भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 477, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 477

कुछ लोगोंका कहना है कि दूसरे सत्पुरुषोंने ऐसा नहीं किया है और कुछ कहते हैं कि अन्य सत्पुरुषोंने भी कभी-कभी ऐसा किया है। अतः श्रेष्ठ पुरुषोंका आचार ही धर्मका सर्वश्रेष्ठ लक्षण है ॥ ५ ॥

अस्मिन्नेव प्रकरणे सुक्रतुर्वाक्यमब्रवीत् । नप्ता विदेहराजस्य जनकस्य महात्मनः ॥ ६ ॥ इसी प्रसंगमें विदेहराज महात्मा जनकके नाती सुक्रतुने ऐसा कहा है ॥ ६ ॥

असदाचरिते मार्गे कथं स्यादनुकीर्तनम् । अत्र प्रश्नः संशयो वा सतामेवमुपालभेत् ॥ ७ ॥ दुराचारियोंके मार्गका शास्त्रोंद्वारा कैसे अनुमोदन किया जा सकता है? इस विषयमें सत्पुरुषोंके समक्ष प्रश्न, संशय अथवा उपालम्भ कैसे उपस्थित किया जा सकता है? ॥ ७ ॥

असदैव हि धर्मस्य प्रदानं धर्म आसुरः । नानुशुश्रुम जात्वेतामिमां पूर्वेषु कर्मसु ॥ ८ ॥ स्त्रियाँ सदा पिता, पति या पुत्रोंके संरक्षणमें ही रहती हैं, स्वतंत्र नहीं होतीं। यह पुरातन धर्म है। इस धर्मका खण्डन करना असत् कर्म या आसुर धर्म है। पूर्वकालके बड़े-बूढ़ोंमें विवाहके अवसरोंपर कभी इस आसुरी पद्धतिका अपनाया जाना हमने नहीं सुना है ॥ ८ ॥

भार्यापत्योर्हि सम्बन्धः स्त्रीपुंसोः स्वल्प एव तु । रतिः साधारणो धर्म इति चाह स पार्थिवः ॥ ९ ॥ पति और पत्नीका अथवा स्त्री और पुरुषका सम्बन्ध बहुत ही घनिष्ठ एवं सूक्ष्म है। रति उनका साधारण धर्म है। यह बात भी राजा सुक्रतुने कही थी ॥ ९ ॥

युधिष्ठिर उवाच

अथ केन प्रमाणेन पुंसामादीयते धनम् । पुत्रवद्धि पितुस्तस्य कन्या भवितुमर्हति ॥ १० ॥ **युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! पिताके लिये पुत्री भी तो पुत्रके ही समान होती है; फिर उसके रहते हुए किस प्रमाणसे केवल पुरुष ही धनके अधिकारी होते हैं? ॥ १० ॥

भीष्म उवाच

यथैवात्मा तथा पुत्रः पुत्रेण दुहिता समा । तस्यामात्मनि तिष्ठन्त्यां कथमन्यो धनं हरेत् ॥ ११ ॥ **भीष्मजीने कहा—**बेटा! पुत्र अपने आत्माके समान है और कन्या भी पुत्रके ही तुल्य है, अतः आत्मस्वरूप पुत्रके रहते हुए दूसरा कोई उसका धन कैसे ले सकता है? ॥ ११ ॥

मातुश्च यौतकं यत् स्यात् कुमारीभाग एव सः ।