महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 556, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें'मन्दिरमें दीपकका प्रकाश दान करनेसे मनुष्यका नेत्र नीरोग होता है। दर्शनीय वस्तुओंका दान करनेसे मनुष्य स्मरणशक्ति और मेधा प्राप्त कर लेता है ॥ २२ ॥ गन्धमाल्यप्रदानेन कीर्तिर्भवति पुष्कला । केशश्मश्रु धारयतामग्रया भवति संततिः ॥ २३ ॥ 'गन्ध और पुष्प-माला दान करनेसे प्रचुर यशकी प्राप्ति होती है। सिरके बाल और दाढ़ी-मूँछ धारण करनेवालोंको श्रेष्ठ संतानकी प्राप्ति होती है ॥ २३ ॥ उपवासं च दीक्षां च अभिषेकं च पार्थिव । कृत्वा द्वादशवर्षाणि वीरस्थानाद् विशिष्यते ॥ २४ ॥ 'पृथ्वीनाथ! बारह वर्षोंतक सम्पूर्ण भोगोंका त्याग, दीक्षा (जप आदि नियमोंका ग्रहण) तथा तीनों समय स्नान करनेसे वीर पुरुषोंकी अपेक्षा भी श्रेष्ठ गति प्राप्ति होती है ॥ २४ ॥ दासीदासमलङ्कारान् क्षेत्राणि च गृहाणि च । ब्रह्मदेयां सुतां दत्त्वा प्राप्नोति मनुजर्षभ ॥ २५ ॥ 'नरश्रेष्ठ! जो अपनी पुत्रीका ब्राह्मविवाहकी विधिसे सुयोग्य वरको दान करता है, उसे दास-दासी, अलंकार, क्षेत्र और घर प्राप्त होते हैं ॥ २५ ॥ क्रतुभिश्चोपवासैश्च त्रिदिवं याति भारत । लभते च शिवं ज्ञानं फलपुष्पप्रदो नरः ॥ २६ ॥ 'भारत! यज्ञ और उपवास करनेसे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है तथा फल-फूलका दान करनेवाला मानव कल्याणमय मोक्षस्वरूप ज्ञान प्राप्त कर लेता है ॥ २६ ॥ सुवर्णशृङ्गैस्तु विराजितानां गवां सहस्रस्य नरः प्रदानात् । प्राप्नोति पुण्यं दिवि देवलोक- मित्येवमाहुर्दिवि देवसंघाः ॥ २७ ॥ 'सोनेसे मढ़े हुए सींगोंद्वारा सुशोभित होनेवाली एक हजार गौओंका दान करनेसे मनुष्य स्वर्गमें पुण्यमय देवलोकको प्राप्त होता है—ऐसा स्वर्गवासी देववृन्द कहते हैं ॥ २७ ॥ प्रयच्छते यः कपिलां सवत्सां कांस्योपदोहां कनकाग्रशृङ्गीम् । तैस्तैर्गुणैः कामदुहास्य भूत्वा नरं प्रदातारमुपैति सा गौः ॥ २८ ॥ 'जिसके सींगोंके अग्रभागमें सोना मढ़ा हुआ हो, ऐसी गायका काँसके बने हुए दुग्धपात्र और बछड़ेसमेत जो दान करता है, उस पुरुषके पास वह गौ उन्हीं गुणोंसे युक्त कामधेनु होकर आती है ॥ २८ ॥ यावन्ति रोमाणि भवन्ति धेन्वा-