भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 588, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 588

राजाके राज्यमें बहुधा योगक्षेम नहीं प्राप्त होते ।।
अथ येषां पुनः प्राज्ञो राजा भवति धार्मिकः ।
सुखं ते प्रतिबुध्यन्ते सुसुखं प्रस्वपन्ति च ॥ ४३ ॥
किंतु जिनका राजा बुद्धिमान् और धार्मिक होता है, वे सुखसे सोते और सुखसे जागते हैं ॥ ४३ ॥
तस्य राज्ञः शुभै राज्यैः कर्मभिर्निर्वृता नराः ।
योगक्षेमेण वृष्ट्या च विवर्धन्ते स्वकर्मभिः ॥ ४४ ॥
उस राजाके शुभ राज्य और शुभ कर्मोंसे प्रजावर्गके लोग संतुष्ट रहते हैं। उस राज्यमें सबके योगक्षेमका निर्वाह होता है, समयपर वर्षा होती है और प्रजा अपने शुभ कर्मोंसे समृद्धिशालिनी होती है ॥ ४४ ॥
स कुलीनः स पुरुषः स बन्धुः स च पुण्यकृत् ।
स दाता स च विक्रान्तो यो ददाति वसुन्धराम् ॥ ४५ ॥
जो पृथ्वीका दान करता है, वही कुलीन, वही पुरुष, वही बन्धु, वही पुण्यात्मा, वही दाता और वही पराक्रमी है ॥ ४५ ॥
आदित्या इव दीप्यन्ते तेजसा भुवि मानवाः ।
ददन्ति वसुधां स्फीतां ये वेदविदुषि द्विजे ॥ ४६ ॥
जो वेदवेत्ता ब्राह्मणको धन-धान्यसे सम्पन्न भूमिदान करते हैं, वे मनुष्य इस पृथ्वीपर अपने तेजसे सूर्यके समान प्रकाशित होते हैं ॥ ४६ ॥
यथा सस्यानि रोहन्ति प्रकीर्णानि महीतले ।
तथा कामाः प्ररोहन्ति भूमिदानसमार्जिताः ॥ ४७ ॥
जैसे भूमिमें बोये हुए बीज खेतीके रूपमें अंकुरित होते और अधिक अन्न पैदा करते हैं, उसी प्रकार भूमिदान करनेसे सम्पूर्ण कामनाएँ सफल होती हैं ॥
आदित्यो वरुणो विष्णुर्ब्रह्मा सोमो हुताशनः ।
शूलपाणिश्च भगवान् प्रतिनन्दन्ति भूमिदम् ॥ ४८ ॥
सूर्य, वरुण, विष्णु, ब्रह्मा, चन्द्रमा, अग्नि और भगवान् शंकर—ये सभी भूमि-दान करनेवाले पुरुषका अभिनन्दन करते हैं ॥ ४८ ॥
भूमौ जायन्ति पुरुषा भूमौ निष्ठां व्रजन्ति च ।
चतुर्विधो हि लोकोऽयं योऽयं भूमिगुणात्मकः ॥ ४९ ॥
सब लोग पृथ्वीपर ही जन्म लेते और पृथ्वीमें ही लीन हो जाते हैं। अण्डज, जरायुज, स्वेदज और उद्भिज्ज—इन चारों प्रकारके प्राणियोंका शरीर पृथ्वीका ही कार्य है ।।
एषा माता पिता चैव जगतः पृथिवीपते ।
नानया सदृशं भूतं किंचिदस्ति जनाधिप ॥ ५० ॥