भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 597, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 597

अन्नमूर्जस्करं लोके प्राणाश्चान्ने प्रतिष्ठिताः । अन्नेन धार्यते सर्वं विश्वं जगदिदं प्रभो ॥ ७ ॥ प्रभो! संसारमें अन्न ही शरीरके बलको बढ़ानेवाला है। अन्नके ही आधारपर प्राण टिके हुए हैं और इस सम्पूर्ण जगत्‌को अन्नने ही धारण कर रखा है ॥ ७ ॥

अन्नाद् गृहस्था लोकेऽस्मिन् भिक्षवस्तापसास्तथा । अन्नाद् भवन्ति वै प्राणाः प्रत्यक्षं नात्र संशयः ॥ ८ ॥ इस जगत्‌में गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा भिक्षा माँगनेवाले भी अन्नसे ही जीते हैं। अन्नसे ही सबके प्राणोंकी रक्षा होती है। इस बातका सबको प्रत्यक्ष अनुभव है, इसमें संशय नहीं है ॥ ८ ॥

कुटुम्बिने सीदते च ब्राह्मणाय महात्मने । दातव्यं भिक्षवे चान्नामात्मनो भूतिमिच्छता ॥ ९ ॥ अतः अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको चाहिये कि वह अन्नके लिये दुखी, बाल-बच्चोंवाले, महामनस्वी ब्राह्मणको और भिक्षा माँगनेवालेको भी अन्नदान करे ॥ ९ ॥

ब्राह्मणायाभिरूपाय यो दद्यादन्नमर्थिने । विदधाति निधिं श्रेष्ठं पारलौकिकमात्मनः ॥ १० ॥ जो याचना करनेवाले सुपात्र ब्राह्मणको अन्नदान देता है, वह परलोकमें अपने लिये एक अच्छी निधि (खजाना) बना लेता है ॥ १० ॥

श्रान्तमध्वनि वर्तन्तं वृद्धमर्हमुपस्थितम् । अर्चयेद् भूतिमन्विच्छन् गृहस्थो गृहमागतम् ॥ ११ ॥ रास्तेका थका-माँदा बूढ़ा राहगीर यदि घरपर आ जाय तो अपना कल्याण चाहनेवाले गृहस्थको उस आदरणीय अतिथिका आदर करना चाहिये ॥ ११ ॥

क्रोधमुत्पतितं हित्वा सुशीलो वीतमत्सरः । अन्नदः प्राप्नुते राजन् दिवि चेह च यत्सुखम् ॥ १२ ॥ राजन्! जो पुरुष मनमें उठे हुए क्रोधको दबाकर और ईर्ष्याको त्यागकर अच्छे शील-स्वभावका परिचय देता हुआ अन्नदान करता है, वह इहलोक और परलोकमें भी सुख पाता है ॥ १२ ॥

नावमन्येद्भिगतं न प्रणुद्यात् कदाचन । अपि श्वपाके शुनि वा न दानं विप्रणश्यति ॥ १३ ॥ अपने घरपर कोई भी आ जाय, उसका न तो कभी अपमान करना चाहिये और न उसे ताड़ना ही देनी चाहिये; क्योंकि चाण्डाल अथवा कुत्तेको भी दिया हुआ अन्नदान कभी नष्ट नहीं होता (व्यर्थ नहीं जाता) ॥ १३ ॥

यो दद्यादपरिक्लिष्टमन्नमध्वनि वर्तते । आर्तायादृष्टपूर्वाय स महद्धर्ममाप्नुयात् ॥ १४ ॥