भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 55

हरिश्चन्द्रके उस यज्ञमें अपने तेजसे देवताओंको संतुष्ट करके विश्वामित्रने शुनःशेपको छुड़ाया था; इसलिये वह बुद्धिमान् विश्वामित्रके पुत्रभावको प्राप्त हो गया ।। ७ ।।
नाभिवादयते ज्येष्ठं देवरातं नराधिप ।
पुत्राः पञ्चाशदेवापि शप्ताः श्वपचतां गताः ।। ८ ।।
नरेश्वर! शुनःशेप देवताओंके देनेसे देवरात नामसे प्रसिद्ध हो विश्वामित्रका ज्येष्ठ पुत्र हुआ। उसके छोटे भाई—विश्वामित्रके अन्य पचास पुत्र उसे बड़ा मानकर प्रणाम नहीं करते थे; इसलिये विश्वामित्रके शापसे वे सब-के-सब चाण्डाल हो गये ।। ८ ।।
त्रिशङ्कुर्बन्धुभिर्मुक्त ऐक्ष्वाकः प्रीतिपूर्वकम् ।
अवाक्शिरा दिवं नीतो दक्षिणामाश्रितो दिशम् ।। ९ ।।
जिस इक्ष्वाकुवंशी त्रिशंकुको भाई-बन्धुओंने त्याग दिया था और जब वह स्वर्गसे भ्रष्ट होकर दक्षिण दिशामें नीचे सिर किये लटक रहा था, तब विश्वामित्रजीने ही उसे प्रेमपूर्वक स्वर्गलोकमें पहुँचाया था ।। ९ ।।
विश्वामित्रस्य विपुला नदी देवर्षिसेविता ।
कौशिकी च शिवा पुण्या ब्रह्मर्षिसुरसेविता ।। १० ।।
देवर्षियों, ब्रह्मर्षियों और देवताओंसे सेवित, पवित्र, मंगलकारिणी एवं विशाल कौशिकी नदी विश्वामित्रके ही प्रभावसे प्रकट हुई है ।। १० ।।
तपोविघ्नकरी चैव पञ्चचूडा सुसम्मता ।
रम्भा नामाप्सराः शापाद् यस्य शैलत्वमागता ।। ११ ।।
पाँच चोटीवाली लोकप्रिय रम्भा नामक अप्सरा विश्वामित्रजीकी तपस्यामें विघ्न डालने गयी थी, जो उनके शापसे पत्थर हो गयी ।। ११ ।।
तथैवास्य भयाद् बद्ध्वा वसिष्ठः सलिले पुरा ।
आत्मानं मज्जयन् श्रीमान् विपाशः पुनरुत्थितः ।। १२ ।।
तदाप्रभृति पुण्या हि विपाशाभून्महानदी ।
विख्याता कर्मणा तेन वसिष्ठस्य महात्मनः ।। १३ ।।
पूर्वकालमें विश्वामित्रके ही भयसे अपने शरीरको रस्सीसे बाँधकर श्रीमान् वसिष्ठजी अपने-आपको एक नदीके जलमें डुबो रहे थे; परंतु उस नदीके द्वारा पाशरहित (बन्धनमुक्त) हो पुनः ऊपर उठ आये। महात्मा वसिष्ठके उस महान् कर्मसे विख्यात हो वह पवित्र नदी उसी दिनसे 'विपाशा' कहलाने लगी ।। १२-१३ ।।
वाग्भिश्च भगवान् येन देवसेनाग्रगः प्रभुः ।
स्तुतः प्रीतमनाश्चासीच्छापाच्चैनममुञ्चत ।। १४ ।।
वाणीद्वारा स्तुति करनेपर उन विश्वामित्रपर सामर्थ्य शाली भगवान् इन्द्र प्रसन्न हो गये थे और उनको शापमुक्त कर दिया था ।। १४ ।।
ध्रुवस्यौत्तानपादस्य ब्रह्मर्षीणां तथैव च ।

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