भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 589, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 589

पृथ्वीनाथ! नरेश्वर! यह पृथ्वी ही जगत्‌की माता और पिता है। इसके समान दूसरा कोई भूत नहीं है॥ अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । बृहस्पतेश्च संवादमिन्द्रस्य च युधिष्ठिर ॥ ५१ ॥ युधिष्ठिर! इस विषयमें विज्ञ पुरुष इन्द्र और बृहस्पतिके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं॥ ५१ ॥ इष्ट्वा क्रतुशतेनाथ महता दक्षिणावता । मघवा वाग्विदां श्रेष्ठं पप्रच्छेदं बृहस्पतिम् ॥ ५२ ॥ इन्द्रने महान् दक्षिणाओंसे युक्त सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेके पश्चात् वाग्‍वेत्ताओंमें श्रेष्ठ बृहस्पतिजीसे इस प्रकार पूछा॥ ५२ ॥

मघवोवाच

भगवन् केन दानेन स्वर्गतः सुखमेधते । यदक्षयं महार्घं च तद् ब्रूहि वदतां वर ॥ ५३ ॥ इन्द्र बोले— वक्ताओंमें श्रेष्ठ भगवन्! किस दानके प्रभावसे दाताको स्वर्गसे भी अधिक सुखकी प्राप्ति होती है? जिसका फल अक्षय और अधिक महत्त्वपूर्ण हो, उस दानको ही मुझे बताइये॥ ५३ ॥

भीष्म उवाच

इत्युक्तः स सुरेन्द्रेण ततो देवपुरोहितः । बृहस्पतिर्बृहत्तेजाः प्रत्युवाच शतक्रतुम् ॥ ५४ ॥ भीष्मजी कहते हैं— भारत! देवराज इन्द्रके ऐसा कहनेपर देवताओंके पुरोहित महातेजस्वी बृहस्पतिने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया॥ ५४ ॥

बृहस्पतिरुवाच

सुवर्णदानं गोदानं भूमिदानं च वृत्रहन् । (विद्यादानं च कन्यानां दानं पापहरं परम् ।) दददेतान् महाप्राज्ञः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५५ ॥ बृहस्पतिने कहा— वृत्रासुरका वध करनेवाले इन्द्र! सुवर्णदान, गोदान, भूमिदान, विद्यादान और कन्यादान—ये अत्यन्त पापहारी माने गये हैं। जो परम बुद्धिमान् पुरुष इन सब वस्तुओंका दान करता है वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ५५ ॥ न भूमिदानाद् देवेन्द्र परं किंचिदिति प्रभो । विशिष्टमिति मन्यामि यथा प्राहर्मनीषिणः ॥ ५६ ॥