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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 491, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 491

एष दायविधिः पार्थ पूर्वमुक्तः स्वयम्भुवा ।। ५८ ।। कुन्तीनन्दन! ज्येष्ठ पुत्रका भाग भी ज्येष्ठ होता है। उसे प्रधानतः एक अंश अधिक मिलता है। पूर्वकालमें स्वयम्भू ब्रह्माजीने पैतृक धनके बँटवारेकी यह विधि बतायी थी ।। ५८ ।।

समवर्णासु जातानां विशेषोऽस्त्यपरो नृप । विवाहवैशिष्ट्यकृतः पूर्वपूर्वो विशिष्यते ।। ५९ ।। नरेश्वर! समान वर्णकी स्त्रियोंमें जो पुत्र उत्पन्न हुए हैं, उनमें यह दूसरी विशेषता ध्यान देने योग्य है। विवाहकी विशिष्टताके कारण उन पुत्रोंमें भी विशिष्टता आ जाती है। अर्थात् पहले विवाहकी स्त्रीसे उत्पन्न हुआ पुत्र श्रेष्ठ और दूसरे विवाहकी स्त्रीसे पैदा हुआ पुत्र कनिष्ठ होता है ।। ५९ ।।

हरेज्ज्येष्ठः प्रधानांशमेकं तुल्यासु तेष्वपि । मध्यमो मध्यमं चैव कनीयांस्तु कनीयसम् ।। ६० ।। तुल्य वर्णवाली स्त्रियोंसे उत्पन्न हुए उन पुत्रोंमें भी जो ज्येष्ठ है, वह एक भाग ज्येष्ठांश ले सकता है। मध्यम पुत्रको मध्यम और कनिष्ठ पुत्रको कनिष्ठ भाग लेना चाहिये ।। ६० ।।

एवं जातिषु सर्वासु सवर्णः श्रेष्ठतां गतः । महर्षिरपि चैतद् वै मारीचः काश्यपोऽब्रवीत् ।। ६१ ।। इस प्रकार सभी जातियोंमें समान वर्णकी स्त्रीसे उत्पन्न हुआ पुत्र ही श्रेष्ठ होता है। मरीचि-पुत्र महर्षि काश्यपने भी यही बात बतायी है ।। ६१ ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विवाहधर्मे रिक्थविभागो नाम सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४७ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विवाहधर्मके अन्तर्गत पैतृक धनका विभागनामक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४७ ।।


* 'दार' शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है—'आद्रियन्ते त्रिवर्गार्थिभिः इति दारा'। धर्म, अर्थ और कामकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंद्वारा जिनका आदर किया जाता है, वे दारा हैं। जहाँतक भोगविषयक आदर है, वह तो सभी स्त्रियोंके साथ समान है, परंतु व्यावहारिक जगत्में जो पतिके द्वारा आदर प्राप्त होता है, वह वर्णक्रमसे यथायोग्य न्यूनाधिक मात्रामें ही उपलब्ध होता है। यही बात उनके पुत्रोंके सम्बन्धमें भी लागू होती है। इसीलिये उनके पुत्रोंको पैतृक धनके विषयमें कम और अधिक भाग ग्रहण करनेका अधिकार है।