महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 594, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंनृत्यगीतपरा नार्यो दिव्यमाल्यविभूषिताः । उपतिष्ठन्ति देवेन्द्र तथा भूमिप्रदं दिवि ॥ ८६ ॥ देवेन्द्र! दिव्य मालाओंसे विभूषित हो नाच और गानमें लगी हुई देवांगनाएँ स्वर्गमें भूमिदाताकी सेवामें उपस्थित होती हैं ॥ ८६ ॥ मोदते च सुखं स्वर्गे देवगन्धर्वपूजितः । यो ददाति महीं सम्यग् विधिनेह द्विजातये ॥ ८७ ॥ जो यहाँ उत्तम विधिसे ब्राह्मणको भूमिका दान करता है, वह स्वर्गमें देवताओं और गन्धर्वोंसे पूजित हो सुख और आनन्द भोगता है ॥ ८७ ॥ शतमप्सरसश्चैव दिव्यमाल्यविभूषिताः । उपतिष्ठन्ति देवेन्द्र ब्रह्मलोके धराप्रदम् ॥ ८८ ॥ देवराज! भूदान करनेवाले पुरुषकी सेवामें ब्रह्मलोकमें दिव्य मालाओंसे विभूषित सैकड़ों अप्सराएँ उपस्थित होती हैं ॥ ८८ ॥ उपतिष्ठन्ति पुण्यानि सदा भूमिप्रदं नरम् । शङ्खभद्रासनं छत्रं वराश्वा वरवाहनम् ॥ ८९ ॥ भूमिदान करनेवाले मनुष्यके यहाँ सदा पुण्यके फलस्वरूप शंख, सिंहासन, छत्र, उत्तम घोड़े और श्रेष्ठ वाहन उपस्थित होते हैं ॥ ८९ ॥ भूमिप्रदानात् पुष्पाणि हिरण्यनिचयास्तथा । आज्ञा सदाप्रतिहता जयशब्दा वसूनि च ॥ ९० ॥ भूमिदान करनेसे पुरुषको सुन्दर पुष्प, सोनेके भण्डार, कभी प्रतिहत न होनेवाली आज्ञा, जयसूचक शब्द तथा भाँति-भाँतिके धन-रत्न प्राप्त होते हैं ॥ ९० ॥ भूमिदानस्य पुण्यानि फलं स्वर्गः पुरंदर । हिरण्यपुष्पाश्चौषध्यः कुशकाञ्चनशाद्वलाः ॥ ९१ ॥ पुरंदर! भूमिदानके जो पुण्य हैं, उनके फलरूपमें स्वर्ग, सुवर्णमय फूल देनेवाली ओषधियाँ तथा सुनहरे कुश और घाससे ढकी हुई भूमि प्राप्त होती हैं ॥ ९१ ॥ अमृतप्रसवां भूमिं प्राप्नोति पुरुषो ददत् । नास्ति भूमिसमं दानं नास्ति मातृसमो गुरुः । नास्ति सत्यसमो धर्मो नास्ति दानसमो निधिः ॥ ९२ ॥ भूमिदान करनेवाला पुरुष अमृत पैदा करनेवाली भूमि पाता है, भूमिके समान कोई दान नहीं है, माताके समान कोई गुरु नहीं है, सत्यके समान कोई धर्म नहीं है और दानके समान कोई निधि नहीं है ॥ ९२ ॥
भीष्म उवाच
एतदांगिरसाच्छ्रुत्वा वासवो वसुधामिमाम् ।