महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
यद् यदिष्टतमं लोके यच्चास्य दयितं गृहे । तत् तद् गुणवते देयं तदेवाक्षयमिच्छता ॥ ७ ॥ संसारमें जो-जो पदार्थ अत्यन्त प्रिय माना जाता है तथा अपने घरमें भी जो प्रिय वस्तु मौजूद हो, वही-वही वस्तु गुणवान् पुरुषको देनी चाहिये। जो अपने दानको अक्षय बनाना चाहता हो, उसके लिये ऐसा करना आवश्यक है ॥ ७ ॥ प्रियाणि लभते नित्यं प्रियदः प्रियकृत् तथा । प्रियो भवति भूतानामिह चैव परत्र च ॥ ८ ॥ जो दूसरोंको प्रिय वस्तुका दान देता है और उनका प्रिय कार्य ही करता है, वह सदा प्रिय वस्तुओंको ही पाता है तथा इहलोक और परलोकमें भी वह समस्त प्राणियोंका प्रिय होता है ॥ ८ ॥ याचमानमभीमानादनासक्तमकिंचनम् । यो नार्चति यथाशक्ति स नृशंसो युधिष्ठिर ॥ ९ ॥ युधिष्ठिर! जो आसक्तिरहित अकिंचन याचकका अहंकारवश अपनी शक्तिके अनुसार सत्कार नहीं करता है, वह मनुष्य निर्दयी है ॥ ९ ॥ अमित्रमपि चेद् दीनं शरणैषिणमागतम् । व्यसने योऽनुगृह्णाति स वै पुरुषसत्तमः ॥ १० ॥ शत्रु भी यदि दीन होकर शरण पानेकी इच्छासे घरपर आ जाय तो संकटके समय जो उसपर दया करता है, वही मनुष्योंमें श्रेष्ठ है ॥ १० ॥ कृशाय कृतविद्याय वृत्तिक्षीणाय सीदते । अपहन्यात् क्षुधां यस्तु न तेन पुरुषः समः ॥ ११ ॥ विद्वान् होनेपर भी जिसकी आजीविका क्षीण हो गयी है तथा जो दीन, दुर्बल और दुखी है, ऐसे मनुष्यकी जो भूख मिटा देता है उस पुरुषके समान पुण्यात्मा कोई नहीं है ॥ ११ ॥ क्रियानियमितान् साधून् पुत्रदारैश्च कर्शितान् । अयाचमानान् कौन्तेय सर्वोपायैर्निमन्त्रयेत् ॥ १२ ॥ कुन्तीनन्दन! जो स्त्री-पुत्रोंके पालनमें असमर्थ होनेके कारण विशेष कष्ट उठाते हैं; परंतु किसीसे याचना नहीं करते और सदा सत्कर्मोंमें ही संलग्न रहते हैं, उन श्रेष्ठ पुरुषोंको प्रत्येक उपायसे सहायता देनेके लिये निमन्त्रित करना चाहिये ॥ १२ ॥ आशिषं ये न देवेषु न च मर्त्येषु कुर्वते । अर्हन्तो नित्यसंतुष्टास्तथा लब्धोपजीविनः ॥ १३ ॥ आशीविषसमेभ्यश्च तेभ्यो रक्षस्व भारत । तान् युक्तैरुपजिज्ञास्यस्तथा द्विजवरोत्तमान् ॥ १४ ॥ कृतैरावसथैर्नित्यं संप्रेष्यैः सपरिच्छदैः ।
निमन्त्रयेथाः कौरव्य सर्वकामसुखावहैः ॥ १५ ॥
युधिष्ठिर! जो देवताओं और मनुष्योंसे किसी वस्तुकी कामना नहीं करते, सदा संतुष्ट रहते और जो कुछ मिल जाय, उसीपर निर्वाह करते हैं, ऐसे पूज्य द्विजवरोंका दूतोंद्वारा पता लगाओ और उन्हें निमन्त्रित करो। भारत! वे दुखी होनेपर विषधर सर्पके समान भयंकर हो जाते हैं; अतः उनसे अपनी रक्षा करो। कुरुनन्दन! सेवकों और आवश्यक सामग्रियोंसे युक्त तथा सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति करानेके कारण सुखद गृह निवेदन करके उनका नित्यप्रति पूर्ण सत्कार करो ॥ १३—१५ ॥
यदि ते प्रतिगृह्णीयुः श्रद्धापूतं युधिष्ठिर ।
कार्यमित्येव मन्वाना धार्मिकाः पुण्यकर्मिणः ॥ १६ ॥
युधिष्ठिर! यदि तुम्हारा दान श्रद्धासे पवित्र और कर्तव्य-बुद्धिसे ही किया हुआ होगा तो पुण्यकर्मोंका अनुष्ठान करनेवाले वे धर्मात्मा पुरुष उसे उत्तम मानकर स्वीकार कर लेंगे ॥ १६ ॥
विद्यास्नाता व्रतस्नाता ये व्यपाश्रित्य जीविनः ।
गूढस्वाध्यायंतपसो ब्राह्मणाः संशितव्रताः ॥ १७ ॥
तेषु शुद्धेषु दान्तेषु स्वदारपरितोषिषु ।
यत् करिष्यसि कल्याणं तत् ते लोके युधाम्पते ॥ १८ ॥
युद्धविजयी युधिष्ठिर! विद्वान्, व्रतका पालन करनेवाले, किसी धनीका आश्रय लिये बिना ही जीवन निर्वाह करनेवाले, अपने स्वाध्याय और तपको गुप्त रखनेवाले तथा कठोर व्रतके पालनमें तत्पर जो ब्राह्मण हैं, जो शुद्ध, जितेन्द्रिय तथा अपनी ही स्त्रीसे संतुष्ट रहनेवाले हैं, उनके लिये तुम जो कुछ करोगे वह जगत्में तुम्हारे लिये कल्याणकारी होगा ॥ १७-१८ ॥
यथाग्निहोत्रं सुहुतं सायंप्रातर्द्विजातिना ।
तथा दत्तं द्विजातिभ्यो भवत्यथ यतात्मसु ॥ १९ ॥
द्विजके द्वारा सायं और प्रातःकाल विधिपूर्वक किया हुआ अग्निहोत्र जो फल प्रदान करता है, वही फल संयमी ब्राह्मणोंको दान देनेसे मिलता है ॥ १९ ॥
एष ते विततो यज्ञः श्रद्धापूतः सदक्षिणः ।
विशिष्टः सर्वयज्ञेभ्यो ददतस्तात वर्तताम् ॥ २० ॥
तात! तुम्हारे द्वारा किया जानेवाला विशाल दान-यज्ञ श्रद्धासे पवित्र एवं दक्षिणासे युक्त है। वह सब यज्ञोंसे बढ़कर है। तुझ दाताका वह यज्ञ सदा चालू रहे ॥ २० ॥
निवापदानसलिलस्तादृशेषु युधिष्ठिर ।
निवसन् पूजयंश्चैव तेष्वानृण्यं नियच्छति ॥ २१ ॥
युधिष्ठिर! पूर्वोक्त ब्राह्मणोंको पितरोंके लिये किये जानेवाले तर्पणकी भाँति दानरूपी जलसे तृप्त करके उन्हें निवास और आदर देते रहो। ऐसा करनेवाला पुरुष देवता आदिके
ऋणसे मुक्त हो जाता है ॥ २१ ॥ य एवं नैव कुप्यन्ते न लुभ्यन्ति तृणेष्वपि । त एव नः पूज्यतमा ये चापि प्रियवादिनः ॥ २२ ॥ जो ब्राह्मण कभी क्रोध नहीं करते, जिनके मनमें एक तिनके भरका लोभ नहीं होता तथा जो प्रिय वचन बोलनेवाले हैं, वे ही हमलोगोंके परम पूज्य हैं ॥ २२ ॥ एते न बहु मन्यन्ते न प्रवर्तन्ति चापरे । पुत्रवत् परिपाल्यास्ते नमस्तेभ्यस्तथाभयम् ॥ २३ ॥ उपर्युक्त ब्राह्मण निःस्पृह होनेके कारण दाताके प्रति विशेष आदर नहीं प्रकट करते। इनमेंसे तो कितने ही धनोपार्जनके कार्यमें तो प्रवृत्त ही नहीं होते हैं। ऐसे ब्राह्मणोंका पुत्रवत् पालन करना चाहिये। उन्हें बारंबार नमस्कार है। उनकी ओरसे हमें कोई भय न हो ॥ २३ ॥ ऋत्विक्पुरोहिताचार्या मृदुब्रह्मधरा हि ते । क्षात्रेणापि हि संसृष्टं तेजः शाम्यति वै द्विजे ॥ २४ ॥ ऋत्विक्, पुरोहित और आचार्य—ये प्रायः कोमल स्वभाववाले और वेदोंको धारण करनेवाले होते हैं। क्षत्रियका तेज ब्राह्मणके पास जाते ही शान्त हो जाता है ॥ २४ ॥ अस्ति मे बलवानस्मि राजास्मीति युधिष्ठिर । ब्राह्मणान् मा च पर्यश्रीर्वासोभिरशनेन च ॥ २५ ॥ युधिष्ठिर! 'मेरे पास धन है, मैं बलवान् हूँ और राजा हूँ' ऐसा समझते हुए तुम ब्राह्मणोंकी उपेक्षा करके स्वयं ही अन्न और वस्त्रका उपभोग न करना ॥ २५ ॥ यच्छोभार्थं बलार्थं वा वित्तमस्ति तवानघ । तेन ते ब्राह्मणाः पूज्याः स्वधर्ममनुतिष्ठता ॥ २६ ॥ अनघ! तुम्हारे पास शरीर और घरकी शोभा बढ़ाने अथवा बलकी वृद्धि करनेके लिये जो धन है, उनके द्वारा स्वधर्मका अनुष्ठान करते हुए तुम्हें ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये ॥ २६ ॥ नमस्कार्यास्तथा विप्रा वर्तमाना यथातथम् । यथासुखं यथोत्साहं ललन्तु त्वयि पुत्रवत् ॥ २७ ॥ इतना ही नहीं, तुम्हें उन ब्राह्मणोंको सदा नमस्कार करना चाहिये। वे अपनी रुचिके अनुसार जैसे चाहें रहें। तुम्हारे पास पुत्रकी भाँति उन्हें स्नेह प्राप्त होना चाहिये तथा वे सुख और उत्साहके साथ आनन्दपूर्वक रहें, ऐसी चेष्टा करनी चाहिये ॥ २७ ॥ को ह्यक्षयप्रसादानां सुहृदामल्पतोषिणाम् । वृत्तिमर्हत्यवक्षेप्तुं त्वदन्यः कुरुसत्तम ॥ २८ ॥ कुरुश्रेष्ठ! जिनकी कृपा अक्षय है, जो अकारण ही सबका हित करनेवाले और थोड़ेमें ही संतुष्ट रहनेवाले हैं, उन ब्राह्मणोंको तुम्हारे सिवा दूसरा कौन जीविका दे सकता
है ॥ २८ ॥ यथा पत्याश्रयो धर्मः स्त्रीणां लोके सनातनः । सदैव सा गतिर्नान्या तथास्माकं द्विजातयः ॥ २९ ॥ जैसे इस संसारमें स्त्रियोंका सनातन धर्म सदा पतिकी सेवापर ही अवलम्बित है, उसी प्रकार ब्राह्मण ही सदैव हमारे आश्रय हैं। हमलोगोंके लिये उनके सिवा दूसरा कोई सहारा नहीं है ॥ २९ ॥ यदि नो ब्राह्मणास्तात संत्यजेयुरपूजिताः । पश्यन्तो दारुणं कर्म सततं क्षत्रिये स्थितम् ॥ ३० ॥ अवेदानामयज्ञानामलोकानामवर्तिनाम् । कस्तेषां जीवितेनार्थस्त्वां विना ब्राह्मणाश्रयम् ॥ ३१ ॥ तात! यदि ब्राह्मण क्षत्रियोंके द्वारा सम्मानित न हों तथा क्षत्रियमें सदा रहनेवाले निष्ठुर कर्मको देखकर ब्राह्मण भी उनका परित्याग कर दें तो वे क्षत्रिय वेद, यज्ञ, उत्तम लोक और आजीविकासे भी भ्रष्ट हो जायँ। उस दशामें ब्राह्मणोंका आश्रय लेनेवाले तुम्हारे सिवा उन दूसरे क्षत्रियोंके जीवित रहनेका क्या प्रयोजन है? ॥ अत्र ते वर्तयिष्यामि यथा धर्मं सनातनम् । राजन्यो ब्राह्मणान् राजन् पुरा परिचचार ह ॥ ३२ ॥ वैश्यो राजन्यमित्येव शूद्रो वैश्यमिति श्रुतिः । राजन्! अब मैं तुम्हें सनातन कालका धार्मिक व्यवहार कैसा है, यह बताऊँगा। हमने सुना है पूर्वकालमें क्षत्रिय ब्राह्मणोंकी, वैश्य क्षत्रियोंकी और शूद्र वैश्योंकी सेवा किया करते थे ॥ ३२ १/२ ॥ दूराच्छूद्रेणोपचर्यो ब्राह्मणोऽग्निरिव ज्वलन् ॥ ३३ ॥ संस्पर्शपरिचर्यस्तु वैश्येन क्षत्रियेण च । ब्राह्मण अग्निके समान तेजस्वी हैं; अतः शूद्रको दूरसे ही उनकी सेवा करनी चाहिये। उनके शरीरके स्पर्शपूर्वक सेवा करनेका अधिकार केवल क्षत्रिय और वैश्यको ही है ॥ ३३ १/२ ॥ मृदुभावान् सत्यशीलान् सत्यधर्मानुपालकान् ॥ ३४ ॥ आशीविषानिव क्रुद्धांस्तानूपाचरत द्विजान् । ब्राह्मण स्वभावतः कोमल, सत्यवादी और सत्य-धर्मका पालन करनेवाले होते हैं, परंतु जब वे कुपित होते हैं तब विषैले सर्पके समान भयंकर हो जाते हैं। अतः तुम सदा ब्राह्मणोंकी सेवा करते रहो ॥ ३४ १/२ ॥ अपरेषां परेषां च परेभ्यश्चापि ये परे ॥ ३५ ॥ क्षत्रियाणां प्रतपतां तेजसा च बलेन च । ब्राह्मणेष्वेव शाम्यन्ति तेजांसि च तपांसि च ॥ ३६ ॥
छोटे-बड़े और बड़ोंसे भी बड़े जो क्षत्रिय तेज और बलसे तप रहे हैं, उन सबके तेज और तप ब्राह्मणोंके पास जाते ही शान्त हो जाते हैं ।। ३५-३६ ।। न मे पिता प्रियतरो न त्वं तात तथा प्रियः । न मे पितुः पिता राजन् न चात्मा न च जीवितम् ।। ३७ ।। तात! मुझे ब्राह्मण जितने प्रिय हैं, उतने मेरे पिता, तुम, पितामह, यह शरीर और जीवन भी प्रिय नहीं हैं ।। त्वत्तश्च मे प्रियतरः पृथिव्यां नास्ति कश्चन । त्वत्तोऽपि मे प्रियतरा ब्राह्मणा भरतर्षभ ।। ३८ ।। भरतश्रेष्ठ! इस पृथ्वीपर तुमसे अधिक प्रिय मेरे लिये दूसरा कोई नहीं है; परंतु ब्राह्मण तुमसे भी बढ़कर प्रिय हैं ।। ३८ ।। ब्रवीमि सत्यमेतच्च यथाहं पाण्डुनन्दन । तेन सत्येन गच्छेयं लोकान् यत्र च शान्तनुः ।। ३९ ।। पाण्डुनन्दन! मैं यह सच्ची बात कह रहा हूँ और चाहता हूँ कि इस सत्यके प्रभावसे मैं उन्हीं लोकोंमें जाऊँ जहाँ मेरे पिता शान्तनु गये हैं ।। ३९ ।। पश्येयं च सतां लोकान् शुचीन् ब्रह्मपुरस्कृतान् । तत्र मे तात गन्तव्यमह्नाय च चिराय च ।। ४० ।। इस सत्यके प्रभावसे ही मैं सत्पुरुषोंके उन पवित्र लोकोंका दर्शन कर रहा हूँ जहाँ ब्राह्मणों और ब्रह्माजीकी प्रधानता है। तात! मुझे शीघ्र ही चिरकालके लिये उन लोकोंमें जाना है ।। ४० ।। सोऽहमेतादृशाँल्लोकान् दृष्ट्वा भरतसत्तम । यन्मे कृतं ब्राह्मणेषु न तप्ये तेन पार्थिव ।। ४१ ।। भरतश्रेष्ठ! पृथ्वीनाथ! ब्राह्मणोंके लिये मैंने जो कुछ किया है, उसके फलस्वरूप ऐसे पुण्यलोकोंका दर्शन करके मुझे संतोष हो गया है। अब मैं इस बातके लिये संतप्त नहीं हूँ कि दूसरा कोई पुण्य क्यों नहीं किया? ।। ४१ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि एकोनषष्टितमोऽध्यायः ।। ५९ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५९ ।।
श्रेष्ठ अयाचक, धर्मात्मा, निर्धन एवं गुणवान्को दान देनेका विशेष फल
षष्टितमोऽध्यायः
श्रेष्ठ अयाचक, धर्मात्मा, निर्धन एवं गुणवान्को दान देनेका विशेष फल
युधिष्ठिर उवाच
यौ च स्यातां चरणेनोपपन्नौ
यौ विद्यया सदृशौ जन्मना च ।
ताभ्यां दानं कतमस्मै विशिष्ट-
मयाचमानाय च याचते च ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! उत्तम आचरण, विद्या और कुलमें एक समान प्रतीत होनेवाले दो ब्राह्मणोंमेंसे यदि एक याचक हो और दूसरा अयाचक तो किसको दान देनेसे उत्तम फलकी प्राप्ति होती है? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
श्रेयो वै याचतः पार्थ दानमाहुरयाचते ।
अर्हत्तमो वै धृतिमान् कृपणादधृतात्मनः ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! याचना करनेवालेकी अपेक्षा याचना न करनेवालेको दिया हुआ दान ही श्रेष्ठ एवं कल्याणकारी बताया गया है तथा अधीर हृदयवाले कृपण मनुष्यकी अपेक्षा धैर्य धारण करनेवाला ही विशेष सम्मानका पात्र है ॥ २ ॥
क्षत्रियो रक्षणधृतिर्ब्राह्मणोऽनर्थनाधृतिः ।
ब्राह्मणो धृतिमान् विद्वान् देवान् प्रीणाति तुष्टिमान् ॥ ३ ॥
रक्षाके कार्यमें धैर्य धारण करनेवाला क्षत्रिय और याचना न करनेमें दृढ़ता रखनेवाला ब्राह्मण श्रेष्ठ है। जो ब्राह्मण धीर, विद्वान् और संतोषी होता है, वह देवताओंको अपने व्यवहारसे संतुष्ट करता है ॥ ३ ॥
याच्यमाहुरनीशस्य अभिहारं च भारत ।
उद्वेजयन्ति याचन्ति सदा भूतानि दस्युवत् ॥ ४ ॥
भारत! दरिद्रकी याचना उसके लिये तिरस्कारका कारण मानी गयी है; क्योंकि याचक प्राणी लुटेरोंकी भाँति सदा लोगोंको उद्विग्न करते रहते हैं ॥ ४ ॥
म्रियते याचमानो वै न जातु म्रियते ददत् ।
ददत् संजीवयत्येनमात्मानं च युधिष्ठिर ॥ ५ ॥
याचक मर जाता है, किंतु दाता कभी नहीं मरता। युधिष्ठिर! दाता इस याचकको और अपनेको भी जीवित रखता है ॥ ५ ॥
आनृशंस्यं परो धर्मो याचते यत् प्रदीयते । अयाचतः सीदमानान् सर्वोपायैर्निमन्त्रयेत् ॥ ६ ॥ याचकको जो दान दिया जाता है, वह दयारूप परम धर्म है, परंतु जो लोग क्लेश उठाकर भी याचना नहीं करते, उन ब्राह्मणोंको प्रत्येक उपायसे अपने पास बुलाकर दान देना चाहिये ॥ ६ ॥
यदि वै तादृशा राष्ट्रान् वसेयुस्ते द्विजोत्तमाः । भस्मच्छन्नानिवाग्नींस्तान् बुध्येथास्त्वं प्रयत्नतः ॥ ७ ॥ यदि तुम्हारे राज्यके भीतर वैसे श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते हों तो वे राखमें छिपी हुई आगके समान हैं। तुम्हें प्रयत्नपूर्वक ऐसे ब्राह्मणोंका पता लगाना चाहिये ॥ ७ ॥
तपसा दीप्यमानास्ते दहेयुः पृथिवीमपि । अपूज्यमानाः कौरव्य पूजार्हास्तु तथाविधाः ॥ ८ ॥ कुरुनन्दन! तपस्यासे देदीप्यमान होनेवाले वे ब्राह्मण पूजित न होनेपर यदि चाहें तो सारी पृथ्वीको भी भस्म कर सकते हैं; अतः वैसे ब्राह्मण सदा ही पूजा करनेके योग्य हैं ॥ ८ ॥
पूज्या हि ज्ञानविज्ञानतपोयोगसमन्विताः । तेभ्य पूजां प्रयुञ्जीथा ब्राह्मणेभ्यः परंतप ॥ ९ ॥ परंतप! जो ब्राह्मण ज्ञान-विज्ञान, तपस्या और योगसे युक्त हैं, वे पूजनीय होते हैं। उन ब्राह्मणोंकी तुम्हें सदा पूजा करनी चाहिये ॥ ९ ॥
ददद् बहुविधान् दायानुपागच्छन्नयाचताम् । यदग्निहोत्रे सुहुते सायंप्रातर्भवेत् फलम् ॥ १० ॥ विद्यावेदव्रतवति तद्दानफलमुच्यते । जो याचना नहीं करते, उनके पास तुम्हें स्वयं जाकर नाना प्रकारके पदार्थ देने चाहिये। सायं और प्रातःकाल विधिपूर्वक अग्निहोत्र करनेसे जो फल मिलता है, वही वेदके विद्वान् और व्रतधारी ब्राह्मणको दान देनेसे भी मिलता है ॥ १० १/२ ॥
विद्यावेदव्रतस्नातानव्यपाश्रयजीविनः ॥ ११ ॥ गूढस्वाध्यायतपसो ब्राह्मणान् संशितव्रतान् । कृतैरावसथैर्हृद्यैः सप्रेष्यैः सपरिच्छदैः ॥ १२ ॥ निमन्त्रयेथाः कौरव्य कामैश्चान्यैर्द्विजोत्तमान् । कुरुनन्दन! जो विद्या और वेदव्रतमें निष्णात हैं, जो किसीके आश्रित होकर जीविका नहीं चलाते, जिनका स्वाध्याय और तपस्या गुप्त है तथा जो कठोर व्रतका पालन करनेवाले हैं, ऐसे उत्तम ब्राह्मणोंको तुम अपने यहाँ निमन्त्रित करो और उन्हें सेवक, आवश्यक सामग्री तथा अन्यान्य उपभोगकी वस्तुओंसे सम्पन्न मनोरम गृह बनवाकर दो ॥ ११-१२ १/२ ॥
अपि ते प्रतिगृह्णीयुः श्रद्धोपेतं युधिष्ठिर ॥ १३ ॥ कार्यमित्येव मन्वाना धर्मज्ञाः सूक्ष्मदर्शिनः । युधिष्ठिर! वे धर्मज्ञ तथा सूक्ष्मदर्शी ब्राह्मण तुम्हारे श्रद्धायुक्त दानको कर्तव्यबुद्धिसे किया हुआ मानकर अवश्य स्वीकार करेंगे ॥ १३ १/२ ॥
अपि ते ब्राह्मणा भुक्त्वा गताः सोद्धरणान् गृहान् ॥ १४ ॥ येषां दाराः प्रतीक्षन्ते पर्जन्यमिव कर्षकाः । जैसे किसान वर्षाकी बाट जोहते रहते हैं, उसी प्रकार जिनके घरकी स्त्रियाँ अन्नकी प्रतीक्षामें बैठी हों और बालकोंको यह कहकर बहला रही हों कि 'अब तुम्हारे बाबूजी भोजन लेकर आते ही होंगे'; क्या ऐसे ब्राह्मण तुम्हारे यहाँ भोजन करके अपने घरोंको गये हैं? ॥ १४ १/२ ॥
अन्नानि प्रातःसवने नियता ब्रह्मचारिणः ॥ १५ ॥ ब्राह्मणास्तात भुञ्जानास्त्रेताग्निं प्रीणयन्त्युत । तात! नियमपूर्वक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण यदि प्रातःकाल घरमें भोजन करते हैं तो तीनों अग्नियोंको तृप्त कर देते हैं ॥ १५ १/२ ॥
माध्यन्दिनं ते सवनं ददतस्तात वर्तताम् ॥ १६ ॥ गोहिरण्यानि वासांसि तेनेन्द्रः प्रीयतां तव । बेटा! दोपहरके समय जो तुम ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें गौ, सुवर्ण और वस्त्र प्रदान करते हो, इससे तुम्हारे ऊपर इन्द्रदेव प्रसन्न हों ॥ १६ १/२ ॥
तृतीयं सवनं ते वै वैश्वदेवं युधिष्ठिर ॥ १७ ॥ यद् देवेभ्यः पितृभ्यश्च विप्रेभ्यश्च प्रयच्छसि । युधिष्ठिर! तीसरे समयमें जो तुम देवताओं, पितरों और ब्राह्मणोंके उद्देश्यसे दान करते हो, वह विश्वेदेवोंको संतुष्ट करनेवाला होता है ॥ १७ १/२ ॥
अहिंसा सर्वभूतेभ्यः संविभागश्च भागशः ॥ १८ ॥ दमस्त्यागो धृतिः सत्यं भवत्यवभृथाय ते । सब प्राणियोंके प्रति अहिंसाका भाव रखना, सबको यथायोग्य भाग अर्पण करना, इन्द्रियसंयम, त्याग, धैर्य और सत्य—ये सब गुण तुम्हें यज्ञान्तमें किये जानेवाले अवभृथ-स्नानका फल देंगे ॥ १८ १/२ ॥
एष ते विततो यज्ञः श्रद्धापूतः सदक्षिणः ॥ १९ ॥ विशिष्टः सर्वयज्ञानां नित्यं तात प्रवर्तताम् ॥ २० ॥ इस प्रकार जो तुम्हारे श्रद्धासे पवित्र एवं दक्षिणायुक्त यज्ञका विस्तार हो रहा है; यह सभी यज्ञोंसे बढ़कर है। तात युधिष्ठिर! तुम्हारा यह यज्ञ सदा चालू रहना चाहिये ॥ १९-२० ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें साठवाँ अध्याय पूरा
हुआ ॥ ६० ॥
अध्याय (पृष्ठ 576)
एकषष्टितमोऽध्यायः
राजाके लिये यज्ञ, दान और ब्राह्मण आदि प्रजाकी रक्षाका उपदेश
युधिष्ठिर उवाच
दानं यज्ञः क्रिया चेह किंस्वित् प्रेत्य महाफलम् ।
कस्य ज्यायः फलं प्रोक्तं कीदृशेभ्यः कथं कदा ॥ १ ॥
एतदिच्छामि विज्ञातुं याथातथ्येन भारत ।
विद्वन् जिज्ञासमानाय दानधर्मान् प्रचक्ष्व मे ॥ २ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**भारत! दान और यज्ञकर्म—इन दोनोंमेंसे कौन मृत्युके पश्चात् महान् फल देनेवाला होता है? किसका फल श्रेष्ठ बताया गया है? कैसे ब्राह्मणोंको कब दान देना चाहिये और किस प्रकार कब यज्ञ करना चाहिये? मैं इस बातको यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ। विद्वन्! आप मुझ जिज्ञासुको दानसम्बन्धी धर्म विस्तारपूर्वक बताइये ॥ १-२ ॥
अन्तर्वेद्यां च यद् दत्तं श्रद्धया चानृशंस्यतः ।
किंस्विन्नैःश्रेयसं तात तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ३ ॥
तात पितामह! जो दान वेदीके भीतर श्रद्धापूर्वक दिया जाता है और जो वेदीके बाहर दयाभावसे प्रेरित होकर दिया जाता है; इन दोनोंमें कौन विशेष कल्याणकारी होता है? ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
रौद्रं कर्म क्षत्रियस्य सततं तात वर्तते ।
तस्य वैतानिकं कर्म दानं चैवेह पावनम् ॥ ४ ॥
**भीष्मजीने कहा—**बेटा! क्षत्रियको सदा कठोर कर्म करने पड़ते हैं, अतः यहाँ यज्ञ और दान ही उसे पवित्र करनेवाले कर्म हैं ॥ ४ ॥
न तु पापकृतां राज्ञां प्रतिगृह्णन्ति साधवः ।
एतस्मात् कारणाद् यज्ञैर्यजेद् राजाऽऽप्तदक्षिणैः ॥ ५ ॥
श्रेष्ठ पुरुष पाप करनेवाले राजाका दान नहीं लेते हैं; इसलिये राजाको पर्याप्त दक्षिणा देकर यज्ञोंका अनुष्ठान करना चाहिये ॥ ५ ॥
अथ चेत् प्रतिगृह्णीयुर्दद्यादहरहर्नृपः ।
श्रद्धामास्थाय परमां पावनं ह्येतदुत्तमम् ॥ ६ ॥
श्रेष्ठ पुरुष यदि दान स्वीकार करें तो राजाको उन्हें प्रतिदिन बड़ी श्रद्धाके साथ दान देना चाहिये; क्योंकि श्रद्धापूर्वक दिया हुआ दान आत्मशुद्धिका सर्वोत्तम साधन है ॥ ६ ॥
ब्राह्मणांस्तर्पयन् द्रव्यैस्ततो यज्ञे यतव्रतः । मैत्रान् साधून् वेदविदः शीलवृत्ततपोर्जितान् ॥ ७ ॥ तुम नियमपूर्वक यज्ञमें सुशील, सदाचारी, तपस्वी, वेदवेत्ता, सबसे मैत्री रखनेवाले तथा साधु स्वभाववाले ब्राह्मणोंको धन देकर संतुष्ट करो ॥ ७ ॥
यत् ते ते न करिष्यन्ति कृतं ते न भविष्यति । यज्ञान् साधय साधुभ्यः स्वाद्वन्नान् दक्षिणावतः ॥ ८ ॥ यदि वे तुम्हारा दान स्वीकार नहीं करेंगे तो तुम्हें पुण्य नहीं होगा; अतः श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये स्वादिष्ट अन्न और दक्षिणासे युक्त यज्ञोंका अनुष्ठान करो ॥ ८ ॥
इष्टं दत्तं च मन्येथा आत्मानं दानकर्मणा । पूजयेथा यायजूकांस्तवाप्यंशो भवेद् यथा ॥ ९ ॥ याज्ञिक पुरुषोंको दान करके ही तुम अपनेको यज्ञ और दानके पुण्यका भागी समझ लो। यज्ञ करनेवाले ब्राह्मणोंका सदा सम्मान करो। इससे तुम्हें भी यज्ञका आंशिक फल प्राप्त होगा ॥ ९ ॥
(विद्वद्भ्यः सम्प्रदानेन तत्राप्यंशोऽस्य पूजया । यज्वभ्यश्चाथ विद्वद्भ्यो दत्त्वा लोकं प्रदापयेत् ॥ प्रदद्याज्ज्ञानदातॄणां ज्ञानदानांशभाग् भवेत् ।) विद्वानोंको दान देनेसे, उनकी पूजा करनेसे दाता और पूजकको यज्ञका आंशिक फल प्राप्त होता है। यज्ञकर्ताओं तथा ज्ञानी पुरुषोंको दान देनेसे वह दान उत्तम लोककी प्राप्ति कराता है। जो दूसरोंको ज्ञानदान करते हैं, उन्हें भी अन्न और धनका दान करे। इससे दाता उनके ज्ञानदानके आंशिक पुण्यका भागी होता है ।।
प्रजावतो भरेथाश्च ब्राह्मणान् बहुकारिणः । प्रजावांस्तेन भवति यथा जनयिता तथा ॥ १० ॥ जो बहुतोंका उपकार करनेवाले और बाल-बच्चेवाले ब्राह्मणोंका पालन-पोषण करता है वह उस शुभ कर्मके प्रभावसे प्रजापतिके समान संतानवान् होता है ॥ १० ॥
यावतः साधुधर्मान् वै सन्तः संवर्धयन्त्युत । सर्वस्वैश्चापि भर्तव्या नरा ये बहुकारिणः ॥ ११ ॥ जो संत पुरुष सदा समस्त सद्धर्मोंका प्रचार और विस्तार करते रहते हैं, अपना सर्वस्व देकर भी उनका भरण-पोषण करना चाहिये; क्योंकि वे राजाके अत्यन्त उपकारी होते हैं ॥ ११ ॥
समृद्धः सम्प्रयच्छ त्वं ब्राह्मणेभ्यो युधिष्ठिर । धेनूरनडुहोऽन्नानि छत्रं वासांस्युपानहौ ॥ १२ ॥ युधिष्ठिर! तुम समृद्धिशाली हो, इसलिये ब्राह्मणोंको गाय, बैल, अन्न, छाता, जूता और वस्त्र दान करते रहो ॥ १२ ॥
आज्यानि यजमानेभ्यस्तथान्नानि च भारत । अश्ववन्ति च यानानि वेश्मानि शयनानि च ॥ १३ ॥ एते देया व्युष्टिमन्तो लघूपायाश्च भारत । भारत! जो ब्राह्मण यज्ञ करते हों, उन्हें घी, अन्न, घोड़े जुते हुए रथ आदिकी सवारियाँ, घर और शय्या आदि वस्तुएँ देनी चाहिये। भरतनन्दन! राजाके लिये ये दान सरलतासे होनेवाले और समृद्धिको बढ़ानेवाले हैं ॥ १३ १/२ ॥
अजुगुप्सांश्च विज्ञाय ब्राह्मणान् वृत्तिकर्शितान् ॥ १४ ॥ उपच्छन्नं प्रकाशं वा वृत्त्या तान् प्रतिपालयेत् । जिन ब्राह्मणोंका आचरण निन्दित न हो, वे यदि जीविकाके बिना कष्ट पा रहे हों तो उनका पता लगाकर गुप्त या प्रकट रूपमें जीविकाका प्रबन्ध करके सदा उनका पालन करते रहना चाहिये ॥ १४ १/२ ॥
राजसूयाश्वमेधाभ्यां श्रेयस्तत् क्षत्रियान् प्रति ॥ १५ ॥ एवं पापैर्विनिर्मुक्तस्त्वं पूतः स्वर्गमाप्स्यसि । क्षत्रियोंके लिये वह कार्य राजसूय और अश्वमेध यज्ञोंसे भी अधिक कल्याणकारी है। ऐसा करनेसे तुम सब पापोंसे मुक्त एवं पवित्र होकर स्वर्गलोकमें जाओगे ॥
संचयित्वा पुनः कोशं यद् राष्ट्रं पालयिष्यसि ॥ १६ ॥ तेन त्वं ब्रह्मभूयत्वमवाप्स्यसि धनानि च । कोशका संग्रह करके यदि तुम उसके द्वारा राष्ट्रकी रक्षा करोगे तो तुम्हें दूसरे जन्मोंमें धन और ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति होगी ॥ १६ १/२ ॥
आत्मनश्च परेषां च वृत्तिं संरक्ष भारत ॥ १७ ॥ पुत्रवच्चापि भृत्यान् स्वान् प्रजाश्च परिपालय । भरतनन्दन! तुम अपनी और दूसरोंकी भी जीविकाकी रक्षा करो तथा अपने सेवकों और प्रजाजनोंका पुत्रकी भाँति पालन करो ॥ १७ १/२ ॥
योगः क्षेमश्च ते नित्यं ब्राह्मणेष्वस्तु भारत ॥ १८ ॥ तदर्थं जीवितं तेऽस्तु मा तेभ्योऽप्रतिपालनम् । भारत! ब्राह्मणोंके पास जो वस्तु न हो, उसे उनको देना और जो हो उसकी रक्षा करना भी तुम्हारा नित्य कर्तव्य है। तुम्हारा जीवन उन्हींकी सेवामें लग जाना चाहिये। उनकी रक्षासे तुम्हें कभी मुँह नहीं मोड़ना चाहिये ॥ १८ १/२ ॥
अनर्थो ब्राह्मणस्यैष यद् वित्तनिचयो महान् ॥ १९ ॥ श्रिया ह्यभीक्ष्णं संवासो दर्पयेत् सम्प्रमोहयेत् । ब्राह्मणोंके पास यदि बहुत धन इकट्ठा हो जाय तो यह उनके लिये अनर्थका ही कारण होता है; क्योंकि लक्ष्मीका निरन्तर सहवास उन्हें दर्प और मोहमें डाल देता है ॥ १९ १/२ ॥
ब्राह्मणेषु प्रमूढेषु धर्मो विप्रणशेद् ध्रुवम् । धर्मप्रणाशे भूतानामभावः स्यान्न संशयः ॥ २० ॥ ब्राह्मण जब मोहग्रस्त होते हैं, तब निश्चय ही धर्मका नाश हो जाता है और धर्मका नाश होनेपर प्राणियोंका भी विनाश हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ २० ॥
यो रक्षिभ्यः सम्प्रदाय राजा राष्ट्रं विलुम्पति । यज्ञे राष्ट्राद् धनं तस्मादानयध्वमिति ब्रुवन् ॥ २१ ॥ यच्चादाय तदाज्ञप्तं भीतं दत्तं सुदारुणम् । यजेद् राजा न तं यज्ञं प्रशंसन्त्यस्य साधवः ॥ २२ ॥ जो राजा प्रजासे करके रूपमें प्राप्त हुए धनको कोषकी रक्षा करनेवाले कोषाध्यक्ष आदिको देकर खजानेमें रखवा लेता है और अपने कर्मचारियोंको यह आज्ञा देता है कि 'तुम लोग यज्ञके लिये राज्यसे धन वसूलकर ले आओ', इस प्रकार यज्ञके नामपर जो राज्यकी प्रजाको लूटता है तथा उसकी आज्ञाके अनुसार लोगोंको डरा-धमकाकर निष्ठुरतापूर्वक लाये हुए धनको लेकर जो उसके द्वारा यज्ञका अनुष्ठान करता है, उस राजाके ऐसे यज्ञकी श्रेष्ठ पुरुष प्रशंसा नहीं करते हैं ॥ २१-२२ ॥
अपीडिताः सुसंवृद्धा ये ददत्यनुकूलतः । तादृशेनाप्युपायेन यष्टव्यं नोद्यमाहृतैः ॥ २३ ॥ इसलिये जो लोग बहुत धनी हों और बिना पीड़ा दिये ही अनुकूलतापूर्वक धन दे सकें, उनके दिये हुए अथवा वैसे ही मृदु उपायसे प्राप्त हुए धनके द्वारा यज्ञ करना चाहिये; प्रजापीड़नरूप कठोर प्रयत्नसे लाये हुए धनके द्वारा नहीं ॥ २३ ॥
यदा परिनिषिच्येत निहितो वै यथाविधि । तदा राजा महायज्ञैर्यजेत बहुदक्षिणैः ॥ २४ ॥ जब राजाका विधिपूर्वक राज्याभिषेक हो जाय और वह राज्यासनपर बैठ जाय तब राजा बहुत-सी दक्षिणाओंसे युक्त महान् यज्ञका अनुष्ठान करे ॥ २४ ॥
वृद्धबालधनं रक्ष्यमन्धस्य कृपणस्य च । न खातपूर्वं कुर्वीत न रुदन्ती धनं हरेत् ॥ २५ ॥ राजा वृद्ध, बालक, दीन और अन्धे मनुष्यके धनकी रक्षा करे। पानी न बरसनेपर जब प्रजा कुआँ खोदकर किसी तरह सिंचाई करके कुछ अन्न पैदा करे और उसीसे जीविका चलाती हो तो राजाको वह धन नहीं लेना चाहिये तथा किसी क्लेशमें पड़कर रोती हुई स्त्रीका भी धन न ले ॥ २५ ॥
हृतं कृपणवित्तं हि राष्ट्रं हन्ति नृपश्रियम् । दद्याच्च महतो भोगान् क्षुद्रयं प्रणोदेत् सताम् ॥ २६ ॥ यदि किसी दरिद्रका धन छीन लिया जाय तो वह राजाके राज्यका और लक्ष्मीका विनाश कर देता है। अतः राजाको चाहिये कि दीनोंका धन न लेकर उन्हें महान् भोग अर्पित
करे और श्रेष्ठ पुरुषोंको भूखका कष्ट न होने दे ॥ २६ ॥
येषां स्वादूनि भोज्यानि समवेक्ष्यन्ति बालकाः ।
नाश्रन्ति विधिवत् तानि किं नु पापतरं ततः ॥ २७ ॥
जिसके स्वादिष्ट भोजनकी ओर छोटे-छोटे बच्चे तरसती आँखोंसे देखते हों और वह उन्हें न्यायतः खानेको न मिलता हो, उस पुरुषके द्वारा इससे बढ़कर पाप और क्या हो सकता है? ॥ २७ ॥
यदि ते तादृशो राष्ट्रे विद्वान् सीदेत् क्षुधा द्विजः ।
भ्रूणहत्यां च गच्छेथाः कृत्वा पापमिवोत्तमम् ॥ २८ ॥
राजन्! यदि तुम्हारे राज्यमें कोई वैसा विद्वान् ब्राह्मण भूखसे कष्ट पा रहा हो तो तुम्हें भ्रूण-हत्याका पाप लगेगा और कोई बड़ा भारी पाप करनेसे मनुष्यकी जो दुर्गति होती है, वही तुम्हारी भी होगी ॥ २८ ॥
धिक् तस्य जीवितं राज्ञो राष्ट्रे यस्यावसीदति ।
द्विजोऽन्यो वा मनुष्योऽपि शिबिराह वचो यथा ॥ २९ ॥
राजा शिबिका कथन है कि 'जिसके राज्यमें ब्राह्मण या कोई और मनुष्य क्षुधासे पीड़ित हो रहा हो, उस राजाके जीवनको धिक्कार है ॥ २९ ॥
यस्य स्म विषये राज्ञः स्नातकः सीदति क्षुधा ।
अवृद्धिमेति तद्राष्ट्रं विन्दते सहराजकम् ॥ ३० ॥
जिस राजाके राज्यमें स्नातक ब्राह्मण भूखसे कष्ट पाता है, उसके राज्यकी उन्नति रुक जाती है; साथ ही वह राज्य शत्रु राजाओंके हाथमें चला जाता है ॥ ३० ॥
क्रोशन्त्यो यस्य वै राष्ट्राद् ह्रियन्ते तरसा स्त्रियः ।
क्रोशतां पतिपुत्राणां मृतोऽसौ न च जीवति ॥ ३१ ॥
जिसके राज्यसे रोती-बिलखती स्त्रियोंका बलपूर्वक अपहरण हो जाता हो और उनके पति-पुत्र रोते-पीटते रह जाते हों, वह राजा नहीं, मुर्दा है। अर्थात् वह जीवित रहते हुए मुर्देके समान है ॥ ३१ ॥
अरक्षितारं हर्तारं विलोप्तारमनायकम् ।
तं वै राजकलिं हन्युः प्रजाः सन्नह्य निर्घृणम् ॥ ३२ ॥
जो प्रजाकी रक्षा नहीं करता, केवल उसके धनको लूटता-खसोटता रहता है, तथा जिसके पास कोई नेतृत्व करनेवाला मन्त्री नहीं है, वह राजा नहीं, कलियुग है। समस्त प्रजाको चाहिये कि ऐसे निर्दयी राजाको बाँधकर मार डाले ॥ ३२ ॥
अहं वो रक्षितेत्युक्त्वा यो न रक्षति भूमिपः ।
स संहत्य निहन्तव्यः श्वेव सोन्माद आतुरः ॥ ३३ ॥
जो राजा प्रजासे यह कहकर कि 'मैं तुमलोगोंकी रक्षा करूँगा' उनकी रक्षा नहीं करता, वह पागल और रोगी कुत्तेकी तरह सबके द्वारा मार डालने योग्य है ॥
पापं कुर्वन्ति यत् किंचित् प्रजा राज्ञा ह्यरक्षिताः । चतुर्थं तस्य पापस्य राजा विन्दति भारत ॥ ३४ ॥ भरतनन्दन! राजासे अरक्षित होकर प्रजा जो कुछ भी पाप करती है, उस पापका एक चौथाई भाग राजाको भी प्राप्त होता है ॥ ३४ ॥
अथाहुः सर्वमेवैति भूयोऽर्धमिति निश्चयः । चतुर्थं मतमस्माकं मनोः श्रुत्वानुशासनम् ॥ ३५ ॥ कुछ लोगोंका कहना है कि सारा पाप राजाको ही लगता है। दूसरे लोगोंका यह निश्चय है कि राजा आधे पापका भागी होता है। परंतु मनुका उपदेश सुनकर हमारा मत यही है कि राजाको उस पापका एक चतुर्थांश ही प्राप्त होता है ॥ ३५ ॥
शुभं वा यच्च कुर्वन्ति प्रजा राज्ञा सुरक्षिताः । चतुर्थं तस्य पुण्यस्य राजा चाप्नोति भारत ॥ ३६ ॥ भारत! राजासे भलीभाँति सुरक्षित होकर प्रजा जो भी शुभ कर्म करती है, उसके पुण्यका चौथाई भाग राजा प्राप्त कर लेता है ॥ ३६ ॥
जीवन्तं त्वानुजीवन्तु प्रजाः सर्वा युधिष्ठिर । पर्जन्यमिव भूतानि महाद्रुममिवाण्डजाः ॥ ३७ ॥ कुबेरमिव रक्षांसि शतक्रतुमिवामराः । ज्ञातयस्त्वानुजीवन्तु सुहृदश्च परंतप ॥ ३८ ॥ परंतप युधिष्ठिर! जैसे सब प्राणी मेघके सहारे जीवन धारण करते हैं, जैसे पक्षी महान् वृक्षका आश्रय लेकर रहते हैं, तथा जिस प्रकार राक्षस कुबेरके और देवता इन्द्रके आश्रित रहकर जीवन धारण करते हैं, उसी प्रकार तुम्हारे जीते-जी सारी प्रजा तुमसे ही अपनी जीविका चलाये तथा तुम्हारे सुहृद् एवं भाई-बन्धु भी तुमपर ही अवलम्बित होकर जीवन निर्वाह करें ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि एकषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें एकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६१ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३९ १/३ श्लोक हैं)
सब दानोंसे बढ़कर भूमिदानका महत्त्व तथा उसीके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद
द्विषष्टितमोऽध्यायः
सब दानोंसे बढ़कर भूमिदानका महत्त्व तथा उसीके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद
युधिष्ठिर उवाच
इदं देयमिदं देयमितीयं श्रुतिरादरात् ।
बहुदेयाश्च राजानः किंस्विद् दानमनुत्तमम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! यह देना चाहिये, वह देना चाहिये, ऐसा कहकर यह श्रुति बड़े आदरके साथ दानका विधान करती है तथा शास्त्रोंमें राजाओंके लिये बहुत कुछ दान करनेके लिये बात कही गयी है; परंतु मैं यह जानना चाहता हूँ कि सब दानोंमें सर्वोत्तम दान कौन-सा है? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अतिदानानि सर्वाणि पृथिवीदानमुच्यते ।
अचला ह्यक्षया भूमिर्दोग्ध्री कामानिहोत्तमान् ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— बेटा! सब दानोंसे बढ़कर पृथ्वीदान बताया गया है। पृथ्वी अचल और अक्षय है। वह इस लोकमें समस्त उत्तम भोगोंको देनेवाली है ॥
दोग्ध्री वासांसि रत्नानि पशून् व्रीहियवांस्तथा ।
भूमिदः सर्वभूतेषु शाश्वतीरेधते समाः ॥ ३ ॥
वस्त्र, रत्न, पशु और धान-जौ आदि नाना प्रकारके अन्न—इन सबको देनेवाली पृथ्वी ही है; अतः पृथ्वीका दान करनेवाला मनुष्य सदा समस्त प्राणियोंमें सबसे अधिक अभ्युदयशील होता है ॥ ३ ॥
यावद् भूमेरायुरीह तावद् भूमिद एधते ।
न भूमिदानादस्तीह परं किंचिद् युधिष्ठिर ॥ ४ ॥
युधिष्ठिर! इस जगत्में जबतक पृथ्वीकी आयु है, तबतक भूमिदान करनेवाला मनुष्य समृद्धिशाली रहकर सुख भोगता है। अतः यहाँ भूमिदानसे बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं है ॥ ४ ॥
अप्यल्पं प्रददुः सर्वे पृथिव्या इति नः श्रुतम् ।
भूमिमेव ददुः सर्वे भूमिं ते भुञ्जते जनाः ॥ ५ ॥
हमने सुना है कि जिन लोगोंने थोड़ी-सी भी पृथ्वी दान की है, वे सब लोग भूमिदानका ही पूर्ण फल पाकर उसका उपभोग करते हैं ॥ ५ ॥
स्वकर्मैवोपजीवन्ति नरा इह परत्र च ।
भूमिर्भूतिर्महादेवी दातारं कुरुते प्रियम् ।। ६ ।।
मनुष्य इहलोक और परलोकमें अपने कर्मके अनुसार ही जीवन-निर्वाह करते हैं। भूमि ऐश्वर्यस्वरूपा महादेवी है। वह दाताको अपना प्रिय बना लेती है ।।
य एतां दक्षिणां दद्यादक्षयां राजसत्तम ।
पुनर्नरत्वं सम्प्राप्य भवेत् स पृथिवीपतिः ।। ७ ।।
नृपश्रेष्ठ! जो इस अक्षय भूमिको दान करता है वह दूसरे जन्ममें मनुष्य होकर पृथ्वीका स्वामी होता है ।। ७ ।।
यथा दानं तथा भोग इति धर्मेषु निश्चयः ।
संग्रामे वा तनुं जह्याद् दद्याच्च पृथिवीमिमाम् ।। ८ ।।
इत्येतत् क्षत्रबन्धूनां वदन्ति परमां श्रियम् ।
धर्मशास्त्रोंका सिद्धान्त है कि जैसा दान किया जाता है, वैसा ही भोग मिलता है। संग्राममें शरीरका त्याग करना तथा इस पृथ्वीका दान करना—ये दोनों ही कार्य क्षत्रियोंको उत्तम लक्ष्मीकी प्राप्ति करानेवाले होते हैं ।। ८ १/२ ।।
पुनाति दत्ता पृथिवी दातारमिति शुश्रुम ।। ९ ।।
अपि पापसमाचारं ब्रह्मघ्नमपि चानृतम् ।
सैव पापं प्लावयति सैव पापात् प्रमोचयेत् ।। १० ।।
दानमें दी हुई पृथ्वी दाताको पवित्र कर देती है—यह हमने सुना है। कितना ही बड़ा पापाचारी, ब्रह्महत्यारा और असत्यवादी क्यों न हो, दानमें दी हुई पृथ्वी ही दाताके पापको धो बहा देती है और वही उसे सर्वथा पापमुक्त कर देती है ।। ९-१० ।।
अपि पापकृतां राज्ञां प्रतिगृह्णन्ति साधवः ।
पृथिवीं नान्यदिच्छन्ति पावनं जननी यथा ।। ११ ।।
श्रेष्ठ पुरुष पापाचारी राजाओंसे भी पृथ्वीका दान तो ले लेते हैं, किंतु और किसी वस्तुका दान नहीं लेना चाहते। पृथ्वी वैसी ही पावन वस्तु है जैसी माता ।। ११ ।।
नामास्याः प्रियदत्तेति गुह्यं देव्याः सनातनम् ।
दानं वाप्यथवाऽऽदानं नामास्याः प्रथमं प्रियम् ।। १२ ।।
इस पृथ्वी देवीका सनातन गोपनीय नाम ‘प्रियदत्ता’ है। इसका दान अथवा ग्रहण दोनों ही दाता और प्रतिग्रहीताको प्रिय हैं; इसीलिये इसका यह प्रथम नाम सबको प्रिय है ।। १२ ।।
य एतां विदुषे दद्यात् पृथिवीं पृथिवीपतिः ।
पृथिव्यामेतदिष्टं स राजा राज्यमितो व्रजेत् ।। १३ ।।
जो पृथिवीपति विद्वान् ब्राह्मणोंको इस पृथ्वीका दान देता है, वह राजा इस दानके प्रभावसे पुनः राज्य प्राप्त करता है। भूमण्डलमें यह पृथ्वीदान सबको प्रिय है ।। १३ ।।
पुनश्चासौ जनिं प्राप्य राजवत् स्यान्न संशयः ।
तस्मात् प्राप्यैव पृथिवीं दद्यात् विप्राय पार्थिवः ॥ १४ ॥
वह पुनर्जन्म पाकर राजाके समान ही होता है, इसमें संशय नहीं है। अतः राजाको चाहिये कि वह पृथ्वीपर अधिकार पाते ही उसमेंसे कुछ ब्राह्मणको दान करे ॥ १४ ॥
नाभूमिपतिना भूमिरधितिष्ठेया कथंचन ।
न चापात्रेण वा ग्राह्या दत्तदाने न चाचरेत् ॥ १५ ॥
जो जिस भूमिका स्वामी नहीं है, उसे उसपर किसी तरह अधिकार नहीं करना चाहिये तथा अयोग्य पात्रको भूमिदान नहीं ग्रहण करना चाहिये। जिस भूमिको दानमें दे दिया गया हो, उसे अपने उपयोगमें नहीं लाना चाहिये ॥ १५ ॥
ये चान्ये भूमिमिच्छेयुः कुर्युुरेवं न संशयः ।
यः साधोर्भूमिमादत्ते न भूमिं विन्दते तु सः ॥ १६ ॥
दूसरे भी जो लोग भावी जन्ममें भूमि पानेकी इच्छा करें, उन्हें भी इस जन्ममें इसी तरह भूमिदान करना चाहिये। इसमें संशय नहीं है। जो छल-बलसे श्रेष्ठ पुरुषकी भूमिका अपहरण कर लेता है, उसे भूमिकी प्राप्ति नहीं होती ॥ १६ ॥
भूमिं दत्त्वा तु साधुभ्यो विन्दते भूमिमुत्तमाम् ।
प्रेत्य चेह च धर्मात्मा सम्प्राप्नोति महत् यशः ॥ १७ ॥
श्रेष्ठ पुरुषोंको भूमिदान देनेसे दाताको उत्तम भूमिकी प्राप्ति होती है तथा वह धर्मात्मा पुरुष इहलोक और परलोकमें भी महान् यशका भागी होता है ॥ १७ ॥
(एकागारकरीं दत्त्वा षष्टिसाहस्रमूर्ध्वगः ।
तावत्या हरणे पृथ्व्या नरकं द्विगुणोत्तरम् ॥)
जो एक घर बनाने भरके लिये भूमि दान करता है, वह साठ हजार वर्षोंतक ऊर्ध्वलोकमें निवास करता है। तथा जो उतनी ही पृथ्वीका हरण कर लेता है, उसे उससे दूने अधिक कालतक नरकमें रहना पड़ता है ॥
यस्य विप्रास्तु शंसन्ति साधोर्भूमिं सदैव हि ।
न तस्य शत्रवो राजन् प्रशंसन्ति वसुन्धराम् ॥ १८ ॥
राजन्! ब्राह्मण जिस श्रेष्ठ पुरुषकी दी हुई भूमिकी सदा ही प्रशंसा करते हैं, उसकी उस भूमिकी राजाके शत्रु प्रशंसा नहीं करते हैं ॥ १८ ॥
यत् किंचित् पुरुषः पापं कुरुते वृत्तिकर्शितः ।
अपि गोचर्ममात्रेण भूमिदानेन पूयते ॥ १९ ॥
जीविका न होनेके कारण मनुष्य क्लेशमें पड़कर जो कुछ पाप कर डालता है, वह सारा पाप गोचर्मके बराबर भूमि-दान करनेसे धुल जाता है ॥ १९ ॥
येऽपि संकीर्णकर्माणो राजानो रौद्रकर्मिणः ।
तेभ्यः पवित्रमाख्येयं भूमिदानमनुत्तमम् ॥ २० ॥
जो राजा कठोर कर्म करनेवाले तथा पापपरायण हैं, उन्हें पापोंसे मुक्त होनेके लिये परम पवित्र एवं सबसे उत्तम भूमिदानका उपदेश देना चाहिये॥ २०॥
अल्पान्तरमिदं शश्वत् पुराणा मेनिरे जनाः।
यो यजेताश्वमेधेन दद्याद् वा साधवे महीम्॥ २१॥
प्राचीनकालके लोग सदा यह मानते रहे हैं कि जो अश्वमेधयज्ञ करता है अथवा जो श्रेष्ठ पुरुषको पृथ्वीदान करता है, इन दोनोंमें बहुत कम अन्तर है॥
अपि चेत्सुकृतं कृत्वा शङ्केरन्नपि पण्डिताः।
अशङ्क्यमेकमेवैतद् भूमिदानमनुत्तमम्॥ २२॥
दूसरा कोई पुण्य कर्म करके उसके फलके विषयमें विद्वान् पुरुषोंको भी शंका हो जाय, यह सम्भव है; किंतु एकमात्र यह सर्वोत्तम भूमिदान ही ऐसा सत्कर्म है, जिसके फलके विषयमें किसीको शंका नहीं हो सकती॥ २२॥
सुवर्णं रजतं वस्त्रं मणिमुक्तावसूनि च।
सर्वमेतन्महाप्राज्ञो ददाति वसुधां ददत्॥ २३॥
जो महाबुद्धिमान् पुरुष पृथ्वीका दान करता है, वह सोना, चाँदी, वस्त्र, मणि, मोती तथा रत्न—इन सबका दान कर देता है (अर्थात् इन सभी दानोंका फल प्राप्त कर लेता है)॥ २३॥
तपो यज्ञः श्रुतं शीलमलोभः सत्यसंधता।
गुरुदैवतपूजा च एता वर्तन्ति भूमिदम्॥ २४॥
पृथ्वीका दान करनेवाले पुरुषको तप, यज्ञ, विद्या, सुशीलता, लोभका अभाव, सत्यवादिता, गुरु-शुश्रूषा और देवाराधन—इन सबका फल प्राप्त हो जाता है॥ २४॥
भर्तृनिःश्रेयसे युक्तास्त्यक्तात्मानो रणे हताः।
ब्रह्मलोकगताः सिद्धा नातिक्रामन्ति भूमिदम्॥ २५॥
जो अपने स्वामीका भला करनेके लिये रणभूमिमें मारे जाकर शरीर त्याग देते हैं और जो सिद्ध होकर ब्रह्मलोकमें पहुँच जाते हैं, वे भी भूमिदान करनेवाले पुरुषको लाँघकर आगे नहीं बढ़ने पाते॥ २५॥
यथा जनित्री स्वं पुत्रं क्षीरेण भरते सदा।
अनुगृह्णाति दातारं तथा सर्वरसैर्मही॥ २६॥
जैसे माता अपने बच्चेको सदा दूध पिलाकर पालती है, उसी प्रकार पृथ्वी सब प्रकारके रस देकर भूमिदातापर अनुग्रह करती है॥ २६॥
मृत्युर्वैकिङ्करो दण्डस्तमो वह्निः सुदारुणः।
घोराश्च दारुणाः पाशा नोपसर्पन्ति भूमिदम्॥ २७॥
कालकी भेजी हुई मौत, दण्ड, तमोगुण, दारुण अग्नि और अत्यन्त भयंकर पाश—ये भूमिदान करनेवाले पुरुषका स्पर्श नहीं कर सकते हैं॥ २७॥
पितॄंश्च पितृलोकस्थान् देवलोकाच्च देवताः । संतर्पयति शान्तात्मा यो ददाति वसुन्धराम् ॥ २८ ॥ जो पृथ्वीका दान करता है, वह शान्ताचित्त पुरुष पितृलोकमें रहनेवाले पितरों तथा देवलोकसे आये हुए देवताओंको भी तृप्त कर देता है ॥ २८ ॥
कृशाय म्रियमाणाय वृत्तिग्लानाय सीदते । भूमिं वृत्तिकरीं दत्त्वा सत्री भवति मानवः ॥ २९ ॥ दुर्बल, जीविकाके बिना दुखी और भूखके कष्टसे मरते हुए ब्राह्मणको उपजाऊ भूमिदान करनेवाला मनुष्य यज्ञका फल पाता है ॥ २९ ॥
यथा धावति गौर्र्वत्सं स्रवन्ती वत्सला पयः । एवमेव महाभाग भूमिर्भवति भूमिदम् ॥ ३० ॥ महाभाग! जैसे बछड़ेके प्रति वात्सल्यभावसे भरी हुई गौ अपने थनोंसे दूध बहाती हुई उसे पिलानेके लिये दौड़ती है, उसी प्रकार यह पृथ्वी भूमिदान करनेवालेको सुख पहुँचानेके लिये दौड़ती है ॥ ३० ॥
फालकृष्टं महीं दत्त्वा सबीजां सफलामपि । उदीर्णं वापि शरणं यथा भवति कामदः ॥ ३१ ॥ जो मनुष्य जोती-बोयी और उपजी हुई खेतीसे भरी भूमिको दान करता है अथवा विशाल भवन बनवाकर देता है, उसकी समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥ ३१ ॥
ब्राह्मणं वृत्तिसम्पन्नमाहिताग्निं शुचिव्रतम् । नरः प्रतिग्राह्य महीं न याति परमापदम् ॥ ३२ ॥ जो सदाचारी, अग्निहोत्री और उत्तम व्रतमें संलग्न ब्राह्मणको पृथ्वीका दान करता है, वह कभी भारी विपत्तिमें नहीं पड़ता है ॥ ३२ ॥
यथा चन्द्रमसो वृद्धिरहन्यहनि जायते । तथा भूमिकृतं दानं सस्ये सस्ये विवर्धते ॥ ३३ ॥ जैसे चन्द्रमाकी कला प्रतिदिन बढ़ती है, उसी प्रकार दान की हुई पृथ्वीमें जितनी बार फसल पैदा होती है, उतना ही उसके पृथ्वी-दानका फल बढ़ता जाता है ॥ ३३ ॥
अत्र गाथा भूमिगीताः कीर्तयन्ति पुराविदः । याः श्रुत्वा जामदग्न्येन दत्ता भूः काश्यपाय वै ॥ ३४ ॥ प्राचीन बातोंको जाननेवाले लोग भूमिकी गायी हुई गाथाओंका वर्णन किया करते हैं, जिन्हें सुनकर जमदग्निनन्दन परशुरामने काश्यपजीको सारी पृथ्वी दान कर दी थी ॥ ३४ ॥
मामेवादत्त मां दत्त मां दत्त्वा मामवाप्स्यथ । अस्मिल्लोंके परे चैव तद् दत्तं जायते पुनः ॥ ३५ ॥