महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 488, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ चेदन्यथा कुर्याद् यदि कामाद् युधिष्ठिर । यथा ब्राह्मण चाण्डालः पूर्वदृष्टस्तथैव सः ॥ ३६ ॥ युधिष्ठिर! यदि ब्राह्मण कामके वशीभूत होकर इस शास्त्रीय पद्धतिके विपरीत बर्ताव करता है, वह ब्राह्मण चाण्डाल समझा जाता है जैसा कि पहले कहा गया है ॥ ३६ ॥
ब्राह्मण्याः सदृशः पुत्रः क्षत्रियायाश्च यो भवेत् । राजन् विशेषो यस्त्वत्र वर्णयोरुभयोरपि ॥ ३७ ॥ राजन्! ब्राह्मणके समान ही जो क्षत्रियाका पुत्र होगा, उसमें भी उभयवर्णसम्बन्धी अन्तर तो रहेगा ही ॥ ३७ ॥
न तु जात्या समा लोके ब्राह्मण्याः क्षत्रिया भवेत् । ब्राह्मण्याः प्रथमः पुत्रो भूयान् स्याद् राजसत्तम ॥ ३८ ॥ भूयो भूयोऽपि संहार्यः पितृवित्ताद् युधिष्ठिर । क्षत्रियकन्या संसारमें अपनी जातिद्वारा ब्राह्मण-कन्याके बराबर नहीं हो सकती। नृपश्रेष्ठ! इसी प्रकार ब्राह्मणीका पुत्र क्षत्रियाके पुत्रसे प्रथम एवं ज्येष्ठ होगा। युधिष्ठिर! इसलिये पिताके धनमेंसे ब्राह्मणीके पुत्रको अधिक-अधिक भाग देना चाहिये ॥ ३८ १/२ ॥
यथा न सदृशी जातु ब्राह्मण्याः क्षत्रिया भवेत् ॥ ३९ ॥ क्षत्रियायास्तथा वैश्या न जातु सदृशी भवेत् । जैसे क्षत्रिया कभी ब्राह्मणीके समान नहीं हो सकती वैसे ही वैश्या भी कभी क्षत्रियाके तुल्य नहीं हो सकती ॥ ३९ १/२ ॥
श्रीश्च राज्यं च कोशश्च क्षत्रियाणां युधिष्ठिर ॥ ४० ॥ विहितं दृश्यते राजन् सागरान्तां च मेदिनीम् । क्षत्रियो हि स्वधर्मेण श्रियं प्राप्नोति भूयसीम् । राजा दण्डधरो राजन् रक्षा नान्यत्र क्षत्रियात् ॥ ४१ ॥ राजा युधिष्ठिर! लक्ष्मी, राज्य और कोष—यह सब शास्त्रमें क्षत्रियोंके लिये ही विहित देखा जाता है। राजन्! क्षत्रिय अपने धर्मके अनुसार समुद्रपर्यन्त पृथ्वी तथा बहुत बड़ी सम्पत्ति प्राप्त कर लेता है। नरेश्वर! राजा (क्षत्रिय) दण्ड धारण करनेवाला होता है। क्षत्रियके सिवा और किसीसे रक्षाका कार्य नहीं हो सकता ॥ ४०-४१ ॥
ब्राह्मणा हि महाभागा देवानापि देवताः । तेषु राजन् प्रवर्तेत पूजया विधिपूर्वकम् ॥ ४२ ॥ राजन्! महाभाग! ब्राह्मण देवताओंके भी देवता हैं; अतः उनका विधिपूर्वक पूजन-आदर-सत्कार करते हुए ही उनके साथ बर्ताव करे ॥ ४२ ॥
प्रणीतमृषिभिर्ज्ञात्वा धर्मं शाश्वतमव्ययम् । लुप्यमानं स्वधर्मेण क्षत्रियो ह्येष रक्षति ॥ ४३ ॥