महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 586, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंपितॄंश्च पितृलोकस्थान् देवलोकाच्च देवताः । संतर्पयति शान्तात्मा यो ददाति वसुन्धराम् ॥ २८ ॥ जो पृथ्वीका दान करता है, वह शान्ताचित्त पुरुष पितृलोकमें रहनेवाले पितरों तथा देवलोकसे आये हुए देवताओंको भी तृप्त कर देता है ॥ २८ ॥
कृशाय म्रियमाणाय वृत्तिग्लानाय सीदते । भूमिं वृत्तिकरीं दत्त्वा सत्री भवति मानवः ॥ २९ ॥ दुर्बल, जीविकाके बिना दुखी और भूखके कष्टसे मरते हुए ब्राह्मणको उपजाऊ भूमिदान करनेवाला मनुष्य यज्ञका फल पाता है ॥ २९ ॥
यथा धावति गौर्र्वत्सं स्रवन्ती वत्सला पयः । एवमेव महाभाग भूमिर्भवति भूमिदम् ॥ ३० ॥ महाभाग! जैसे बछड़ेके प्रति वात्सल्यभावसे भरी हुई गौ अपने थनोंसे दूध बहाती हुई उसे पिलानेके लिये दौड़ती है, उसी प्रकार यह पृथ्वी भूमिदान करनेवालेको सुख पहुँचानेके लिये दौड़ती है ॥ ३० ॥
फालकृष्टं महीं दत्त्वा सबीजां सफलामपि । उदीर्णं वापि शरणं यथा भवति कामदः ॥ ३१ ॥ जो मनुष्य जोती-बोयी और उपजी हुई खेतीसे भरी भूमिको दान करता है अथवा विशाल भवन बनवाकर देता है, उसकी समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥ ३१ ॥
ब्राह्मणं वृत्तिसम्पन्नमाहिताग्निं शुचिव्रतम् । नरः प्रतिग्राह्य महीं न याति परमापदम् ॥ ३२ ॥ जो सदाचारी, अग्निहोत्री और उत्तम व्रतमें संलग्न ब्राह्मणको पृथ्वीका दान करता है, वह कभी भारी विपत्तिमें नहीं पड़ता है ॥ ३२ ॥
यथा चन्द्रमसो वृद्धिरहन्यहनि जायते । तथा भूमिकृतं दानं सस्ये सस्ये विवर्धते ॥ ३३ ॥ जैसे चन्द्रमाकी कला प्रतिदिन बढ़ती है, उसी प्रकार दान की हुई पृथ्वीमें जितनी बार फसल पैदा होती है, उतना ही उसके पृथ्वी-दानका फल बढ़ता जाता है ॥ ३३ ॥
अत्र गाथा भूमिगीताः कीर्तयन्ति पुराविदः । याः श्रुत्वा जामदग्न्येन दत्ता भूः काश्यपाय वै ॥ ३४ ॥ प्राचीन बातोंको जाननेवाले लोग भूमिकी गायी हुई गाथाओंका वर्णन किया करते हैं, जिन्हें सुनकर जमदग्निनन्दन परशुरामने काश्यपजीको सारी पृथ्वी दान कर दी थी ॥ ३४ ॥
मामेवादत्त मां दत्त मां दत्त्वा मामवाप्स्यथ । अस्मिल्लोंके परे चैव तद् दत्तं जायते पुनः ॥ ३५ ॥