महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 490, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंशेष धनमेंसे तीन भाग वैश्याका पुत्र ले ले और अवशिष्ट आठवाँ भाग शूद्राका पुत्र प्राप्त करे। वह भी पिताके देनेपर ही उसे लेना चाहिये। बिना दिया हुआ धन ले जानेका उसे अधिकार नहीं है ।। ५० ।।
एकैव हि भवेद् भार्या वैश्यस्य कुरुनन्दन ।
द्वितीया तु भवेत् शूद्रा न तु दृष्टान्ततः स्मृता ।। ५१ ।।
कुरुनन्दन! वैश्यकी एक ही वैश्यकन्या धर्मानुसार भार्या हो सकती है। दूसरी शूद्रा भी होती है, परंतु शास्त्रसे उसका समर्थन नहीं होता है ।। ५१ ।।
वैश्यस्य वर्तमानस्य वैश्यायां भरतर्षभ ।
शूद्रायां चापि कौन्तेय तयोर्विनियमः स्मृतः ।। ५२ ।।
भरतश्रेष्ठ! कुन्तीकुमार! वैश्यके वैश्या और शूद्रा दोनोंके गर्भसे पुत्र हों तो उनके लिये भी धनके बँटवारेका वैसा ही नियम है ।। ५२ ।।
पञ्चधा तु भवेत् कार्यं वैश्यस्वं भरतर्षभ ।
तयोरपत्ये वक्ष्यामि विभागं च जनाधिप ।। ५३ ।।
भरतभूषण नरेश! वैश्यके धनको पाँच भागोंमें विभक्त करना चाहिये। फिर वैश्या और शूद्राके पुत्रोंमें उस धनका विभाजन कैसे करना चाहिये, यह बताता हूँ ।।
वैश्यापुत्रेण हर्तव्याश्चत्वारोंऽशाः पितुर्धनात् ।
पञ्चमस्तु स्मृतो भागः शूद्रापुत्राय भारत ।। ५४ ।।
भरतनन्दन! उस पैतृक धनमेंसे चार भाग तो वैश्याके पुत्रको ले लेने चाहिये और पाँचवाँ अंश शूद्राके पुत्रका भाग बताया गया है ।। ५४ ।।
सोऽपि दत्तं हरेत् पित्रा नादत्तं हर्तुमर्हति ।
त्रिभिर्वर्णैः सदा जातः शूद्रोऽदेयधनो भवेत् ।। ५५ ।।
वह भी पिताके देनेपर ही उस धनको ले सकता है। बिना दिया हुआ धन लेनेका उसे कोई अधिकार नहीं है। तीनों वर्णोंसे उत्पन्न हुआ शूद्र सदा धन न देनेके योग्य ही होता है ।। ५५ ।।
शूद्रस्य स्यात् सवर्णैव भार्या नान्या कथंचन ।
समभागाश्च पुत्राः स्युर्यदि पुत्रशतं भवेत् ।। ५६ ।।
शूद्रकी एक ही अपनी जातिकी ही स्त्री भार्या होती है। दूसरी किसी प्रकार नहीं। उसके सभी पुत्र, वे सौ भाई क्यों न हों, पैतृक धनमेंसे समान भागके अधिकारी होते हैं ।। ५६ ।।
जातानां समवर्णायाः पुत्राणामविशेषतः ।
सर्वेषामेव वर्णानां समभागो धनात् स्मृतः ।। ५७ ।।
समस्त वर्णोंके सभी पुत्रोंका, जो समान वर्णकी स्त्रीसे उत्पन्न हुए हैं, सामान्यतः पैतृक धनमें समान भाग माना गया है ।। ५७ ।।
ज्येष्ठस्य भागो ज्येष्ठः स्यादेकांशो यः प्रधानतः ।