महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनृपश्रेष्ठ! जब आपने ब्राह्मण आदि तीनों वर्णोंवाली स्त्रियोंसे उत्पन्न हुए पुत्रोंको ब्राह्मण ही बताया है, तब वे पैतृक धनका समान भाग क्यों नहीं पाते हैं? क्यों वे विषम भाग ग्रहण करें? ।। २९ ।।
भीष्म उवाच
दारा इत्युच्यते लोके नाम्नैकेन परंतप ।
प्रोक्तेन चैव नाम्नायं विशेषः सुमहान् भवेत् ।। ३० ।।
भीष्मजीने कहा— शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! लोकमें सब स्त्रियोंका 'दारा' इस एक नामसे ही परिचय दिया जाता है। इस तथाकथित नामसे ही चारों वर्णोंकी स्त्रियोंसे उत्पन्न हुए पुत्रोंमें महान् अन्तर हो जाता है* ।। ३० ।।
तिस्रः कृत्वा पुरो भार्याः पश्चाद् विन्देत ब्राह्मणीम् ।
सा ज्येष्ठा सा च पूज्या स्यात् सा च भार्या गरीयसी ।। ३१ ।।
ब्राह्मण पहले अन्य तीनों वर्णोंकी स्त्रियोंको ब्याह लानेके पश्चात् भी यदि ब्राह्मणकन्यासे विवाह करे तो वही अन्य स्त्रियोंकी अपेक्षा ज्येष्ठ, अधिक आदर-सत्कारके योग्य तथा विशेष गौरवकी अधिकारिणी होगी ।।
स्नानं प्रसाधनं भर्तुर्दन्तधावनमञ्जनम् ।
हव्यं कव्यं च यच्चान्यद् धर्मयुक्तं गृहे भवेत् ।। ३२ ।।
न तस्यां जातु तिष्ठन्त्यामन्या तत् कर्तुमर्हति ।
ब्राह्मणी त्वेव कुर्याद् वा ब्राह्मणस्य युधिष्ठिर ।। ३३ ।।
युधिष्ठिर! पतिको स्नान कराना, उनके लिये शृंगार-सामग्री प्रस्तुत करना, दाँतकी सफाईके लिये दातौन और मंजन देना, पतिके नेत्रोंमें आँजन या सुरमा लगाना, प्रतिदिन हवन और पूजनके समय हव्य और कव्यकी सामग्री जुटाना तथा घरमें और भी जो धार्मिक कृत्य हो उसके सम्पादनमें योग देना—ये सब कार्य ब्राह्मणके लिये ब्राह्मणीको ही करने चाहिये। उसके रहते हुए दूसरे किसी वर्णवाली स्त्रीको यह सब करनेका अधिकार नहीं है ।। ३२-३३ ।।
अन्नं पानं च माल्यं च वासांस्याभरणानि च ।
ब्राह्मण्यैतानि देयानि भर्तुः सा हि गरीयसी ।। ३४ ।।
पतिको अन्न, पान, माला, वस्त्र और आभूषण—ये सब वस्तुएँ ब्राह्मणी ही समर्पित करे; क्योंकि वही उसके लिये सब स्त्रियोंसे अधिक गौरवकी अधिकारिणी है ।। ३४ ।।
मनुनाभिहितं शास्त्रं यच्चापि कुरुनन्दन ।
तत्राप्येष महाराज दृष्टो धर्मः सनातनः ।। ३५ ।।
महाराज कुरुनन्दन! मनुने भी जिस धर्मशास्त्रका प्रतिपादन किया है, उसमें भी यही सनातन धर्म देखा गया है ।। ३५ ।।