भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

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पृष्ठ 593

सुरश्रेष्ठ! देवेश्वर! जिसकी जीविका-वृत्ति नष्ट हो गयी है, ऐसे ब्राह्मणको दूसरेके द्वारा दानमें मिली हुई जो भूमि है, उसको कभी नहीं छीनना चाहिये ॥ ७८ ॥

यथाश्रु पतितं तेषां दीनानामथ सीदताम् । ब्राह्मणानां हृते क्षेत्रे हन्यात् त्रिपुरुषं कुलम् ॥ ७९ ॥ अपना खेत छिन जानेसे दुःखी हुए दीन ब्राह्मण जो आँसू बहाते हैं, वह छीननेवालेकी तीन पीढ़ियोंका नाश कर देता है ॥ ७९ ॥

भूमिपालं च्युतं राष्ट्राद् यस्तु संस्थापयेन्नरः । तस्य वासः सहस्राक्ष नाकपृष्ठे महीयते ॥ ८० ॥ इन्द्र! जो मनुष्य राज्यसे भ्रष्ट हुए राजाको फिर राजसिंहासनपर बैठा देता है, उसका स्वर्गलोकमें निवास होता है तथा वह वहाँ बड़ा सम्मान पाता है ॥ ८० ॥

इक्षुभिः संततां भूमिं यवगोधूमशालिनीम् । गोऽश्ववाहनपूर्णां वा बाहुवीर्यादुपार्जिताम् ॥ ८१ ॥ निधिगर्भां ददद् भूमिं सर्वरत्नपरिच्छदाम् । अक्षयाँल्लभते लोकान् भूमिसत्रं हि तस्य तत् ॥ ८२ ॥ जो भूमि गन्नेके वृक्षोंसे आच्छादित हो, जिसपर जौ और गेहूँकी खेती लहलहा रही हो अथवा जहाँ बैल और घोड़े आदि वाहन भरे हों, जिसके नीचे खजाना गड़ा हो तथा जो सब प्रकारके रत्नमय उपकरणोंसे अलंकृत हो, ऐसी भूमिको अपने बाहुबलसे जीतकर जो राजा दान कर देता है, उसे अक्षय लोक प्राप्त होते हैं। उसका वह दान भूमियज्ञ कहलाता है ॥ ८१-८२ ॥

विधूय कलुषं सर्वं विरजाः सम्मतः सताम् । लोके महीयते सद्भिर्यो ददाति वसुन्धराम् ॥ ८३ ॥ जो वसुधाका दान करता है, वह अपने सब पापोंका नाश करके निर्मल एवं सत्पुरुषोंके आदरका पात्र हो जाता है तथा लोकमें सज्जन पुरुष सदा ही उसका सत्कार करते हैं ॥ ८३ ॥

यथाप्सु पतितः शक्र तैलबिन्दुर्विसर्पति । तथा भूमिकृतं दानं सस्ये सस्ये विवर्धते ॥ ८४ ॥ इन्द्र! जैसे जलमें गिरी हुई तेलकी एक बूँद सब ओर फैल जाती है; उसी प्रकार दान की हुई भूमिमें जितना-जितना अन्न पैदा होता है, उतना-ही-उतना उसके दानका महत्त्व बढ़ता जाता है ॥ ८४ ॥

ये रणाग्रे महीपालाः शूराः समितिशोभनाः । वध्यन्तेऽभिमुखाः शक्र ब्रह्मलोकं व्रजन्ति ते ॥ ८५ ॥ देवराज! युद्धमें शोभा पानेवाले जो शूरवीर भूपाल युद्धके मुहानेपर शत्रुके सम्मुख लड़ते हुए मारे जाते हैं, वे ब्रह्मलोकमें जाते हैं ॥ ८५ ॥