महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 541, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें‘ब्राह्मणत्वके प्रभावसे ही महर्षिने हम दोनोंको अपने वाहनोंकी भाँति रथमें जोत दिया था।’ इस तरह राजा सोच-विचार कर ही रहे थे कि महर्षि च्यवनको उनका आना ज्ञात हो गया ॥ ३१ ॥ सम्प्रेक्ष्योवाच नृपतिं क्षिप्रमागम्यतामिति । इत्युक्तः सहभार्यस्तु सोऽभ्यगच्छन्महामुनिम् ॥ ३२ ॥ शिरसा वन्दनीयं तमवन्दत च पार्थिवः । उन्होंने राजाकी ओर देखकर कहा—‘भूपाल! शीघ्र यहाँ आओ।’ उनके इस प्रकार आदेश देनेपर पत्नीसहित राजा उनके पास गये तथा उन वन्दनीय महामुनिको उन्होंने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया ॥ तस्याशिषः प्रयुज्याथ स मुनिस्तं नराधिपम् ॥ ३३ ॥ निषीदेत्यब्रवीद् धीमान् सान्त्वयन् पुरुषर्षभः । तब उन पुरुषप्रवर बुद्धिमान् मुनिने राजाको आशीर्वाद देकर सान्त्वना प्रदान करते हुए कहा—‘आओ बैठो’ ॥ ३३ १/२ ॥ ततः प्रकृतिमापन्नो भार्गवो नृपते नृपम् ॥ ३४ ॥ उवाच श्लक्ष्णया वाचा तर्पयन्निव भारत । भरतवंशी नरेश! तदनन्तर स्वस्थ होकर भृगुपुत्र च्यवन मुनि अपनी स्निग्ध मधुर वाणीद्वारा राजाको तृप्त करते हुए-से बोले— ॥ ३४ १/२ ॥ राजन् सम्यग् जितानीह पञ्च पञ्च स्वयं त्वया ॥ ३५ ॥ मनःषष्ठानीन्द्रियाणि कृच्छ्रान्मुक्तोऽसि तेन वै । ‘राजन्! तुमने पाँच ज्ञानेन्द्रियों, पाँच कर्मेन्द्रियों और छठे मनको अच्छी तरह जीत लिया है। इसीलिये तुम महान् संकटसे मुक्त हुए हो ॥ ३५ १/२ ॥ सम्यगाराधितः पुत्र त्वया प्रवदतां वर ॥ ३६ ॥ न हि ते वृजिनं किंचित् सुसूक्ष्ममपि विद्यते । ‘वक्ताओंमें श्रेष्ठ पुत्र! तुमने भलीभाँति मेरी आराधना की है। तुम्हारे द्वारा कोई छोटे-से-छोटा या सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अपराध भी नहीं हुआ है ॥ ३६ १/२ ॥ अनुजानीहि मां राजन् गमिष्यामि यथागतम् ॥ ३७ ॥ प्रीतोऽस्मि तव राजेन्द्र वरश्च प्रतिगृह्यताम् । ‘राजन्! अब मुझे विदा दो। मैं जैसे आया था, वैसे ही लौट जाऊँगा। राजेन्द्र! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ; अतः तुम कोई वर माँगो’ ॥ ३७ १/२ ॥