महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 596, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिषष्टितमोऽध्यायः
अन्नदानका विशेष माहात्म्य
युधिष्ठिर उवाच
कानि दानानि लोकेऽस्मिन् दातुकामो महीपतिः ।
गुणाधिकेभ्यो विप्रेभ्यो दद्यात् भरतसत्तम ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतश्रेष्ठ! जिस राजाको दान करनेकी इच्छा हो, वह इस लोकमें गुणवान् ब्राह्मणोंको किन-किन वस्तुओंका दान करे? ॥ १ ॥
केन तुष्यन्ति ते सद्यः किं तुष्टाः प्रदिशन्ति च ।
शंस मे तन्महाबाहो फलं पुण्यकृतं महत् ॥ २ ॥
किस वस्तुके देनेसे ब्राह्मण तुरन्त प्रसन्न हो जाते हैं? और प्रसन्न होकर क्या देते हैं? महाबाहो! अब मुझे दानजनित महान् पुण्यका फल बताइये ॥ २ ॥
दत्तं किं फलवद् राजन्निह लोके परत्र च ।
भवतः श्रोतुमिच्छामि तन्मे विस्तरतो वद ॥ ३ ॥
राजन्! इहलोक और परलोकमें कौन-सा दान विशेष फल देनेवाला होता है? यह मैं आपके मुँहसे सुनना चाहता हूँ। आप इस विषयका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
इममर्थं पुरा पृष्टो नारदो देवदर्शनः ।
यदुक्तवानसौ वाक्यं तन्मे निगदतः शृणु ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! यही बात मैंने पहले एक बार देवदर्शी नारदजीसे पूछी थी। उस समय उन्होंने मुझसे जो कुछ कहा था, वही तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो ॥ ४ ॥
नारद उवाच
अन्नमेव प्रशंसन्ति देवा ऋषिगणास्तथा ।
लोकतन्त्रं हि संज्ञाश्च सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम् ॥ ५ ॥
नारदजीने कहा— देवता और ऋषि अन्नकी ही प्रशंसा करते हैं, अन्नसे ही लोकयात्राका निर्वाह होता है। उसीसे बुद्धिको स्फूर्ति प्राप्त होती है तथा उस अन्नमें ही सब कुछ प्रतिष्ठित है ॥ ५ ॥
अन्नेन सदृशं दानं न भूतं न भविष्यति ।
तस्मादन्नं विशेषेण दातुमिच्छन्ति मानवाः ॥ ६ ॥
अन्नके समान न कोई दान था और न होगा। इसलिये मनुष्य अधिकतर अन्नका ही दान करना चाहते हैं ॥ ६ ॥