महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमध्यं ज्वलति यो नित्यमुदीचीमाश्रितो दिशम् ।। १५ ।।
तस्यैतानि च कर्माणि तथान्यानि च कौरव ।
क्षत्रियस्येत्यतो जातमिदं कौतूहलं मम ।। १६ ।।
जो विश्वामित्र उत्तानपादके पुत्र ध्रुव तथा ब्रह्मर्षियों (सप्तर्षियों)-के बीचमें उत्तर दिशाके आकाशका आश्रय ले तारारूपसे सदा प्रकाशित होते रहते हैं, वे क्षत्रिय ही रहे हैं। कुरुनन्दन! उनके ये तथा और भी बहुत-से अद्भुत कर्म हैं, उन्हें याद करके मेरे हृदयमें यह जाननेका कौतूहल उत्पन्न हुआ है कि वे ब्राह्मण कैसे हो गये? ।। १५-१६ ।।
किमेतदिति तत्त्वेन प्रब्रूहि भरतर्षभ ।
देहान्तरमनासाद्य कथं स ब्राह्मणोऽभवत् ।। १७ ।।
भरतश्रेष्ठ! यह क्या बात है? इसे ठीक-ठीक बताइये। विश्वामित्रजी दूसरा शरीर धारण किये बिना ही कैसे ब्राह्मण हो गये? ।। १७ ।।
एतत् तत्त्वेन मे तात सर्वमाख्यातुमर्हसि ।
मतङ्गस्य यथातत्त्वं तथैवैतद् वदस्व मे ।। १८ ।।
तात! यह सब आप यथार्थरूपसे बतानेकी कृपा करें। जैसे मतङ्गको तपस्या करनेसे भी ब्राह्मणत्व नहीं प्राप्त हुआ, वैसी ही बात विश्वामित्रके लिये क्यों नहीं हुई? यह मुझे बताइये ।। १८ ।।
स्थाने मतङ्गो ब्राह्मण्यं नालभद् भरतर्षभ ।
चण्डालयोनौ जातो हि कथं ब्राह्मण्यमाप्तवान् ।। १९ ।।
भरतश्रेष्ठ! मतङ्गको जो ब्राह्मणत्व नहीं प्राप्त हुआ, वह उचित ही था; क्योंकि उसका जन्म चाण्डालकी योनिमें हुआ था; परंतु विश्वामित्रने कैसे ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया? ।। १९ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विश्वामित्रोपाख्याने
तृतीयोऽध्यायः ।। ३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विश्वामित्रका उपाख्यानविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ।। ३ ।।