महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुशिक उवाच
अग्निमध्ये गतेनेव भगवन् संनिधौ मया ॥ ३८ ॥
वर्तितं भृगुशार्दूल यन्न दग्धोऽस्मि तद् बहु ।
एष एव वरो मुख्यः प्राप्तो मे भृगुनन्दन ॥ ३९ ॥
कुशिक बोले— भगवन्! भृगुश्रेष्ठ! मैं आपके निकट उसी प्रकार रहा हूँ, जैसे कोई प्रज्वलित अग्निके बीचमें खड़ा हो। उस अवस्थामें रहकर भी मैं जलकर भस्म नहीं हुआ, यही मेरे लिये बहुत बड़ी बात है। भृगुनन्दन! यही मैंने महान् वर प्राप्त कर लिया ।।
यत् प्रीतोऽसि मया ब्रह्मन् कुलं त्रातं च मेऽनघ ।
एष मेऽनुग्रहो विप्र जीविते च प्रयोजनम् ॥ ४० ॥
निष्पाप ब्रह्मर्षे! आप जो प्रसन्न हुए हैं तथा आपने जो मेरे कुलको नष्ट होनेसे बचा दिया, यही मुझपर आपका भारी अनुग्रह है। और इतनेसे ही मेरे जीवनका सारा प्रयोजन सफल हो गया ।। ४० ।।
एतद् राज्यफलं चैव तपसश्च फलं मम ।
यदि त्वं प्रीतिमान् विप्र मयि वै भृगुनन्दन ॥ ४१ ॥
अस्ति मे संशयः कश्चित् तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ४२ ॥