भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 587, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 587

वह गाथा इस प्रकार है—(पृथ्वी कहती है—) 'मुझे ही दानमें दो, मुझे ही ग्रहण करो। मुझे देकर ही मुझे पाओगे; क्योंकि मनुष्य इस लोकमें जो कुछ दान करता है, वही उसे इहलोक और परलोकमें भी प्राप्त होता है' ।। ३५ ।।

य इमां व्याहृतिं वेद ब्राह्मणो वेदसम्मिताम् ।
श्राद्धस्य क्रियमाणस्य ब्रह्मभूयं स गच्छति ।। ३६ ।।
जो ब्राह्मण श्राद्धकालमें पृथ्वीकी गायी हुई वेदसम्मत इस गाथाका पाठ करता है, वह ब्रह्मभावको प्राप्त होता है ।। ३६ ।।

कृत्यानामधिशस्तानामरिष्टशमनं महत् ।
प्रायश्चित्तं महीं दत्त्वा पुनात्युभयतो दश ।। ३७ ।।
अत्यन्त प्रबल कृत्या (मारणशक्ति) के प्रयोगसे जो भय प्राप्त होता है, उसको शान्त करनेका सबसे महान् साधन पृथ्वीका दान ही है। भूमिदानरूप प्रायश्चित्त करके मनुष्य अपने आगे-पीछेकी दस पीढ़ियोंको पवित्र कर देता है ।। ३७ ।।

पुनाति य इदं वेद वेदवादं तथैव च ।
प्रकृतिः सर्वभूतानां भूमिर्वैश्वानरी मता ।। ३८ ।।
जो वेदवाणीरूप इस भूमिगाथाको जानता है, वह भी अपनी दस पीढ़ियोंको पवित्र कर देता है। यह पृथ्वी सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्तिस्थान है और अग्नि इसका अधिष्ठाता देवता है ।। ३८ ।।

अभिषिच्यैव नृपतिं श्रावयेदिममागमम् ।
यथा श्रुत्वा महीं दद्यान्नादद्यात् साधुतश्च ताम् ।। ३९ ।।
राजाको राजसिंहासनपर अभिषिक्त करनेके बाद उसे तत्काल ही पृथ्वीकी गायी हुई यह गाथा सुना देनी चाहिये; जिससे वह भूमिका दान करे और सत्पुरुषोंके हाथसे उन्हें दी हुई भूमि छीन न ले ।। ३९ ।।

सोऽयं कृत्स्नो ब्राह्मणार्थो राजार्थश्चाप्यसंशयः ।
राजा हि धर्मकुशलः प्रथमं भूतिलक्षणम् ।। ४० ।।
यह सारी कथा ब्राह्मण और क्षत्रियके लिये है। इस विषयमें कोई संदेह नहीं है; क्योंकि राजा धर्ममें कुशल हो, यह प्रजाके ऐश्वर्य (वैभव)-को सूचित करनेवाला प्रथम लक्षण है ।। ४० ।।

अथ येषामधर्मज्ञो राजा भवति नास्तिकः ।
न ते सुखं प्रबुध्यन्ति न सुखं प्रस्वपन्ति च ।। ४१ ।।
सदा भवन्ति चोद्विग्नास्तस्य दुश्चरितैर्नराः ।
योगक्षेमा हि बहवो राष्ट्रं नास्याविशन्ति तत् ।। ४२ ।।
जिनका राजा धर्मको न जाननेवाला और नास्तिक होता है, वे लोग न तो सुखसे सोते हैं और न सुखसे जागते ही हैं; अपितु उस राजाके दुराचारसे सदैव उद्विग्न रहते हैं। ऐसे