भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 592, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 592

स्नेहान् सर्वरसांश्चैव ददाति वसुधां ददत् ॥ ७१ ॥
इतना ही नहीं, पृथ्वीका दान करनेवाला पुरुष तालाब, कुआँ, झरना, सरोवर, स्नेह (घृत आदि) और सब प्रकारके रसोंके दानका भी फल प्राप्त कर लेता है ॥ ७१ ॥
ओषधीर्वीर्यसम्पन्ना नगान् पुष्पफलान्वितान् ।
काननोपलशैलांश्च ददाति वसुधां ददत् ॥ ७२ ॥
पृथ्वीका दान करते समय मनुष्य शक्तिशाली ओषधियों, फल और फूलोंसे भरे हुए वृक्षों, वन, प्रस्तर और पर्वतोंका भी दान कर देता है ॥ ७२ ॥
अग्निष्टोमप्रभृतिभिरिष्ट्वा च स्वाप्तदक्षिणैः ।
न तत्फलमवाप्नोति भूमिदानाद् यदश्नुते ॥ ७३ ॥
बहुत-सी दक्षिणाओंसे युक्त अग्निष्टोम आदि यज्ञोंद्वारा यजन करके भी मनुष्य उस फलको नहीं पाता, जो उसे भूमिदानसे मिल जाता है ॥ ७३ ॥
दाता दशानुगृह्णाति दश हन्ति तथा क्षिपन् ।
पूर्वदत्तां हरन् भूमिं नरकायोपगच्छति ॥ ७४ ॥
न ददाति प्रतिश्रुत्य दत्त्वापि च हरेत् तु यः ।
स बद्धो वारुणैः पाशैस्तप्यते मृत्युशासनात् ॥ ७५ ॥
भूमिका दान करनेवाला मनुष्य अपनी दस पीढ़ियोंका उद्धार करता है तथा देकर छीन लेनेवाला अपनी दस पीढ़ियोंको नरकमें ढकेलता है। जो पहलेकी दी हुई भूमिका अपहरण करता है वह स्वयं भी नरकमें जाता है। जो देनेकी प्रतिज्ञा करके नहीं देता है तथा जो देकर भी फिर ले लेता है वह मृत्युकी आज्ञासे वरुणके पाशमें बँधकर तरह-तरहके कष्ट भोगता है ॥ ७४ ॥
आहिताग्निं सदायज्ञं कृशवृत्तिं प्रियातिथिम् ।
ये भजन्ति द्विजश्रेष्ठं नोपसर्पन्ति ते यमम् ॥ ७६ ॥
जो प्रतिदिन अग्निहोत्र करता है, सदा यज्ञके अनुष्ठानमें लगा रहता और अतिथियोंको प्रिय मानता है तथा जिसकी जीविका-वृत्ति नष्ट हो गयी है, ऐसे श्रेष्ठ द्विजकी जो सेवा करते हैं वे यमराजके पास नहीं जाते ॥ ७६ ॥
ब्राह्मणेष्वनृणीभूतः पार्थिवः स्यात् पुरंदर ।
इतरेषां तु वर्णानां तारयेत् कृशदुर्बलान् ॥ ७७ ॥
पुरंदर! राजाको चाहिये कि वह ब्राह्मणोंके प्रति उऋण रहे अर्थात् उनकी सेवा करके उन्हें संतुष्ट रखे तथा अन्य वर्णोंमें भी जो लोग दीन-दुर्बल हों; उनका संकटसे उद्धार करे ॥ ७७ ॥
नाच्छिन्द्यात् स्पर्शितां भूमिं परेण त्रिदशाधिप ।
ब्राह्मणस्य सुरश्रेष्ठ कृशवृत्तेः कदाचन ॥ ७८ ॥

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व · पृष्ठ 592, कुल 2566 में से · BharatKosha