महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 486, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिसहस्रपरो दायः स्त्रियै देयो धनस्य वै । भर्त्रा तच्च धनं दत्तं यथार्हं भोक्तुमर्हति ॥ २३ ॥ स्त्रीको तीन हजारसे अधिक लागतका धन नहीं देना चाहिये। पतिके देनेपर ही उस धनको वह यथोचित रूपसे उपभोगमें ला सकती है ॥ २३ ॥
स्त्रीणां तु पतिदायाद्यमुपभोगफलं स्मृतम् । नापहारं स्त्रियः कुर्युः पतिवित्तात् कथंचन ॥ २४ ॥ स्त्रियोंको पतिके धनसे जो हिस्सा मिलता है, उसका उपभोग ही (उसके लिये) फल माना गया है। पतिके दिये हुए स्त्रीधनसे पुत्र आदिको कुछ नहीं लेना चाहिये ॥ २४ ॥
स्त्रियास्तु यद् भवेत् वित्तं पित्रा दत्तं युधिष्ठिर । ब्राह्मण्यास्तद्धरेत् कन्या यथा पुत्रस्तथा हि सा ॥ २५ ॥ युधिष्ठिर! ब्राह्मणीको पिताकी ओरसे जो धन मिला हो, उस धनको उसकी पुत्री ले सकती है; क्योंकि जैसा पुत्र है, वैसी ही पुत्री भी है ॥ २५ ॥
सा हि पुत्रसमा राजन् विहिता कुरुनन्दन । एवमेव समुद्दिष्टो धर्मो वै भरतर्षभ । एवं धर्ममनुस्मृत्य न वृथा साधयेद् धनम् ॥ २६ ॥ कुरुनन्दन! भरतकुलभूषण नरेश! पुत्री पुत्रके समान ही है—ऐसा शास्त्रका विधान है। इस प्रकार वही धनके विभाजनकी धर्मयुक्त प्रणाली बतायी गयी है। इस तरह धर्मका चिन्तन एवं अनुस्मरण करते हुए ही धनका उपार्जन एवं संग्रह करे। परंतु उसे व्यर्थ न होने दे—यज्ञ-यागादिके द्वारा सफल कर ले ॥ २६ ॥
युधिष्ठिर उवाच
शूद्रायां ब्राह्मणाज्जातो यद्यदेयधनः स्मृतः । केन प्रतिविशेषेण दशमोऽप्यस्य दीयते ॥ २७ ॥ युधिष्ठिरने पूछा—दादाजी! यदि ब्राह्मणसे शूद्रामें उत्पन्न हुए पुत्रको धन न देने योग्य बताया गया है तो किस विशेषताके कारण उसको पैतृक धनका दसवाँ भाग भी दिया जाता है? ॥ २७ ॥
ब्राह्मण्यां ब्राह्मणाज्जातो ब्राह्मणः स्यान्न संशयः । क्षत्रियायां तथैव स्याद् वैश्यायामपि चैव हि ॥ २८ ॥ ब्राह्मणसे ब्राह्मणीमें उत्पन्न हुआ पुत्र ब्राह्मण हो—इसमें कोई संशय ही नहीं है; वैसे ही क्षत्रिया और वैश्याके गर्भसे उत्पन्न हुए पुत्र भी ब्राह्मण ही होते हैं ॥ २८ ॥
कस्मात् तु विषमं भागं भजेरन् नृपसत्तम । यदा सर्वे त्रयो वर्णास्त्वयोक्ता ब्राह्मणा इति ॥ २९ ॥