महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 574, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपि ते प्रतिगृह्णीयुः श्रद्धोपेतं युधिष्ठिर ॥ १३ ॥ कार्यमित्येव मन्वाना धर्मज्ञाः सूक्ष्मदर्शिनः । युधिष्ठिर! वे धर्मज्ञ तथा सूक्ष्मदर्शी ब्राह्मण तुम्हारे श्रद्धायुक्त दानको कर्तव्यबुद्धिसे किया हुआ मानकर अवश्य स्वीकार करेंगे ॥ १३ १/२ ॥
अपि ते ब्राह्मणा भुक्त्वा गताः सोद्धरणान् गृहान् ॥ १४ ॥ येषां दाराः प्रतीक्षन्ते पर्जन्यमिव कर्षकाः । जैसे किसान वर्षाकी बाट जोहते रहते हैं, उसी प्रकार जिनके घरकी स्त्रियाँ अन्नकी प्रतीक्षामें बैठी हों और बालकोंको यह कहकर बहला रही हों कि 'अब तुम्हारे बाबूजी भोजन लेकर आते ही होंगे'; क्या ऐसे ब्राह्मण तुम्हारे यहाँ भोजन करके अपने घरोंको गये हैं? ॥ १४ १/२ ॥
अन्नानि प्रातःसवने नियता ब्रह्मचारिणः ॥ १५ ॥ ब्राह्मणास्तात भुञ्जानास्त्रेताग्निं प्रीणयन्त्युत । तात! नियमपूर्वक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण यदि प्रातःकाल घरमें भोजन करते हैं तो तीनों अग्नियोंको तृप्त कर देते हैं ॥ १५ १/२ ॥
माध्यन्दिनं ते सवनं ददतस्तात वर्तताम् ॥ १६ ॥ गोहिरण्यानि वासांसि तेनेन्द्रः प्रीयतां तव । बेटा! दोपहरके समय जो तुम ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें गौ, सुवर्ण और वस्त्र प्रदान करते हो, इससे तुम्हारे ऊपर इन्द्रदेव प्रसन्न हों ॥ १६ १/२ ॥
तृतीयं सवनं ते वै वैश्वदेवं युधिष्ठिर ॥ १७ ॥ यद् देवेभ्यः पितृभ्यश्च विप्रेभ्यश्च प्रयच्छसि । युधिष्ठिर! तीसरे समयमें जो तुम देवताओं, पितरों और ब्राह्मणोंके उद्देश्यसे दान करते हो, वह विश्वेदेवोंको संतुष्ट करनेवाला होता है ॥ १७ १/२ ॥
अहिंसा सर्वभूतेभ्यः संविभागश्च भागशः ॥ १८ ॥ दमस्त्यागो धृतिः सत्यं भवत्यवभृथाय ते । सब प्राणियोंके प्रति अहिंसाका भाव रखना, सबको यथायोग्य भाग अर्पण करना, इन्द्रियसंयम, त्याग, धैर्य और सत्य—ये सब गुण तुम्हें यज्ञान्तमें किये जानेवाले अवभृथ-स्नानका फल देंगे ॥ १८ १/२ ॥
एष ते विततो यज्ञः श्रद्धापूतः सदक्षिणः ॥ १९ ॥ विशिष्टः सर्वयज्ञानां नित्यं तात प्रवर्तताम् ॥ २० ॥ इस प्रकार जो तुम्हारे श्रद्धासे पवित्र एवं दक्षिणायुक्त यज्ञका विस्तार हो रहा है; यह सभी यज्ञोंसे बढ़कर है। तात युधिष्ठिर! तुम्हारा यह यज्ञ सदा चालू रहना चाहिये ॥ १९-२० ॥