महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रभो! देवेन्द्र! जैसा कि मनीषी पुरुष कहते हैं, मैं भूमिदानसे बढ़कर दूसरे किसी दानको नहीं मानता हूँ ।। ५६ ।।
(ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा राष्ट्रघातेऽथ स्वामिनः ।
कुलस्त्रीणां परिभवे मृतास्ते भूमिदैः समाः ॥)
जो ब्राह्मणोंके लिये, गौओंके लिये, राष्ट्रके विनाशके अवसरपर स्वामीके लिये तथा जहाँ कुलांगनाओंका अपमान होता हो, वहाँ उन सबकी रक्षाके लिये युद्धमें प्राण त्याग करते हैं, वे ही भूमिदान करनेवालोंके समान पुण्यके भागी होते हैं ।।
ये शूरा निहता युद्धे स्वर्ग्याता रणगृद्धिनः ।
सर्वे ते विबुधश्रेष्ठ नातिक्रामन्ति भूमिदम् ॥ ५७ ॥
विबुधश्रेष्ठ! मनमें युद्धके लिये उत्साह रखनेवाले जो शूरवीर रणभूमिमें मारे जाकर स्वर्गलोकमें जाते हैं, वे सब-के-सब भूमिदाताका उल्लंघन नहीं कर सकते ।।
भर्तुर्निःश्रेयसे युक्तास्त्यक्तात्मानो रणे हताः ।
ब्रह्मलोकगता मुक्ता नातिक्रामन्ति भूमिदम् ॥ ५८ ॥
स्वामीकी भलाईके लिये उद्यत हो रणभूमिमें मारे जाकर अपने शरीरका परित्याग करनेवाले पुरुष पापोंसे मुक्त हो ब्रह्मलोकमें पहुँच जाते हैं; परंतु वे भी भूमिदातासे आगे नही बढ़ पाते हैं ।। ५८ ।।
पञ्च पूर्वा हि पुरुषाः षडन्ये वसुधां गताः ।
एकादश ददद्भूमिं परित्रातीह मानवः ॥ ५९ ॥
इस जगत्में भूमिदान करनेवाला मनुष्य अपनी पाँच पीढ़ीत्तकके पूर्वजोंका और अन्य छः पीढ़ियोंतक पृथ्वीपर आनेवाली संतानोंका—इस प्रकार कुल ग्यारह पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है ।। ५९ ।।
रत्नोपकीर्णां वसुधां यो ददाति पुरंदर ।
स मुक्तः सर्वकलुषैः स्वर्गलोके महीयते ॥ ६० ॥
पुरंदर! जो रत्नयुक्त पृथ्वीका दान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है ।। ६० ।।
महीं स्फीतां ददद् राजन् सर्वकामगुणान्विताम् ।
राजाधिराजो भवति तद्धि दानमनुत्तमम् ॥ ६१ ॥
राजन्! धन-धान्यसे सम्पन्न तथा समस्त मनोवांछित गुणोंसे युक्त पृथ्वीका दान करनेवाला पुरुष दूसरे जन्ममें राजाधिराज होता है; क्योंकि वह सर्वोत्तम दान है ।। ६१ ।।
सर्वकामसमायुक्तां काश्यपीं यः प्रयच्छति ।
सर्वभूतानि मन्यन्ते मां ददातीति वासव ॥ ६२ ॥
इन्द्र! जो सम्पूर्ण भोगोंसे युक्त पृथ्वीका दान करता है, उसे सब प्राणी यही समझते हैं कि यह मेरा दान कर रहा है ।। ६२ ।।