महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 555, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें‘राजन्! जो द्विज नित्य स्नान करके दोनों समय संध्योपासना और गायत्री-जप करता है वह चतुर होता है। मरुकी साधना-जलका परित्याग करनेवाले तथा निराहार रहनेवालेको स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है॥
स्थण्डिले शयमानानां गृहाणि शयनानि च।
चीरवल्कलवासोभिर्वासांस्याभरणानि च ॥ १५॥
‘मिट्टीकी वेदी या चबूतरोंपर सोनेवालोंको घर और शय्याएँ प्राप्त होती हैं। चीर और वल्कलके वस्त्र पहननेसे उत्तमोत्तम वस्त्र और आभूषण प्राप्त होते हैं॥ १५॥
शय्यासनानि यानानि योगयुक्ते तपोधने।
अग्निप्रवेशे नियतं ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६॥
‘योगयुक्त तपोधनको शय्या, आसन और वाहन प्राप्त होते हैं। नियमपूर्वक अग्निमें प्रवेश कर जानेपर जीवको ब्रह्मलोकमें सम्मान प्राप्त होता है॥ १६॥
रसानां प्रतिसंहारात् सौभाग्यमिह विन्दति।
आमिषप्रतिसंहारात् प्रजा ह्यायुष्मती भवेत् ॥ १७ ॥
‘रसोंका परित्याग करनेसे मनुष्य यहाँ सौभाग्यका भागी होता है। मांस-भक्षणका त्याग करनेसे दीर्घायु संतान उत्पन्न होती है॥ १७॥
उदवासं वसेद् यस्तु स नराधिपतिर्भवेत्।
सत्यवादी नरश्रेष्ठ देवतैः सह मोदते ॥ १८ ॥
‘जो जलमें निवास करता है वह राजा होता है। नरश्रेष्ठ! सत्यवादी मनुष्य स्वर्गमें देवताओंके साथ आनन्द भोगता है॥ १८॥
कीर्तिर्भवति दानेन तथाऽऽरोग्यमहिंसया।
द्विजशुश्रूषया राज्यं द्विजत्वं चापि पुष्कलम् ॥ १९ ॥
‘दानसे यश, अहिंसासे आरोग्य तथा ब्राह्मणोंकी सेवासे राज्य एवं अतिशय ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति होती है॥
पानीयस्य प्रदानेन कीर्तिर्भवति शाश्वती।
अन्नस्य तु प्रदानेन तृप्यन्ते कामभोगतः ॥ २० ॥
‘जल दान करनेसे मनुष्यको अक्षय कीर्ति प्राप्त होती है, तथा अन्न-दान करनेसे मनुष्यको काम और भोगसे पूर्णतः तृप्ति मिलती है॥ २०॥
सान्त्वदः सर्वभूतानां सर्वशोकैर्विमुच्यते।
देवशुश्रूषया राज्यं दिव्यं रूपं नियच्छति ॥ २१ ॥
‘जो समस्त प्राणियोंको सान्त्वना देता है, वह सम्पूर्ण शोकोंसे मुक्त हो जाता है। देवताओंकी सेवासे राज्य और दिव्य रूप प्राप्त होते हैं॥ २१॥
दीपालोकप्रदानेन चक्षुष्मान् भवते नरः।
प्रेक्षणीयप्रदानेन स्मृतिं मेधां च विन्दति ॥ २२ ॥