भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 550, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 550

⬅ विषय-सूची (TOC)

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

च्यवन ऋषिका भृगुवंशी और कुशिकवंशियोंके सम्बन्धका कारण बताकर तीर्थयात्राके लिये प्रस्थान

च्यवन उवाच

अवश्यं कथनीयं मे तवैतन्नरपुंगव ।
यदर्थं त्वामहमुच्छेत्तुं सम्प्राप्तो मनुजाधिप ॥ १ ॥
**च्यवन कहते हैं—**नरपुंगव! मनुजेश्वर! मैं जिस उद्देश्यसे तुम्हारा मूलोच्छेद करनेके लिये यहाँ आया था, वह मुझे तुमसे अवश्य बता देना चाहिये ॥ १ ॥
भृगूणां क्षत्रिया याज्या नित्यमेतज्जनाधिप ।
ते च भेदं गमिष्यन्ति दैवयुक्तेन हेतुना ॥ २ ॥
क्षत्रियाश्च भृगून् सर्वान् वधिष्यन्ति नराधिप ।
आ गर्भादनुकृन्तन्तो दैवदण्डनिपीडिताः ॥ ३ ॥
जनेश्वर! क्षत्रियलोग सदासे ही भृगुवंशी ब्राह्मणोंके यजमान हैं; किंतु प्रारब्धवश आगे चलकर उनमें फूट हो जायगी। इसलिये वे दैवकी प्रेरणासे समस्त भृगुवंशियोंका संहार कर डालेंगे। नरेश्वर! वे दैवदण्डसे पीड़ित हो गर्भके बच्चेतकको काट डालेंगे ॥
तत उत्पत्स्यतेऽस्माकं कुले गोत्रविवर्धनः ।
ऊर्वो नाम महातेजा ज्वलनार्कसमद्युतिः ॥ ४ ॥
तदनन्तर मेरे वंशमें ऊर्व नामक एक महातेजस्वी बालक उत्पन्न होगा, जो भार्गव गोत्रकी वृद्धि करेगा। उसका तेज अग्नि और सूर्यके समान दुर्धर्ष होगा ॥ ४ ॥
स त्रैलोक्यविनाशाय कोपाग्निं जनयिष्यति ।
महीं सपर्वतवनां यः करिष्यति भस्मसात् ॥ ५ ॥
वह तीनों लोकोंका विनाश करनेके लिये क्रोधजनित अग्निकी सृष्टि करेगा। वह अग्नि पर्वतों और वनोंसहित सारी पृथ्वीको भस्म कर डालेगी ॥ ५ ॥
कंचित् कालं तु वह्निं च स एव शमयिष्यति ।
समुद्रे वडवावक्त्रे प्रक्षिप्य मुनिसत्तमः ॥ ६ ॥
कुछ कालके बाद मुनिश्रेष्ठ और्व ही उस अग्निको समुद्रमें स्थित हुई बड़वानलमें डालकर बुझा देंगे ॥ ६ ॥
पुत्रं तस्य महाराज ऋचीकं भृगुनन्दनम् ।
साक्षात् कृत्स्नो धनुर्वेदः समुपस्थास्यतेऽनघ ॥ ७ ॥