भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 478, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 478

दौहित्र एव तद् रिक्थमपुत्रस्य पितुर्हरेत् ।। १२ ।। माताको दहेजमें जो धन मिलता है उसपर कन्याका ही अधिकार है; अतः जिसके कोई पुत्र नहीं है उसके धनको पानेका अधिकारी उसका दौहित्र (नाती) ही है। वही उस धनको ले सकता है ।। १२ ।।

ददाति हि स पिण्डान् वै पितुर्मातामहस्य च । पुत्रदौहित्रयोरेव विशेषो नास्ति धर्मतः ।। १३ ।। दौहित्र अपने पिता और नानाको भी पिण्ड देता है। धर्मकी दृष्टिसे पुत्र और दौहित्रमें कोई अन्तर नहीं है ।। १३ ।।

अन्यत्र जामया सार्धं प्रजानां पुत्र ईहते । दुहितान्यत्र जातेन पुत्रेणापि विशिष्यते ।। १४ ।। अन्यत्र अर्थात् यदि पहले कन्या उत्पन्न हुई और वह पुत्ररूपमें स्वीकार कर ली गयी तथा उसके बाद पुत्र भी पैदा हुआ तो वह पुत्र उस कन्याके साथ ही पिताके धनका अधिकारी होता है। यदि दूसरेका पुत्र गोद लिया गया हो तो उस दत्तक पुत्रकी अपेक्षा अपनी सगी बेटी ही श्रेष्ठ मानी जाती है (अतः वह पैतृक धनके अधिक भागकी अधिकारिणी है) ।। १४ ।।

दौहित्रकेण धर्मेण नाज पश्यामि कारणम् । विक्रीतासु हि ये पुत्रा भवन्ति पितुरेव ते ।। १५ ।। जो कन्याएँ मूल्य लेकर बेच दी गयी हों उनसे उत्पन्न होनेवाले पुत्र केवल अपने पिताके ही उत्तराधिकारी होते हैं। उन्हें दौहित्रक धर्मके अनुसार नानाके धनका अधिकारी बनानेके लिये कोई युक्तिसंगत कारण मैं नहीं देखता ।। १५ ।।

असूयवस्त्वधर्मिष्ठाः परस्वादायिनः शठाः । आसुरादधिसम्भूता धर्माद् विषमवृत्तयः ।। १६ ।। आसुर विवाहसे जिन पुत्रोंकी उत्पत्ति होती है, वे दूसरोंके दोष देखनेवाले, पापाचारी, पराया धन हड़पनेवाले, शठ तथा धर्मके विपरीत बर्ताव करनेवाले होते हैं ।। १६ ।।

अत्र गाथा यमोद्गीताः कीर्तयन्ति पुराविदः । धर्मज्ञा धर्मशास्त्रेषु निबद्धा धर्मसेतुषु ।। १७ ।। इस विषयमें प्राचीन बातोंको जाननेवाले तथा धर्मशास्त्रों और धर्ममर्यादाओंमें स्थित रहनेवाले धर्मज्ञ पुरुष यमकी गायी हुई गाथाका इस प्रकार वर्णन करते हैं— ।। १७ ।।

यो मनुष्यः स्वकं पुत्रं विक्रीय धनमिच्छति । कन्यां वा जीवितार्थाय यः शुल्केन प्रयच्छति ।। १८ ।। सप्तावरे महाघोरे निरये कालसाह्वये । स्वेदं मूत्रं पुरीषं च तस्मिन् मूढः समश्नुते ।। १९ ।।