महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 573, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंआनृशंस्यं परो धर्मो याचते यत् प्रदीयते । अयाचतः सीदमानान् सर्वोपायैर्निमन्त्रयेत् ॥ ६ ॥ याचकको जो दान दिया जाता है, वह दयारूप परम धर्म है, परंतु जो लोग क्लेश उठाकर भी याचना नहीं करते, उन ब्राह्मणोंको प्रत्येक उपायसे अपने पास बुलाकर दान देना चाहिये ॥ ६ ॥
यदि वै तादृशा राष्ट्रान् वसेयुस्ते द्विजोत्तमाः । भस्मच्छन्नानिवाग्नींस्तान् बुध्येथास्त्वं प्रयत्नतः ॥ ७ ॥ यदि तुम्हारे राज्यके भीतर वैसे श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते हों तो वे राखमें छिपी हुई आगके समान हैं। तुम्हें प्रयत्नपूर्वक ऐसे ब्राह्मणोंका पता लगाना चाहिये ॥ ७ ॥
तपसा दीप्यमानास्ते दहेयुः पृथिवीमपि । अपूज्यमानाः कौरव्य पूजार्हास्तु तथाविधाः ॥ ८ ॥ कुरुनन्दन! तपस्यासे देदीप्यमान होनेवाले वे ब्राह्मण पूजित न होनेपर यदि चाहें तो सारी पृथ्वीको भी भस्म कर सकते हैं; अतः वैसे ब्राह्मण सदा ही पूजा करनेके योग्य हैं ॥ ८ ॥
पूज्या हि ज्ञानविज्ञानतपोयोगसमन्विताः । तेभ्य पूजां प्रयुञ्जीथा ब्राह्मणेभ्यः परंतप ॥ ९ ॥ परंतप! जो ब्राह्मण ज्ञान-विज्ञान, तपस्या और योगसे युक्त हैं, वे पूजनीय होते हैं। उन ब्राह्मणोंकी तुम्हें सदा पूजा करनी चाहिये ॥ ९ ॥
ददद् बहुविधान् दायानुपागच्छन्नयाचताम् । यदग्निहोत्रे सुहुते सायंप्रातर्भवेत् फलम् ॥ १० ॥ विद्यावेदव्रतवति तद्दानफलमुच्यते । जो याचना नहीं करते, उनके पास तुम्हें स्वयं जाकर नाना प्रकारके पदार्थ देने चाहिये। सायं और प्रातःकाल विधिपूर्वक अग्निहोत्र करनेसे जो फल मिलता है, वही वेदके विद्वान् और व्रतधारी ब्राह्मणको दान देनेसे भी मिलता है ॥ १० १/२ ॥
विद्यावेदव्रतस्नातानव्यपाश्रयजीविनः ॥ ११ ॥ गूढस्वाध्यायतपसो ब्राह्मणान् संशितव्रतान् । कृतैरावसथैर्हृद्यैः सप्रेष्यैः सपरिच्छदैः ॥ १२ ॥ निमन्त्रयेथाः कौरव्य कामैश्चान्यैर्द्विजोत्तमान् । कुरुनन्दन! जो विद्या और वेदव्रतमें निष्णात हैं, जो किसीके आश्रित होकर जीविका नहीं चलाते, जिनका स्वाध्याय और तपस्या गुप्त है तथा जो कठोर व्रतका पालन करनेवाले हैं, ऐसे उत्तम ब्राह्मणोंको तुम अपने यहाँ निमन्त्रित करो और उन्हें सेवक, आवश्यक सामग्री तथा अन्यान्य उपभोगकी वस्तुओंसे सम्पन्न मनोरम गृह बनवाकर दो ॥ ११-१२ १/२ ॥