महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 598, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो मनुष्य कष्टमें पड़े हुए अपरिचित राहीको प्रसन्नतापूर्वक अन्न देता है, उसे महान् धर्मकी प्राप्ति होती है ॥ १४ ॥
पितॄन् देवानृषीन् विप्रानतिथींश्च जनाधिप । यो नरः प्रीणयत्यन्नैस्तस्य पुण्यफलं महत् ॥ १५ ॥ नरेश्वर! जो देवताओं, पितरों, ऋषियों, ब्राह्मणों और अतिथियोंको अन्न देकर संतुष्ट करता है, उसके पुण्यका फल महान् है ॥ १५ ॥
कृत्वातिपातकं कर्म यो दद्यादन्नमर्थिने । ब्राह्मणाय विशेषेण न स पापेन मुह्यते ॥ १६ ॥ जो महान् पाप करके भी याचक मनुष्यको, उसमें भी विशेषतः ब्राह्मणको अन्न देता है, वह अपने पापके कारण मोहमें नहीं पड़ता है ॥ १६ ॥
ब्राह्मणेष्वक्षयं दानमन्नं शूद्रे महाफलम् । अन्नदानं हि शूद्रे च ब्राह्मणे च विशिष्यते ॥ १७ ॥ ब्राह्मणको अन्नका दान दिया जाय तो अक्षय फल प्राप्त होता है और शूद्रको भी देनेसे महान् फल होता है; क्योंकि अन्नका दान शूद्रको दिया जाय या ब्राह्मणको, उसका विशेष फल होता है ॥ १७ ॥
न पृच्छेद् गोत्रचरणं स्वाध्यायं देशमेव च । भिक्षितो ब्राह्मणेनेह दद्यादन्नं प्रयाचितः ॥ १८ ॥ यदि ब्राह्मण अन्नकी याचना करे तो उससे गोत्र, शाखा, वेदाध्ययन और निवासस्थान आदिका परिचय न पूछे; तुरंत ही उसकी सेवामें अन्न उपस्थित कर दे ॥ १८ ॥
अन्नदस्यान्नवृक्षाश्च सर्वकामफलप्रदाः । भवन्ति चेह चामुत्र नृपतेर्नात्र संशयः ॥ १९ ॥ जो राजा अन्नका दान करता है, उसके लिये अन्नके पौधे इहलोक और परलोकमें भी सम्पूर्ण मनोवांछित फल देनेवाले होते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ १९ ॥
आशंसन्ते हि पितरः सुवृष्टिमिव कर्षकाः । अस्माकमपि पुत्रो वा पौत्रो वान्नं प्रदास्यति ॥ २० ॥ जैसे किसान अच्छी वृष्टि मनाया करते हैं, उसी प्रकार पितर भी यह आशा लगाये रहते हैं कि कभी हमलोगोंका पुत्र या पौत्र भी हमारे लिये अन्न प्रदान करेगा ॥ २० ॥
ब्राह्मणो हि महद्भूतं स्वयं देहीति याचति । अकामो वा सकामो वा दत्त्वा पुण्यमवाप्नुयात् ॥ २१ ॥ ब्राह्मण एक महान् प्राणी है। यदि वह 'मुझे अन्न दो' इस प्रकार स्वयं अन्नकी याचना करता है तो मनुष्यको चाहिये कि सकामभावसे या निष्कामभावसे उसे अन्नदान देकर पुण्य प्राप्त करे ॥ २१ ॥
ब्राह्मणः सर्वभूतानामतिथिः प्रसृताग्रभुक् ।