वा जीवितार्थाय यः शुल्केन प्रयच्छति ।। १८ ।। सप्तावरे महाघोरे निरये कालसाह्वये । स्वेदं मूत्रं पुरीषं च तस्मिन् मूढः समश्नुते ।। १९ ।।
'जो मनुष्य अपने पुत्रको बेचकर धन पाना चाहता है अथवा जीविकाके लिये मूल्य लेकर कन्याको बेच देता है, वह मूढ़ कुम्भीपाक आदि सात नरकोंसे भी निकृष्ट कालसूत्र नामक नरकमें पड़कर अपने ही मल-मूत्र और पसीनेका भक्षण करता है' ।। १८-१९ ।।
आर्षे गोमिथुनं शुल्कं केचिदाहुर्मृषैव तत् ।
अल्पो वा बहु वा राजन् विक्रयस्तावदेव सः ।। २० ।।
राजन्! कुछ लोग आर्ष विवाहमें एक गाय और एक बैल—इन दो पशुओंको मूल्यके रूपमें लेनेका विधान बताते हैं, परंतु यह भी मिथ्या ही है; क्योंकि मूल्य थोड़ा लिया जाय या बहुत, उतनेहीसे वह कन्याका विक्रय हो जाता है ।। २० ।।
यद्यप्याचरितः कैश्चिन्नैष धर्मः सनातनः ।
अन्येषामपि दृश्यन्ते लोकतः सम्प्रवृत्तयः ।। २१ ।।
यद्यपि कुछ पुरुषोंने ऐसा आचरण किया है; परंतु यह सनातन धर्म नहीं है। दूसरे लोगोंमें भी लोकाचारवश बहुत-सी प्रवृत्तियाँ देखी जाती हैं ।। २१ ।।
वश्यां कुमारीं बलतो ये तां समुपभुञ्जते ।
एते पापस्य कर्तारस्तमस्यन्धे च शेरते ।। २२ ।।
जो किसी कुमारी कन्याको बलपूर्वक अपने वशमें करके उसका उपभोग करते हैं, वे पापाचारी मनुष्य अन्धकारपूर्ण नरकमें गिरते हैं ।। २२ ।।
अन्योऽप्यथ न विक्रेयो मनुष्यः किं पुनः प्रजाः ।
अधर्ममूलैर्हि धनैस्तैर्न धर्मोऽथ कश्चन ।। २३ ।।
किसी दूसरे मनुष्यको भी नहीं बेचना चाहिये; फिर अपनी संतानको बेचनेकी तो बात ही क्या? अधर्ममूलक धनसे किया हुआ कोई भी धर्म सफल नहीं होता ।। २३ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विवाहधर्मे यमगाथा नाम पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विवाहधर्मसम्बन्धी यमगाथानामक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४५ ।।
अध्याय (पृष्ठ 480)
षट्चत्वारिंशोऽध्यायः
स्त्रियोंके वस्त्राभूषणोंसे सत्कार करनेकी आवश्यकताका प्रतिपादन
भीष्म उवाच
प्राचेतसस्य वचनं कीर्तयन्ति पुराविदः ।
यस्याः किंचिन्नाददते ज्ञातयो न स विक्रयः ॥ १ ॥
अर्हणं तत्कुमारीणामानृशंस्यतमं च तत् ।
सर्वं च प्रतिदेयं स्यात् कन्यायै तदशेषतः ॥ २ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! प्राचीन इतिहासके जाननेवाले विद्वान् दक्षप्रजापतिके वचनोंको इस प्रकार उद्धृत करते हैं। कन्याके भाई-बन्धु यदि उसके वस्त्र-आभूषणके लिये धन ग्रहण करते हैं और स्वयं उसमेंसे कुछ भी नहीं लेते हैं तो वह कन्याका विक्रय नहीं है। वह तो उन कन्याओंका सत्कारमात्र है। वह परम दयालुतापूर्ण कार्य है। वह सारा धन जो कन्याके लिये ही प्राप्त हुआ हो, सब-का-सब कन्याको ही अर्पित कर देना चाहिये ॥ १-२ ॥
पितृभिर्भ्रातृभिश्चापि श्वशुरैरथ देवरैः ।
पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभिः ॥ ३ ॥
बहुविध कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पिता, भाई, श्वशुर और देवरोंको उचित है कि वे नववधूका पूजन—वस्त्राभूषणोंद्वारा सत्कार करें ॥ ३ ॥
यदि वै स्त्री न रोचेत पुमांसं न प्रमोद्येत् ।
अप्रमोदात् पुनः पुंसः प्रजनो न प्रवर्धते ॥ ४ ॥
पूज्या लालयितव्याश्च स्त्रियो नित्यं जनाधिप ।
नरेश्वर! यदि स्त्रीकी रुचि पूर्ण न की जाय तो वह अपने पतिको प्रसन्न नहीं कर सकती और उस अवस्थामें उस पुरुषकी संतानवृद्धि नहीं हो सकती। इसलिये सदा ही स्त्रियोंका सत्कार और दुलार करना चाहिये ॥ ४ ½ ॥
स्त्रियो यत्र च पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ॥ ५ ॥
अपूजिताश्च यत्रैताः सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ।
जहाँ स्त्रियोंका आदर-सत्कार होता है वहाँ देवतालोग प्रसन्नतापूर्वक निवास करते हैं तथा जहाँ इनका अनादर होता है वहाँकी सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं ॥ ५ ½ ॥
तदा चैतत् कुलं नास्ति यदा शोचन्ति जामयः ॥ ६ ॥
जामीशप्तानि गेहानि निकृत्तानीव कृत्यया ।
नैव भान्ति न वर्धन्ते श्रिया हीनानि पार्थिव ॥ ७ ॥
जब कुलकी बहू-बेटियाँ दुःख मिलनेके कारण शोकमग्न होती हैं तब उस कुलका नाश हो जाता है। वे खिन्न होकर जिन घरोंको शाप दे देती हैं, वे कृत्याके द्वारा नष्ट हुए के समान उजाड़ हो जाते हैं। पृथ्वीनाथ! वे श्रीहीन गृह न तो शोभा पाते हैं और न उनकी वृद्धि ही होती है ॥ ६-७ ॥
स्त्रियः पुंसां परिददे मनुर्जिगमिषुर्दिवम् ।
अबलाः स्वल्पकौपीनाः सुहृदः सत्यजिष्णवः ॥ ८ ॥
ईर्षवो मानकामाश्च चण्डाश्च सुहृदोऽबुधाः ।
स्त्रियस्तु मानमर्हन्ति ता मानयत मानवाः ॥ ९ ॥
स्त्रीप्रत्ययो हि वै धर्मो रतिभोगाश्च केवलाः ।
परिचर्या नमस्कारास्तदायत्ता भवन्तु वः ॥ १० ॥
महाराज मनु जब स्वर्गको जाने लगे तब उन्होंने स्त्रियोंको पुरुषोंके हाथमें सौंप दिया और कहा—'मनुष्यो! स्त्रियाँ अबला, थोड़ेसे वस्त्रोंसे काम चलानेवाली, अकारण हितसाधन करनेवाली, सत्यलोकको जीतनेकी इच्छावाली (सत्यपरायणा), ईर्ष्यालु, मान चाहनेवाली, अत्यन्त कोप करनेवाली, पुरुषके प्रति मैत्रीभाव रखनेवाली और भोली-भाली होती हैं। स्त्रियाँ सम्मान पानेके योग्य हैं, अतः तुम सब लोग उनका सम्मान करो; क्योंकि स्त्री-जाति ही धर्मकी सिद्धिका मूल कारण है। तुम्हारे रतिभोग, परिचर्या और नमस्कार स्त्रियोंके ही अधीन होंगे ॥ ८—१० ॥
उत्पादनमपत्यस्य जातस्य परिपालनम् ।
प्रीत्यर्थं लोकयात्रायाः पश्यत स्त्रीनिबन्धनम् ॥ ११ ॥
सम्मान्यमानाश्चैता हि सर्वकार्याण्यवाप्स्यथ ।
'संतानकी उत्पत्ति, उत्पन्न हुए बालकका लालन-पालन तथा लोकयात्राका प्रसन्नतापूर्वक निर्वाह—इन सबको स्त्रियोंके ही अधीन समझो। यदि तुमलोग स्त्रियोंका सम्मान करोगे तो तुम्हारे सब कार्य सिद्ध होंगे' ॥ ११ १/२ ॥
विदेहराजदुहिता चात्र श्लोकमगायत् ॥ १२ ॥
नास्ति यज्ञक्रिया काचिन्न श्राद्धं नोपवासकम् ।
धर्मः स्वभर्तृशुश्रूषा तया स्वर्गं जयन्त्युत ॥ १३ ॥
(स्त्रियोंके कर्तव्यके विषयमें) विदेहराज जनककी पुत्रीने एक श्लोकका गान किया है, जिसका सारांश इस प्रकार है—स्त्रीके लिये कोई यज्ञ आदि कर्म, श्राद्ध और उपवास करना आवश्यक नहीं है। उसका धर्म है अपने पतिकी सेवा। उसीसे स्त्रियाँ स्वर्गलोकपर विजय पा लेती हैं ॥ १२-१३ ॥
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने ।
पुत्राश्च स्थाविरे भावे न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥ १४ ॥
कुमारावस्थामें स्त्रीकी रक्षा उसका पिता करता है, जवानीमें पति उसका रक्षक है और वृद्धावस्थामें पुत्रगण उसकी रक्षा करते हैं। अतः स्त्रीको कभी स्वतन्त्र नहीं करना चाहिये ।। १४ ।।
श्रिय एताः स्त्रियो नाम सत्कार्या भूतिमिच्छता ।
पालिता निगृहीता च श्रीः स्त्री भवति भारत ।। १५ ।।
भरतनन्दन! स्त्रियाँ ही घरकी लक्ष्मी होती हैं। उन्नति चाहनेवाले पुरुषको उनका भलीभाँति सत्कार करना चाहिये। अपने वशमें रखकर उनका पालन करनेसे स्त्री श्री (लक्ष्मी)-का स्वरूप बन जाती है ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विवाहधर्मे स्त्रीप्रशंसा नाम षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विवाहधर्मके प्रसंगमें स्त्रीकी प्रशंसानामक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४६ ।।
ब्राह्मण आदि वर्णोंकी दायभाग-विधिका वर्णन
सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः
ब्राह्मण आदि वर्णोंकी दायभाग-विधिका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
सर्वशास्त्रविधानज्ञ राजधर्मविदुत्तम ।
अतीव संशयच्छेत्ता भवान् वै प्रथितः क्षितौ ॥ १ ॥
कश्चित्तु संशयो मेऽस्ति तन्मे ब्रूहि पितामह ।
जातेऽस्मिन् संशये राजन् नान्यं पृच्छेम कंचन ॥ २ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—सम्पूर्ण शास्त्रोंके विधानके ज्ञाता तथा राजधर्मके विद्वानोंमें श्रेष्ठ पितामह! आप इस भूमण्डलमें सम्पूर्ण संशयोंका सर्वथा निवारण करनेके लिये प्रसिद्ध हैं। मेरे हृदयमें एक संशय और है, उसका मेरे लिये समाधान कीजिये। राजन्! इस उत्पन्न हुए संशयके विषयमें मैं दूसरे किसीसे नहीं पूछूँगा ॥ १-२ ॥
यथा नरेण कर्तव्यं धर्ममार्गानुवर्तिना ।
एतत् सर्वं महाबाहो भवान् व्याख्यातुमर्हति ॥ ३ ॥
महाबाहो! धर्ममार्गका अनुसरण करनेवाले मनुष्यका इस विषयमें जैसा कर्तव्य हो, इस सबकी आप स्पष्टरूपसे व्याख्या करें ॥ ३ ॥
चतस्रो विहिता भार्या ब्राह्मणस्य पितामह ।
ब्राह्मणी क्षत्रिया वैश्या शूद्रा च रतिमिच्छतः ॥ ४ ॥
पितामह! ब्राह्मणके लिये चार स्त्रियाँ शास्त्र-विहित हैं—ब्राह्मणी, क्षत्रिया, वैश्या और शूद्रा। इनमेंसे शूद्रा केवल रतिकी इच्छावाले कामी पुरुषके लिये विहित है ॥ ४ ॥
तत्र जातेषु पुत्रेषु सर्वासां कुरुसत्तम ।
आनुपूर्व्येण कस्तेषां पित्र्यं दायादमर्हति ॥ ५ ॥
कुरुश्रेष्ठ! इन सबके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न हुए हों, उनमेंसे कौन क्रमशः पैतृक धनको पानेका अधिकारी है? ॥ ५ ॥
केन वा किं ततो हार्यं पितृवित्तात् पितामह ।
एतदिच्छामि कथितं विभागस्तेषु यः स्मृतः ॥ ६ ॥
पितामह! किस पुत्रको पिताके धनमेंसे कौन-सा भाग मिलना चाहिये? उनके लिये जो विभाग नियत किया गया है, उसका वर्णन मैं आपके मुहँसे सुनना चाहता हूँ ॥ ६ ॥
भीष्म उवाच
ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यस्त्रयो वर्णा द्विजातयः ।
एतेषु विहितो धर्मो ब्राह्मणस्य युधिष्ठिर ॥ ७ ॥
भीष्मजीने कहा—युधिष्ठिर! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—ये तीनों वर्ण द्विजाति कहलाते हैं; अतः इन तीन वर्णोंमें ही ब्राह्मणका विवाह धर्मतः विहित है ।। ७ ।।
वैषम्यादथवा लोभात् कामाद् वापि परंतप ।
ब्राह्मणस्य भवेच्छूद्रा न तु दृष्टान्ततः स्मृता ।। ८ ।।
परंतप नरेश! अन्यायसे, लोभसे अथवा कामनासे शूद्र जातिकी कन्या भी ब्राह्मणकी भार्या होती है; परंतु शास्त्रोंमें इसका कहीं विधान नहीं मिलता ।। ८ ।।
शूद्रां शयनमारोप्य ब्राह्मणो यात्यधोगतिम् ।
प्रायश्चित्तीयते चापि विधिदृष्टेन कर्मणा ।। ९ ।।
तत्र जातेष्वपत्येषु द्विगुणं स्याद् युधिष्ठिर ।
शूद्रजातिकी स्त्रीको अपनी शय्यापर सुलाकर ब्राह्मण अधोगतिको प्राप्त होता है। साथ ही शास्त्रीय विधिके अनुसार वह प्रायश्चित्तका भागी होता है। युधिष्ठिर! शूद्राके गर्भसे संतान उत्पन्न करनेपर ब्राह्मणको दूना पाप लगता है और उसे दूने प्रायश्चित्तका भागी होना पड़ता है ।। ९ १/२ ।।
आपद्यमानमृक्थं तु सम्प्रवक्ष्यामि भारत ।। १० ।।
लक्षण्यं गोवृषो यानं यत् प्रधानतमं भवेत् ।
ब्राह्मण्यास्तद्धरेत् पुत्र एकांशं वै पितुर्धनात् ।। ११ ।।
शेषं तु दशधा कार्यं ब्राह्मणस्वं युधिष्ठिर ।
तत्र तेनैव हर्तव्याश्चत्वारोऽंशाः पितुर्धनात् ।। १२ ।।
भरतनन्दन! अब मैं ब्राह्मण आदि वर्णोंकी कन्याओंके गर्भसे उत्पन्न होनेवाले पुत्रोंको पैतृक धनका जो भाग प्राप्त होता है, उसका वर्णन करूँगा। ब्राह्मणकी ब्राह्मणी पत्नीसे जो पुत्र उत्पन्न होता है, वह उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न गृह आदि, बैल, सवारी तथा अन्य जो-जो श्रेष्ठतम पदार्थ हों, उन सबको अर्थात् पैतृक धनके प्रधान अंशको पहले ही अपने अधिकारमें कर ले। युधिष्ठिर! फिर ब्राह्मणका जो शेष धन हो, उसके दस भाग करने चाहिये। पिताके उस धनमेंसे पुनः चार भाग ब्राह्मणीके पुत्रको ही ले लेने चाहिये ।। १०—१२ ।।
क्षत्रियायास्तु यः पुत्रो ब्राह्मणः सोऽप्यसंशयः ।
स तु मातुर्विशेषेण त्रीनंशान् हर्तुमर्हति ।। १३ ।।
क्षत्रियाका जो पुत्र है, वह भी ब्राह्मण ही होता है—इसमें संशय नहीं है। वह माताकी विशिष्टताके कारण पैतृक धनका तीन भाग ले लेनेका अधिकारी है ।। १३ ।।
वर्णे तृतीये जातस्तु वैश्यायां ब्राह्मणादपि ।
द्विरंशस्तेन हर्तव्यो ब्राह्मणस्वाद् युधिष्ठिर ।। १४ ।।
युधिष्ठिर! तीसरे वर्णकी कन्या वैश्यामें जो ब्राह्मणसे पुत्र उत्पन्न होता है, उसे ब्राह्मणके धनमेंसे दो भाग लेने चाहिये ।। १४ ।।
शूद्रायां ब्राह्मणाज्जातो नित्यादेयधनः स्मृतः ।
अल्पं चापि प्रदातव्यं शूद्रापुत्राय भारत ।। १५ ।।
भारत! ब्राह्मणसे शूद्रामें जो पुत्र उत्पन्न होता है, उसे तो धन न देनेका ही विधान है तो भी शूद्राके पुत्रको पैतृक धनका स्वल्पतम भाग—एक अंश दे देना चाहिये ।। १५ ।।
दशधा प्रविभक्तस्य धनस्यैष भवेत् क्रमः ।
सवर्णासु तु जातानां समान् भागान् प्रकल्पयेत् ।। १६ ।।
दस भागोंमें विभक्त हुए बँटवारेका यही क्रम होता है। परंतु जो समान वर्णकी स्त्रियोंसे उत्पन्न हुए पुत्र हैं, उन सबके लिये बराबर भागोंकी कल्पना करनी चाहिये ।। १६ ।।
अब्राह्मणं तु मन्यन्ते शूद्रापुत्रमनैपुणात् ।
त्रिषु वर्णेषु जातो हि ब्राह्मणाद् ब्राह्मणो भवेत् ।। १७ ।।
ब्राह्मणसे शूद्राके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न होता है, उसे ब्राह्मण नहीं मानते हैं; क्योंकि उसमें ब्राह्मणो-चित निपुणता नहीं पायी जाती। शेष तीन वर्णकी स्त्रियोंसे ब्राह्मणद्वारा जो पुत्र उत्पन्न होता है, वह ब्राह्मण होता है ।। १७ ।।
स्मृताश्च वर्णाश्चत्वारः पञ्चमो नाधिगम्यते ।
हरेच्च दशमं भागं शूद्रापुत्रः पितुर्धनात् ।। १८ ।।
चार ही वर्ण बताये हैं, पाँचवाँ वर्ण नहीं मिलता। शूद्राका पुत्र ब्राह्मण पिताके धनसे उसका दसवाँ भाग ले सकता है ।। १८ ।।
तत्त दत्तं हरेत् पित्रा नादत्तं हर्तुमर्हति ।
अवश्यं हि धनं देयं शूद्रापुत्राय भारत ।। १९ ।।
वह भी पिताके देनेपर ही उसे लेना चाहिये, बिना दिये उसे लेनेका कोई अधिकार नहीं है। भरतनन्दन! किंतु शूद्राके पुत्रको भी धनका भाग अवश्य दे देना चाहिये ।। १९ ।।
आनृशंस्यं परो धर्म इति तस्मै प्रदीयते ।
यत्र तत्र समुत्पन्नं गुणायैवोपपद्यते ।। २० ।।
दया सबसे बड़ा धर्म है। यह समझकर ही उसे धनका भाग दिया जाता है। दया जहाँ भी उत्पन्न हो, वह गुणकारक ही होती है ।। २० ।।
यद्यप्येष सपुत्रः स्यादपुत्रो यदि वा भवेत् ।
नाधिकं दशमाद् दद्याच्छूद्रापुत्राय भारत ।। २१ ।।
भारत! ब्राह्मणके अन्य वर्णकी स्त्रियोंसे पुत्र हों या न हों, वह शूद्राके पुत्रको दसवें भागसे अधिक धन न दे ।। २१ ।।
त्रैवार्षिकाद् यदा भक्तादधिकं स्याद् द्विजस्य तु ।
यजेत तेन द्रव्येण न वृथा साधयेद् धनम् ।। २२ ।।
जब ब्राह्मणके पास तीन वर्षतक निर्वाह होनेसे अधिक धन एकत्र हो जाय तब वह उस धनसे यज्ञ करे। धनका व्यर्थ संग्रह न करे ।। २२ ।।
त्रिसहस्रपरो दायः स्त्रियै देयो धनस्य वै । भर्त्रा तच्च धनं दत्तं यथार्हं भोक्तुमर्हति ॥ २३ ॥ स्त्रीको तीन हजारसे अधिक लागतका धन नहीं देना चाहिये। पतिके देनेपर ही उस धनको वह यथोचित रूपसे उपभोगमें ला सकती है ॥ २३ ॥
स्त्रीणां तु पतिदायाद्यमुपभोगफलं स्मृतम् । नापहारं स्त्रियः कुर्युः पतिवित्तात् कथंचन ॥ २४ ॥ स्त्रियोंको पतिके धनसे जो हिस्सा मिलता है, उसका उपभोग ही (उसके लिये) फल माना गया है। पतिके दिये हुए स्त्रीधनसे पुत्र आदिको कुछ नहीं लेना चाहिये ॥ २४ ॥
स्त्रियास्तु यद् भवेत् वित्तं पित्रा दत्तं युधिष्ठिर । ब्राह्मण्यास्तद्धरेत् कन्या यथा पुत्रस्तथा हि सा ॥ २५ ॥ युधिष्ठिर! ब्राह्मणीको पिताकी ओरसे जो धन मिला हो, उस धनको उसकी पुत्री ले सकती है; क्योंकि जैसा पुत्र है, वैसी ही पुत्री भी है ॥ २५ ॥
सा हि पुत्रसमा राजन् विहिता कुरुनन्दन । एवमेव समुद्दिष्टो धर्मो वै भरतर्षभ । एवं धर्ममनुस्मृत्य न वृथा साधयेद् धनम् ॥ २६ ॥ कुरुनन्दन! भरतकुलभूषण नरेश! पुत्री पुत्रके समान ही है—ऐसा शास्त्रका विधान है। इस प्रकार वही धनके विभाजनकी धर्मयुक्त प्रणाली बतायी गयी है। इस तरह धर्मका चिन्तन एवं अनुस्मरण करते हुए ही धनका उपार्जन एवं संग्रह करे। परंतु उसे व्यर्थ न होने दे—यज्ञ-यागादिके द्वारा सफल कर ले ॥ २६ ॥
युधिष्ठिर उवाच
शूद्रायां ब्राह्मणाज्जातो यद्यदेयधनः स्मृतः । केन प्रतिविशेषेण दशमोऽप्यस्य दीयते ॥ २७ ॥ युधिष्ठिरने पूछा—दादाजी! यदि ब्राह्मणसे शूद्रामें उत्पन्न हुए पुत्रको धन न देने योग्य बताया गया है तो किस विशेषताके कारण उसको पैतृक धनका दसवाँ भाग भी दिया जाता है? ॥ २७ ॥
ब्राह्मण्यां ब्राह्मणाज्जातो ब्राह्मणः स्यान्न संशयः । क्षत्रियायां तथैव स्याद् वैश्यायामपि चैव हि ॥ २८ ॥ ब्राह्मणसे ब्राह्मणीमें उत्पन्न हुआ पुत्र ब्राह्मण हो—इसमें कोई संशय ही नहीं है; वैसे ही क्षत्रिया और वैश्याके गर्भसे उत्पन्न हुए पुत्र भी ब्राह्मण ही होते हैं ॥ २८ ॥
कस्मात् तु विषमं भागं भजेरन् नृपसत्तम । यदा सर्वे त्रयो वर्णास्त्वयोक्ता ब्राह्मणा इति ॥ २९ ॥
नृपश्रेष्ठ! जब आपने ब्राह्मण आदि तीनों वर्णोंवाली स्त्रियोंसे उत्पन्न हुए पुत्रोंको ब्राह्मण ही बताया है, तब वे पैतृक धनका समान भाग क्यों नहीं पाते हैं? क्यों वे विषम भाग ग्रहण करें? ।। २९ ।।
भीष्म उवाच
दारा इत्युच्यते लोके नाम्नैकेन परंतप ।
प्रोक्तेन चैव नाम्नायं विशेषः सुमहान् भवेत् ।। ३० ।।
भीष्मजीने कहा— शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! लोकमें सब स्त्रियोंका 'दारा' इस एक नामसे ही परिचय दिया जाता है। इस तथाकथित नामसे ही चारों वर्णोंकी स्त्रियोंसे उत्पन्न हुए पुत्रोंमें महान् अन्तर हो जाता है* ।। ३० ।।
तिस्रः कृत्वा पुरो भार्याः पश्चाद् विन्देत ब्राह्मणीम् ।
सा ज्येष्ठा सा च पूज्या स्यात् सा च भार्या गरीयसी ।। ३१ ।।
ब्राह्मण पहले अन्य तीनों वर्णोंकी स्त्रियोंको ब्याह लानेके पश्चात् भी यदि ब्राह्मणकन्यासे विवाह करे तो वही अन्य स्त्रियोंकी अपेक्षा ज्येष्ठ, अधिक आदर-सत्कारके योग्य तथा विशेष गौरवकी अधिकारिणी होगी ।।
स्नानं प्रसाधनं भर्तुर्दन्तधावनमञ्जनम् ।
हव्यं कव्यं च यच्चान्यद् धर्मयुक्तं गृहे भवेत् ।। ३२ ।।
न तस्यां जातु तिष्ठन्त्यामन्या तत् कर्तुमर्हति ।
ब्राह्मणी त्वेव कुर्याद् वा ब्राह्मणस्य युधिष्ठिर ।। ३३ ।।
युधिष्ठिर! पतिको स्नान कराना, उनके लिये शृंगार-सामग्री प्रस्तुत करना, दाँतकी सफाईके लिये दातौन और मंजन देना, पतिके नेत्रोंमें आँजन या सुरमा लगाना, प्रतिदिन हवन और पूजनके समय हव्य और कव्यकी सामग्री जुटाना तथा घरमें और भी जो धार्मिक कृत्य हो उसके सम्पादनमें योग देना—ये सब कार्य ब्राह्मणके लिये ब्राह्मणीको ही करने चाहिये। उसके रहते हुए दूसरे किसी वर्णवाली स्त्रीको यह सब करनेका अधिकार नहीं है ।। ३२-३३ ।।
अन्नं पानं च माल्यं च वासांस्याभरणानि च ।
ब्राह्मण्यैतानि देयानि भर्तुः सा हि गरीयसी ।। ३४ ।।
पतिको अन्न, पान, माला, वस्त्र और आभूषण—ये सब वस्तुएँ ब्राह्मणी ही समर्पित करे; क्योंकि वही उसके लिये सब स्त्रियोंसे अधिक गौरवकी अधिकारिणी है ।। ३४ ।।
मनुनाभिहितं शास्त्रं यच्चापि कुरुनन्दन ।
तत्राप्येष महाराज दृष्टो धर्मः सनातनः ।। ३५ ।।
महाराज कुरुनन्दन! मनुने भी जिस धर्मशास्त्रका प्रतिपादन किया है, उसमें भी यही सनातन धर्म देखा गया है ।। ३५ ।।
अथ चेदन्यथा कुर्याद् यदि कामाद् युधिष्ठिर । यथा ब्राह्मण चाण्डालः पूर्वदृष्टस्तथैव सः ॥ ३६ ॥ युधिष्ठिर! यदि ब्राह्मण कामके वशीभूत होकर इस शास्त्रीय पद्धतिके विपरीत बर्ताव करता है, वह ब्राह्मण चाण्डाल समझा जाता है जैसा कि पहले कहा गया है ॥ ३६ ॥
ब्राह्मण्याः सदृशः पुत्रः क्षत्रियायाश्च यो भवेत् । राजन् विशेषो यस्त्वत्र वर्णयोरुभयोरपि ॥ ३७ ॥ राजन्! ब्राह्मणके समान ही जो क्षत्रियाका पुत्र होगा, उसमें भी उभयवर्णसम्बन्धी अन्तर तो रहेगा ही ॥ ३७ ॥
न तु जात्या समा लोके ब्राह्मण्याः क्षत्रिया भवेत् । ब्राह्मण्याः प्रथमः पुत्रो भूयान् स्याद् राजसत्तम ॥ ३८ ॥ भूयो भूयोऽपि संहार्यः पितृवित्ताद् युधिष्ठिर । क्षत्रियकन्या संसारमें अपनी जातिद्वारा ब्राह्मण-कन्याके बराबर नहीं हो सकती। नृपश्रेष्ठ! इसी प्रकार ब्राह्मणीका पुत्र क्षत्रियाके पुत्रसे प्रथम एवं ज्येष्ठ होगा। युधिष्ठिर! इसलिये पिताके धनमेंसे ब्राह्मणीके पुत्रको अधिक-अधिक भाग देना चाहिये ॥ ३८ १/२ ॥
यथा न सदृशी जातु ब्राह्मण्याः क्षत्रिया भवेत् ॥ ३९ ॥ क्षत्रियायास्तथा वैश्या न जातु सदृशी भवेत् । जैसे क्षत्रिया कभी ब्राह्मणीके समान नहीं हो सकती वैसे ही वैश्या भी कभी क्षत्रियाके तुल्य नहीं हो सकती ॥ ३९ १/२ ॥
श्रीश्च राज्यं च कोशश्च क्षत्रियाणां युधिष्ठिर ॥ ४० ॥ विहितं दृश्यते राजन् सागरान्तां च मेदिनीम् । क्षत्रियो हि स्वधर्मेण श्रियं प्राप्नोति भूयसीम् । राजा दण्डधरो राजन् रक्षा नान्यत्र क्षत्रियात् ॥ ४१ ॥ राजा युधिष्ठिर! लक्ष्मी, राज्य और कोष—यह सब शास्त्रमें क्षत्रियोंके लिये ही विहित देखा जाता है। राजन्! क्षत्रिय अपने धर्मके अनुसार समुद्रपर्यन्त पृथ्वी तथा बहुत बड़ी सम्पत्ति प्राप्त कर लेता है। नरेश्वर! राजा (क्षत्रिय) दण्ड धारण करनेवाला होता है। क्षत्रियके सिवा और किसीसे रक्षाका कार्य नहीं हो सकता ॥ ४०-४१ ॥
ब्राह्मणा हि महाभागा देवानापि देवताः । तेषु राजन् प्रवर्तेत पूजया विधिपूर्वकम् ॥ ४२ ॥ राजन्! महाभाग! ब्राह्मण देवताओंके भी देवता हैं; अतः उनका विधिपूर्वक पूजन-आदर-सत्कार करते हुए ही उनके साथ बर्ताव करे ॥ ४२ ॥
प्रणीतमृषिभिर्ज्ञात्वा धर्मं शाश्वतमव्ययम् । लुप्यमानं स्वधर्मेण क्षत्रियो ह्येष रक्षति ॥ ४३ ॥
ऋषिर्योंद्वारा प्रतिपादित अविनाशी सनातन धर्मको लुप्त होता जानकर क्षत्रिय अपने धर्मके अनुसार उसकी रक्षा करता है ॥ ४३ ॥
दस्युभिर्ह्रियमाणं च धनं दारांश्च सर्वशः ।
सर्वेषामेव वर्णानां त्राता भवति पार्थिवः ॥ ४४ ॥
डाकुओंद्वारा लूटे जाते हुए सभी वर्णोंके धन और स्त्रियोंका राजा ही रक्षक होता है ॥ ४४ ॥
भूयान् स्यात् क्षत्रियापुत्रो वैश्यापुत्रान्न संशयः ।
भूयस्तेनापि हर्तव्यं पितृवित्ताद् युधिष्ठिर ॥ ४५ ॥
इन सब दृष्टियोंसे क्षत्रियाका पुत्र वैश्याके पुत्रसे श्रेष्ठ होता है—इसमें संशय नहीं है। युधिष्ठिर! इसलिये शेष पैतृक धनमेंसे उसको भी विशेष भाग लेना ही चाहिये ॥ ४५ ॥
युधिष्ठिर उवाच
उक्तं ते विधिवद् राजन् ब्राह्मणस्य पितामह ।
इतरेषां तु वर्णानां कथं वै नियमो भवेत् ॥ ४६ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! आपने ब्राह्मणके धनका विभाजन विधिपूर्वक बता दिया। अब यह बताइये कि अन्य वर्णोंके धनके बँटवारेका कैसा नियम होना चाहिये? ॥ ४६ ॥
भीष्म उवाच
क्षत्रियस्यापि भार्ये द्वे विहिते कुरुनन्दन ।
तृतीया च भवेच्छूद्रा न तु दृष्टान्ततः स्मृता ॥ ४७ ॥
भीष्मजीने कहा— कुरुनन्दन! क्षत्रियके लिये भी दो वर्णोंकी भार्याएँ शास्त्रविहित हैं। तीसरी शूद्रा भी उसकी भार्या हो सकती है। परंतु शास्त्रसे उसका समर्थन नहीं होता ॥ ४७ ॥
एष एव क्रमो हि स्यात् क्षत्रियाणां युधिष्ठिर ।
अष्टधा तु भवेत् कार्यं क्षत्रियस्वं जनाधिप ॥ ४८ ॥
राजा युधिष्ठिर! क्षत्रियोंके लिये भी बँटवारेका यही क्रम है। क्षत्रियके धनको आठ भागोंमें विभक्त करना चाहिये ॥ ४८ ॥
क्षत्रियाया हरेत् पुत्रश्चतुरोंऽशान् पितुर्धनात् ।
युद्धावहारिकं यच्च पितुः स्यात् स हरेत् तु तत् ॥ ४९ ॥
क्षत्रियाका पुत्र उस पैतृक धनमेंसे चार भाग स्वयं ग्रहण कर ले तथा पिताकी जो युद्धसामग्री है, उसको भी वही ले ले ॥ ४९ ॥
वैश्यापुत्रस्तु भागांस्त्रीन् शूद्रापुत्रस्तथाष्टमम् ।
सोऽपि दत्तं हरेत् पित्रा नादत्तं हर्तुमर्हति ॥ ५० ॥
शेष धनमेंसे तीन भाग वैश्याका पुत्र ले ले और अवशिष्ट आठवाँ भाग शूद्राका पुत्र प्राप्त करे। वह भी पिताके देनेपर ही उसे लेना चाहिये। बिना दिया हुआ धन ले जानेका उसे अधिकार नहीं है ।। ५० ।।
एकैव हि भवेद् भार्या वैश्यस्य कुरुनन्दन ।
द्वितीया तु भवेत् शूद्रा न तु दृष्टान्ततः स्मृता ।। ५१ ।।
कुरुनन्दन! वैश्यकी एक ही वैश्यकन्या धर्मानुसार भार्या हो सकती है। दूसरी शूद्रा भी होती है, परंतु शास्त्रसे उसका समर्थन नहीं होता है ।। ५१ ।।
वैश्यस्य वर्तमानस्य वैश्यायां भरतर्षभ ।
शूद्रायां चापि कौन्तेय तयोर्विनियमः स्मृतः ।। ५२ ।।
भरतश्रेष्ठ! कुन्तीकुमार! वैश्यके वैश्या और शूद्रा दोनोंके गर्भसे पुत्र हों तो उनके लिये भी धनके बँटवारेका वैसा ही नियम है ।। ५२ ।।
पञ्चधा तु भवेत् कार्यं वैश्यस्वं भरतर्षभ ।
तयोरपत्ये वक्ष्यामि विभागं च जनाधिप ।। ५३ ।।
भरतभूषण नरेश! वैश्यके धनको पाँच भागोंमें विभक्त करना चाहिये। फिर वैश्या और शूद्राके पुत्रोंमें उस धनका विभाजन कैसे करना चाहिये, यह बताता हूँ ।।
वैश्यापुत्रेण हर्तव्याश्चत्वारोंऽशाः पितुर्धनात् ।
पञ्चमस्तु स्मृतो भागः शूद्रापुत्राय भारत ।। ५४ ।।
भरतनन्दन! उस पैतृक धनमेंसे चार भाग तो वैश्याके पुत्रको ले लेने चाहिये और पाँचवाँ अंश शूद्राके पुत्रका भाग बताया गया है ।। ५४ ।।
सोऽपि दत्तं हरेत् पित्रा नादत्तं हर्तुमर्हति ।
त्रिभिर्वर्णैः सदा जातः शूद्रोऽदेयधनो भवेत् ।। ५५ ।।
वह भी पिताके देनेपर ही उस धनको ले सकता है। बिना दिया हुआ धन लेनेका उसे कोई अधिकार नहीं है। तीनों वर्णोंसे उत्पन्न हुआ शूद्र सदा धन न देनेके योग्य ही होता है ।। ५५ ।।
शूद्रस्य स्यात् सवर्णैव भार्या नान्या कथंचन ।
समभागाश्च पुत्राः स्युर्यदि पुत्रशतं भवेत् ।। ५६ ।।
शूद्रकी एक ही अपनी जातिकी ही स्त्री भार्या होती है। दूसरी किसी प्रकार नहीं। उसके सभी पुत्र, वे सौ भाई क्यों न हों, पैतृक धनमेंसे समान भागके अधिकारी होते हैं ।। ५६ ।।
जातानां समवर्णायाः पुत्राणामविशेषतः ।
सर्वेषामेव वर्णानां समभागो धनात् स्मृतः ।। ५७ ।।
समस्त वर्णोंके सभी पुत्रोंका, जो समान वर्णकी स्त्रीसे उत्पन्न हुए हैं, सामान्यतः पैतृक धनमें समान भाग माना गया है ।। ५७ ।।
ज्येष्ठस्य भागो ज्येष्ठः स्यादेकांशो यः प्रधानतः ।
एष दायविधिः पार्थ पूर्वमुक्तः स्वयम्भुवा ।। ५८ ।। कुन्तीनन्दन! ज्येष्ठ पुत्रका भाग भी ज्येष्ठ होता है। उसे प्रधानतः एक अंश अधिक मिलता है। पूर्वकालमें स्वयम्भू ब्रह्माजीने पैतृक धनके बँटवारेकी यह विधि बतायी थी ।। ५८ ।।
समवर्णासु जातानां विशेषोऽस्त्यपरो नृप । विवाहवैशिष्ट्यकृतः पूर्वपूर्वो विशिष्यते ।। ५९ ।। नरेश्वर! समान वर्णकी स्त्रियोंमें जो पुत्र उत्पन्न हुए हैं, उनमें यह दूसरी विशेषता ध्यान देने योग्य है। विवाहकी विशिष्टताके कारण उन पुत्रोंमें भी विशिष्टता आ जाती है। अर्थात् पहले विवाहकी स्त्रीसे उत्पन्न हुआ पुत्र श्रेष्ठ और दूसरे विवाहकी स्त्रीसे पैदा हुआ पुत्र कनिष्ठ होता है ।। ५९ ।।
हरेज्ज्येष्ठः प्रधानांशमेकं तुल्यासु तेष्वपि । मध्यमो मध्यमं चैव कनीयांस्तु कनीयसम् ।। ६० ।। तुल्य वर्णवाली स्त्रियोंसे उत्पन्न हुए उन पुत्रोंमें भी जो ज्येष्ठ है, वह एक भाग ज्येष्ठांश ले सकता है। मध्यम पुत्रको मध्यम और कनिष्ठ पुत्रको कनिष्ठ भाग लेना चाहिये ।। ६० ।।
एवं जातिषु सर्वासु सवर्णः श्रेष्ठतां गतः । महर्षिरपि चैतद् वै मारीचः काश्यपोऽब्रवीत् ।। ६१ ।। इस प्रकार सभी जातियोंमें समान वर्णकी स्त्रीसे उत्पन्न हुआ पुत्र ही श्रेष्ठ होता है। मरीचि-पुत्र महर्षि काश्यपने भी यही बात बतायी है ।। ६१ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विवाहधर्मे रिक्थविभागो नाम सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४७ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विवाहधर्मके अन्तर्गत पैतृक धनका विभागनामक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४७ ।।
* 'दार' शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है—'आद्रियन्ते त्रिवर्गार्थिभिः इति दारा'। धर्म, अर्थ और कामकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंद्वारा जिनका आदर किया जाता है, वे दारा हैं। जहाँतक भोगविषयक आदर है, वह तो सभी स्त्रियोंके साथ समान है, परंतु व्यावहारिक जगत्में जो पतिके द्वारा आदर प्राप्त होता है, वह वर्णक्रमसे यथायोग्य न्यूनाधिक मात्रामें ही उपलब्ध होता है। यही बात उनके पुत्रोंके सम्बन्धमें भी लागू होती है। इसीलिये उनके पुत्रोंको पैतृक धनके विषयमें कम और अधिक भाग ग्रहण करनेका अधिकार है।
वर्णसंकर संतानोंकी उत्पत्तिका विस्तारसे वर्णन
अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः
वर्णसंकर संतानोंकी उत्पत्तिका विस्तारसे वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
अर्थाल्लोभाद् वा कामाद् वा वर्णानां चाप्यनिश्चयात् ।
अज्ञानाद् वापि वर्णानां जायते वर्णसंकरः ।। १ ।।
तेषामेतेन विधिना जातानां वर्णसंकरे ।
को धर्मः कानि कर्माणि तन्मे ब्रूहि पितामह ।। २ ।।
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! धन पाकर या धनके लोभमें आकर अथवा कामनाके वशीभूत होकर जब उच्च वर्णकी स्त्री नीच वर्णके पुरुषके साथ सम्बन्ध स्थापित कर लेती है तब वर्णसंकर संतान उत्पन्न होती है। वर्णोंका निश्चय अथवा ज्ञान न होनेसे भी वर्णसंकरकी उत्पत्ति होती है। इस रीतिसे जो वर्णोंके मिश्रणद्वारा उत्पन्न हुए मनुष्य हैं, उनका क्या धर्म है? और कौन-कौन-से कर्म हैं? यह मुझे बताइये ।। १-२ ।।
भीष्म उवाच
चातुर्वर्ण्यस्य कर्माणि चातुर्वर्ण्यं च केवलम् ।
असृजत् स हि यज्ञार्थे पूर्वमेव प्रजापतिः ।। ३ ।।
भीष्मजीने कहा— बेटा! पूर्वकालमें प्रजापतिने यज्ञके लिये केवल चार वर्णों और उनके पृथक्-पृथक् कर्मोंकी ही रचना की थी ।। ३ ।।
भार्याश्चतस्रो विप्रस्य द्वयोरात्मा प्रजायते ।
आनुपूर्व्याद् द्वयोर्हीनौ मातृजातौ प्रसूततः ।। ४ ।।
ब्राह्मणकी जो चार भार्याएँ बतायी गयी हैं, उनमेंसे दो स्त्रियों—ब्राह्मणी और क्षत्रियाके गर्भसे ब्राह्मण ही उत्पन्न होता है और शेष दो वैश्या और शूद्रा स्त्रियोंके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न होते हैं, वे ब्राह्मणत्वसे हीन क्रमशः माताकी जातिके समझे जाते हैं ।। ४ ।।
परं शवाद् ब्राह्मणस्यैव पुत्रः
शूद्रापुत्रं पारशवं तमाहुः ।
शुश्रूषकः स्वस्य कुलस्य स स्यात्
स्वचारित्रं नित्यमथो न जह्यात् ।। ५ ।।
शूद्राके गर्भसे उत्पन्न हुआ ब्राह्मणका ही जो पुत्र है, वह शवसे अर्थात् शूद्रसे पर—उत्कृष्ट बताया गया है; इसीलिये ऋषिगण उसे पारशव कहते हैं। उसे अपने कुलकी सेवा करनी चाहिये और अपने इस सेवारूप आचारका कभी परित्याग नहीं करना चाहिये ।। ५ ।।