भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 567, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 567

यद् यदिष्टतमं लोके यच्चास्य दयितं गृहे । तत् तद् गुणवते देयं तदेवाक्षयमिच्छता ॥ ७ ॥ संसारमें जो-जो पदार्थ अत्यन्त प्रिय माना जाता है तथा अपने घरमें भी जो प्रिय वस्तु मौजूद हो, वही-वही वस्तु गुणवान् पुरुषको देनी चाहिये। जो अपने दानको अक्षय बनाना चाहता हो, उसके लिये ऐसा करना आवश्यक है ॥ ७ ॥ प्रियाणि लभते नित्यं प्रियदः प्रियकृत् तथा । प्रियो भवति भूतानामिह चैव परत्र च ॥ ८ ॥ जो दूसरोंको प्रिय वस्तुका दान देता है और उनका प्रिय कार्य ही करता है, वह सदा प्रिय वस्तुओंको ही पाता है तथा इहलोक और परलोकमें भी वह समस्त प्राणियोंका प्रिय होता है ॥ ८ ॥ याचमानमभीमानादनासक्तमकिंचनम् । यो नार्चति यथाशक्ति स नृशंसो युधिष्ठिर ॥ ९ ॥ युधिष्ठिर! जो आसक्तिरहित अकिंचन याचकका अहंकारवश अपनी शक्तिके अनुसार सत्कार नहीं करता है, वह मनुष्य निर्दयी है ॥ ९ ॥ अमित्रमपि चेद् दीनं शरणैषिणमागतम् । व्यसने योऽनुगृह्णाति स वै पुरुषसत्तमः ॥ १० ॥ शत्रु भी यदि दीन होकर शरण पानेकी इच्छासे घरपर आ जाय तो संकटके समय जो उसपर दया करता है, वही मनुष्योंमें श्रेष्ठ है ॥ १० ॥ कृशाय कृतविद्याय वृत्तिक्षीणाय सीदते । अपहन्यात् क्षुधां यस्तु न तेन पुरुषः समः ॥ ११ ॥ विद्वान् होनेपर भी जिसकी आजीविका क्षीण हो गयी है तथा जो दीन, दुर्बल और दुखी है, ऐसे मनुष्यकी जो भूख मिटा देता है उस पुरुषके समान पुण्यात्मा कोई नहीं है ॥ ११ ॥ क्रियानियमितान् साधून् पुत्रदारैश्च कर्शितान् । अयाचमानान् कौन्तेय सर्वोपायैर्निमन्त्रयेत् ॥ १२ ॥ कुन्तीनन्दन! जो स्त्री-पुत्रोंके पालनमें असमर्थ होनेके कारण विशेष कष्ट उठाते हैं; परंतु किसीसे याचना नहीं करते और सदा सत्कर्मोंमें ही संलग्न रहते हैं, उन श्रेष्ठ पुरुषोंको प्रत्येक उपायसे सहायता देनेके लिये निमन्त्रित करना चाहिये ॥ १२ ॥ आशिषं ये न देवेषु न च मर्त्येषु कुर्वते । अर्हन्तो नित्यसंतुष्टास्तथा लब्धोपजीविनः ॥ १३ ॥ आशीविषसमेभ्यश्च तेभ्यो रक्षस्व भारत । तान् युक्तैरुपजिज्ञास्यस्तथा द्विजवरोत्तमान् ॥ १४ ॥ कृतैरावसथैर्नित्यं संप्रेष्यैः सपरिच्छदैः ।