महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
जो मनुष्य कष्टमें पड़े हुए अपरिचित राहीको प्रसन्नतापूर्वक अन्न देता है, उसे महान् धर्मकी प्राप्ति होती है ॥ १४ ॥
पितॄन् देवानृषीन् विप्रानतिथींश्च जनाधिप । यो नरः प्रीणयत्यन्नैस्तस्य पुण्यफलं महत् ॥ १५ ॥ नरेश्वर! जो देवताओं, पितरों, ऋषियों, ब्राह्मणों और अतिथियोंको अन्न देकर संतुष्ट करता है, उसके पुण्यका फल महान् है ॥ १५ ॥
कृत्वातिपातकं कर्म यो दद्यादन्नमर्थिने । ब्राह्मणाय विशेषेण न स पापेन मुह्यते ॥ १६ ॥ जो महान् पाप करके भी याचक मनुष्यको, उसमें भी विशेषतः ब्राह्मणको अन्न देता है, वह अपने पापके कारण मोहमें नहीं पड़ता है ॥ १६ ॥
ब्राह्मणेष्वक्षयं दानमन्नं शूद्रे महाफलम् । अन्नदानं हि शूद्रे च ब्राह्मणे च विशिष्यते ॥ १७ ॥ ब्राह्मणको अन्नका दान दिया जाय तो अक्षय फल प्राप्त होता है और शूद्रको भी देनेसे महान् फल होता है; क्योंकि अन्नका दान शूद्रको दिया जाय या ब्राह्मणको, उसका विशेष फल होता है ॥ १७ ॥
न पृच्छेद् गोत्रचरणं स्वाध्यायं देशमेव च । भिक्षितो ब्राह्मणेनेह दद्यादन्नं प्रयाचितः ॥ १८ ॥ यदि ब्राह्मण अन्नकी याचना करे तो उससे गोत्र, शाखा, वेदाध्ययन और निवासस्थान आदिका परिचय न पूछे; तुरंत ही उसकी सेवामें अन्न उपस्थित कर दे ॥ १८ ॥
अन्नदस्यान्नवृक्षाश्च सर्वकामफलप्रदाः । भवन्ति चेह चामुत्र नृपतेर्नात्र संशयः ॥ १९ ॥ जो राजा अन्नका दान करता है, उसके लिये अन्नके पौधे इहलोक और परलोकमें भी सम्पूर्ण मनोवांछित फल देनेवाले होते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ १९ ॥
आशंसन्ते हि पितरः सुवृष्टिमिव कर्षकाः । अस्माकमपि पुत्रो वा पौत्रो वान्नं प्रदास्यति ॥ २० ॥ जैसे किसान अच्छी वृष्टि मनाया करते हैं, उसी प्रकार पितर भी यह आशा लगाये रहते हैं कि कभी हमलोगोंका पुत्र या पौत्र भी हमारे लिये अन्न प्रदान करेगा ॥ २० ॥
ब्राह्मणो हि महद्भूतं स्वयं देहीति याचति । अकामो वा सकामो वा दत्त्वा पुण्यमवाप्नुयात् ॥ २१ ॥ ब्राह्मण एक महान् प्राणी है। यदि वह 'मुझे अन्न दो' इस प्रकार स्वयं अन्नकी याचना करता है तो मनुष्यको चाहिये कि सकामभावसे या निष्कामभावसे उसे अन्नदान देकर पुण्य प्राप्त करे ॥ २१ ॥
ब्राह्मणः सर्वभूतानामतिथिः प्रसृताग्रभुक् ।
विप्रा यदधिगच्छन्ति भिक्षमाणा गृहं सदा ॥ २२ ॥ सत्कृताश्च निवर्तन्ते तदतीव प्रवर्धते । महाभागे कुले प्रेत्य जन्म चाप्नोति भारत ॥ २३ ॥ भारत! ब्राह्मण सब मनुष्योंका अतिथि और सबसे पहले भोजन पानेका अधिकारी है। ब्राह्मण जिस घरपर सदा भिक्षा माँगनेके लिये जाते हैं और वहाँसे सत्कार पाकर लौटते हैं, उस घरकी सम्पत्ति अधिक बढ़ जाती है तथा उस घरका मालिक मरनेके बाद महान् सौभाग्यशाली कुलमें जन्म पाता है ॥
दत्त्वा त्वन्नं नरो लोके तथा स्थानमनुत्तमम् । नित्यं मिष्टान्नदायी तु स्वर्गे वसति सत्कृतः ॥ २४ ॥ जो मनुष्य इस लोकमें सदा अन्न, उत्तम स्थान और मिष्टान्नका दान करता है, वह देवताओंसे सम्मानित होकर स्वर्गलोकमें निवास करता है ॥ २४ ॥
अन्नं प्राणा नराणां हि सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम् । अन्नदः पशुमान् पुत्री धनवान् भोगवानपि ॥ २५ ॥ प्राणवांश्चापि भवति रूपवांश्च तथा नृप । अन्नदः प्राणदो लोके सर्वदः प्रोच्यते तु सः ॥ २६ ॥ नरेश्वर! अन्न ही मनुष्योंके प्राण हैं, अन्नमें ही सब प्रतिष्ठित है, अतः अन्न दान करनेवाला मनुष्य पशु, पुत्र, धन, भोग, बल और रूप भी प्राप्त कर लेता है। जगत्में अन्न दान करनेवाला पुरुष प्राणदाता और सर्वस्व देनेवाला कहलाता है ॥ २५-२६ ॥
अन्नं हि दत्त्वातिथये ब्राह्मणाय यथाविधि । प्रदाता सुखमाप्नोति दैवतैश्चापि पूज्यते ॥ २७ ॥ अतिथि ब्राह्मणको विधिपूर्वक अन्नदान करके दाता परलोकमें सुख पाता है और देवता भी उसका आदर करते हैं ॥ २७ ॥
ब्राह्मणो हि महद्भूतं क्षेत्रभूतं युधिष्ठिर । उप्यते तत्र यद् बीजं तद्धि पुण्यफलं महत् ॥ २८ ॥ युधिष्ठिर! ब्राह्मण महान् प्राणी एवं उत्तम क्षेत्र है। उसमें जो बीज बोया जाता है, वह महान् पुण्यफल देनेवाला होता है ॥ २८ ॥
प्रत्यक्षं प्रीतिजननं भोक्तुर्दातुर्भवत्युत । सर्वाण्यन्यानि दानानि परोक्षफलवन्त्युत ॥ २९ ॥ अन्नका दान ही एक ऐसा दान है, जो दाता और भोक्ता, दोनोंको प्रत्यक्षरूपसे संतुष्ट करनेवाला होता है। इसके सिवा अन्य जितने दान हैं, उन सबका फल परोक्ष है ॥ २९ ॥
अन्नाद्धि प्रसवं यान्ति रतिरन्नाद्धि भारत । धर्मार्थावन्नतो विद्धि रोगनाशं तथान्नतः ॥ ३० ॥
भारत! अन्नसे ही संतानकी उत्पत्ति होती है। अन्नसे ही रतिकी सिद्धि होती है। अन्नसे ही धर्म और अर्थकी सिद्धि समझो। अन्नसे ही रोगोंका नाश होता है ॥ ३० ॥
अन्नं ह्यमृतमित्याह पुराकल्पे प्रजापतिः ।
अन्नं भुवं दिवं खं च सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम् ॥ ३१ ॥
पूर्वकल्पमें प्रजापतिने अन्नको अमृत बतलाया है। भूलोक, स्वर्ग और आकाश अन्नरूप ही हैं; क्योंकि अन्न ही सबका आधार है ॥ ३१ ॥
अन्नप्रणाशे भिद्यन्ते शरीरे पञ्च धातवः ।
बलं बलवतोऽपीह प्रणश्यत्यन्नहानितः ॥ ३२ ॥
अन्नका आहार न मिलनेपर शरीरमें रहनेवाले पाँचों तत्त्व अलग-अलग हो जाते हैं। अन्नकी कमी हो जानेसे बड़े-बड़े बलवानोंका बल भी क्षीण हो जाता है ॥ ३२ ॥
आवाहाश्च विवाहाश्च यज्ञाश्चान्नंमृते तथा ।
निवर्तन्ते नरश्रेष्ठ ब्रह्म चात्र प्रलीयते ॥ ३३ ॥
निमन्त्रण, विवाह और यज्ञ भी अन्नके बिना बंद हो जाते हैं। नरश्रेष्ठ! अन्न न हो तो वेदोंका ज्ञान भी भूल जाता है ॥ ३३ ॥
अन्नतः सर्वमेतद्धि यत् किंचित् स्थाणु जंगमम् ।
त्रिषु लोकेषु धर्मार्थमन्नं देयमतो बुधैः ॥ ३४ ॥
यह जो कुछ भी स्थावर-जंगमरूप जगत् है, सब-का-सब अन्नके ही आधारपर टिका हुआ है। अतः बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि तीनों लोकोंमें धर्मके लिये अन्नका दान अवश्य करें ॥ ३४ ॥
अन्नदस्य मनुष्यस्य बलमोजो यशांसि च ।
कीर्तिश्च वर्धते शश्वत् त्रिषु लोकेषु पार्थिव ॥ ३५ ॥
पृथ्वीनाथ! अन्नदान करनेवाले मनुष्यके बल, ओज, यश और कीर्तिका तीनों लोकोंमें सदा ही विस्तार होता रहता है ॥ ३५ ॥
मेघेषूर्ध्वं संनिधत्ते प्राणानां पवनः पतिः ।
तच्च मेघगतं वारि शक्रो वर्षति भारत ॥ ३६ ॥
भारत! प्राणोंका स्वामी पवन मेघोंके ऊपर स्थित होता है और मेघमें जो जल है, उसे इन्द्र धरतीपर बरसाते हैं ॥ ३६ ॥
आदत्ते च रसान् भौमानादित्यः स्वगभस्तिभिः ।
वायुरादित्यतस्तांश्च रसान् देवः प्रवर्षति ॥ ३७ ॥
सूर्य अपनी किरणोंसे पृथ्वीके रसोंको ग्रहण करते हैं। वायुदेव सूर्यसे उन रसोंको लेकर फिर भूमिपर बरसाते हैं ॥ ३७ ॥
तद् यदा मेघतो वारि पतितं भवति क्षितौ ।
तदा वसुमती देवी स्निग्धा भवति भारत ॥ ३८ ॥
भरतनन्दन! इस प्रकार जब मेघसे पृथ्वीपर जल गिरता है, तब पृथ्वीदेवी स्निग्ध (गीली) होती है ॥ ३८ ॥
ततः सस्यानि रोहन्ति येन वर्तयते जगत् । मांसमेदोऽस्थिशुक्राणां प्रादुर्भावस्ततः पुनः ॥ ३९ ॥
फिर उस गीली धरतीसे अनाजके अंकुर उत्पन्न होते हैं, जिससे जगत्के जीवोंका निर्वाह होता है। अन्नसे ही शरीरमें मांस, मेदा, अस्थि और वीर्यका प्रादुर्भाव होता है ॥ ३९ ॥
सम्भवन्ति ततः शुक्रात् प्राणिनः पृथिवीपते । अग्नीषोमौ हि तच्छुक्रं सृजतः पुष्यतश्च ह ॥ ४० ॥
पृथिवीनाथ! उस वीर्यसे प्राणी उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार अग्नि और सोम उस वीर्यकी सृष्टि और पुष्टि करते हैं ॥ ४० ॥
एवमन्नाद्धि सूर्यश्च पवनः शुक्रमेव च । एक एव स्मृतो राशिस्ततो भूतानि जज्ञिरे ॥ ४१ ॥
इस तरह सूर्य, वायु और वीर्य एक ही राशि हैं जो अन्नसे प्रकट हुए हैं। उन्हींसे समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई है ॥ ४१ ॥
प्राणान् ददाति भूतानां तेजश्च भरतर्षभ । गृहमभ्यागतायाथ यो दद्यादन्नमर्थिने ॥ ४२ ॥
भरतश्रेष्ठ! जो घरपर आये हुए याचकको अन्न देता है, वह सब प्राणियोंको प्राण और तेजका दान करता है ॥ ४२ ॥
भीष्म उवाच
नारदेनैवमुक्तोऽहमदामन्नं सदा नृप । अनसूयुस्त्वमप्यन्नं तस्माद् देहि गतज्वरः ॥ ४३ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**नरेश्वर! जब नारदजीने मुझे इस प्रकार अन्न-दानका माहात्म्य बतलाया, तबसे मैं नित्य अन्नका दान किया करता था। अतः तुम भी दोषदृष्टि और जलन छोड़कर सदा अन्न-दान करते रहना ॥ ४३ ॥
दत्त्वान्नं विधिवद् राजन् विप्रेभ्यस्त्वमिति प्रभो । यथावदनुरूपेभ्यस्ततः स्वर्गमवाप्स्यसि ॥ ४४ ॥
राजन्! प्रभो! तुम सुयोग्य ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक अन्नका दान करके उसके पुण्यसे स्वर्गलोकको प्राप्त कर लोगे ॥ ४४ ॥
अन्नदानां हि ये लोकास्तांस्त्वं शृणु जनाधिप । भवनानि प्रकाशन्ते दिवि तेषां महात्मनाम् ॥ ४५ ॥
नरेश्वर! अन्न-दान करनेवालोंको जो लोक प्राप्त होते हैं, उनका परिचय देता हूँ, सुनो। स्वर्गमें उन महामनस्वी अन्नदाताओंके घर प्रकाशित होते रहते हैं ॥ ४५ ॥
तारासंस्थानि रूपाणि नानास्तम्भान्वितानि च।
चन्द्रमण्डलशुभ्राणि किंकिणीजालवन्ति च ॥ ४६ ॥
उन गृहोंकी आकृति तारोंके समान उज्ज्वल और अनेकानेक खम्भोंसे सुशोभित होती है। वे गृह चन्द्रमण्डलके समान उज्ज्वल प्रतीत होते हैं। उनपर छोटी-छोटी घंटियोंसे युक्त झालरें लगी हैं ॥ ४६ ॥
तरुणादित्यवर्णानि स्थावराणि चराणि च।
अनेकशतभौमानि सान्तर्जलचराणि च ॥ ४७ ॥
उनमेंसे कितने ही भवन प्रातःकालके सूर्यकी भाँति लाल प्रभासे युक्त हैं, कितने ही स्थावर हैं और कितने ही विमानोंके रूपमें विचरते रहते हैं। उनमें सैकड़ों कक्षाएँ और मंजिलें होती हैं। उन घरोंके भीतर जलचर जीवोंसहित जलाशय होते हैं ॥ ४७ ॥
वैदूर्यार्कप्रकाशानि रौप्यरुक्ममयानि च।
सर्वकामफलाश्चापि वृक्षा भवनसंस्थिताः ॥ ४८ ॥
कितने ही घर वैदूर्यमणिमय (नील) सूर्यके समान प्रकाशित होते हैं। कितने ही चाँदी और सोनेके बने हुए हैं। उन भवनोंमें अनेकानेक वृक्ष शोभा पाते हैं, जो सम्पूर्ण मनोवांछित फल देनेवाले हैं ॥ ४८ ॥
वाप्यो वीथ्यः सभाः कूपा दीर्घिकाश्चैव सर्वशः।
घोषवन्ति च यानानि युक्तान्यथ सहस्रशः ॥ ४९ ॥
उन गृहोंमें अनेक प्रकारकी बावड़ियाँ, गलियाँ, सभाभवन, कूप, तालाब और गम्भीर घोष करनेवाले सहस्रों जुते हुए रथ आदि वाहन होते हैं ॥ ४९ ॥
भक्ष्यभोज्यमयाः शैला वासांस्याभरणानि च।
क्षीरं स्रवन्ति सरितस्तथा चैवान्नपर्वताः ॥ ५० ॥
वहाँ भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंके पर्वत, वस्त्र और आभूषण हैं। वहाँकी नदियाँ दूध बहाती हैं। अन्नके पर्वतोपम ढेर लगे रहते हैं ॥ ५० ॥
प्रासादाः पाण्डुराभ्राभाः शय्याश्च काञ्चनोज्ज्वलाः।
तान्यन्नदाः प्रपद्यन्ते तस्मादन्नप्रदो भव ॥ ५१ ॥
उन भवनोंमें सफेद बादलोंके समान अट्टालिकाएँ और सुवर्णनिर्मित प्रकाशपूर्ण शय्याएँ शोभा पाती हैं। वे महल अन्नदाता पुरुषोंको प्राप्त होते हैं; इसलिये तुम भी अन्नदान करो ॥ ५१ ॥
एते लोकाः पुण्यकृता अन्नदानां महात्मनाम्।
तस्मादन्नं प्रयत्नेन दातव्यं मानवैर्भुवि ॥ ५२ ॥
ये पुण्यजनित लोक अन्नदान करनेवाले महामनस्वी पुरुषोंको प्राप्त होते हैं। अतः इस पृथ्वीपर सभी मनुष्योंको प्रयत्नपूर्वक अन्नका दान करना चाहिये ।। ५२ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अन्नदानप्रशंसायां त्रिषष्टितमोऽध्यायः ।। ६३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें अन्नदानकी प्रशंसाविषयक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६३ ।।
विभिन्न नक्षत्रोंके योगमें भिन्न-भिन्न वस्तुओंके दानका माहात्म्य
चतुःषष्टितमोऽध्यायः
विभिन्न नक्षत्रोंके योगमें भिन्न-भिन्न वस्तुओंके दानका माहात्म्य
युधिष्ठिर उवाच
श्रुतं मे भवतो वाक्यमन्नदानस्य यो विधिः ।
नक्षत्रयोगस्येदानीं दानकल्पं ब्रवीहि मे ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! मैंने आपका उपदेश सुना। अन्नदानका जो विधान है, वह ज्ञात हुआ। अब मुझे यह बताइये कि किस नक्षत्रका योग प्राप्त होनेपर किस-किस वस्तुका दान करना उत्तम है ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
देवक्याश्चैव संवादं महर्षेर्नारदस्य च ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! इस विषयमें जानकार मनुष्य देवकी देवी और महर्षि नारदके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥
द्वारकामनुसम्प्राप्तं नारदं देवदर्शनम् ।
पप्रच्छेदं वचः प्रश्नं देवकी धर्मदर्शनम् ॥ ३ ॥
एक समयकी बात है, धर्मदर्शी देवर्षि नारदजी द्वारकामें आये थे। उस समय वहाँ देवकी देवीने उनके सामने यही प्रश्न उपस्थित किया ॥ ३ ॥
तस्याः सम्पृच्छमानाया देवर्षिर्नारदस्ततः ।
आचष्ट विधिवत् सर्वं तच्छृणुष्व विशाम्पते ॥ ४ ॥
प्रजानाथ! देवकीके इस प्रकार पूछनेपर देवर्षि नारदने उस समय विधिपूर्वक सब बातें बतायीं। वे ही बातें मैं तुमसे कहता हूँ, सुनो ॥ ४ ॥
नारद उवाच
कृत्तिकासु महाभागे पायसेन ससर्पिषा ।
संतर्प्य ब्राह्मणान् साधूँल्लोकानाप्नोत्यनुत्तमान् ॥ ५ ॥
**नारदजीने कहा—**महाभागे! कृत्तिका नक्षत्र आनेपर मनुष्य घृतयुक्त खीरके द्वारा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको तृप्त करे। इससे वह सर्वोत्तम लोकोंको प्राप्त होता है ॥
रोहिण्यां प्रसृतैर्मार्गैर्मांसैरन्नेन सर्पिषा ।
पयोऽन्नपानं दातव्यमनृणार्थं द्विजातये ॥ ६ ॥
रोहिणी नक्षत्रमें पके हुए फलके गूदे, अन्न, घी, दूध तथा पीनेयोग्य पदार्थ ब्राह्मणको दान करने चाहिये। इससे उनके ऋणसे छुटकारा मिलता है ॥ ६ ॥
दोग्ध्रीं दत्त्वा सवत्सां तु नक्षत्रे सोमदैवते ।
गच्छन्ति मानुषाल्लोकात् सर्वलोकमनुत्तमम् ॥ ७ ॥
मृगशिरा नक्षत्रमें दूध देनेवाली गौका बछड़ेसहित दान करके दाता मृत्युके पश्चात् इस लोकसे सर्वोत्तम स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ ७ ॥
आर्द्रायां कृसरं दत्त्वा तिलमिश्रमुपोषितः ।
नरस्तरति दुर्गाणि क्षुरधारांश्च पर्वतान् ॥ ८ ॥
आर्द्रा नक्षत्रमें उपवासपूर्वक तिलमिश्रित खिचड़ी दान करनेवाला मनुष्य बड़े-बड़े दुर्गम संकटोंसे तथा क्षुरकी-सी धारवाले पर्वतोंसे भी पार हो जाता है ॥ ८ ॥
पूपान् पुनर्वसौ दत्त्वा तथैवान्नानि शोभने ।
यशस्वी रूपसम्पन्नो बह्वन्नो जायते कुले ॥ ९ ॥
शोभने! पुनर्वसु नक्षत्रमें पूआ और अन्न-दान करके मनुष्य उत्तम कुलमें जन्म लेता है, तथा वहाँ यशस्वी, रूपवान् एवं प्रचुर अन्नसे सम्पन्न होता है ॥ ९ ॥
पुष्येण कनकं दत्त्वा कृतं वाकृतमेव च ।
अनालोकेषु लोकेषु सोमवत् स विराजते ॥ १० ॥
पुष्य नक्षत्रमें सोनेका आभूषण अथवा केवल सोना ही दान करनेसे दाता प्रकाशशून्य लोकोंमें भी चन्द्रमाके समान प्रकाशित होता है ॥ १० ॥
आश्लेषायां तु यो रूप्यमृषभं वा प्रयच्छति ।
स सर्वभयनिर्मुक्तः सम्भवानधितिष्ठति ॥ ११ ॥
जो आश्लेषा नक्षत्रमें चाँदी अथवा बैल दान करता है, वह इस जन्ममें सब प्रकारके भयसे मुक्त हो दूसरे जन्ममें उत्तम कुलमें जन्म लेता है ॥ ११ ॥
मघासु तिलपूर्णानि वर्धमानानि मानवः ।
प्रदाय पुत्रपशुमानिह प्रेत्य च मोदते ॥ १२ ॥
जो मनुष्य मघा नक्षत्रमें तिलसे भरे हुए वर्धमान पात्रोंका दान करता है, वह इहलोकमें पुत्रों और पशुओंसे सम्पन्न हो परलोकमें भी आनन्दका भागी होता है ॥ १२ ॥
फाल्गुनीपूर्वसमये ब्राह्मणानामुपोषितः ।
भक्ष्यान् फाणितसंयुक्तान् दत्त्वा सौभाग्यमृच्छति ॥ १३ ॥
पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्रमें उपवास करके जो मनुष्य ब्राह्मणोंको मक्खनमिश्रित भक्ष्य पदार्थ देता है, वह सौभाग्यशाली होता है ॥ १३ ॥
घृतक्षीरसमायुक्तं विधिवत् षष्टिकौदनम् ।
उत्तराविषये दत्त्वा स्वर्गलोके महीयते ॥ १४ ॥
उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमें विधिपूर्वक घृत और दुग्धसे युक्त साठीके चावलके भातका दान करनेसे मनुष्य स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है ।। १४ ।।
यद् यत् प्रदीयते दानमुत्तराविषये नरैः ।
महाफलमनन्तं तद् भवतीति विनिश्चयः ।। १५ ।।
उत्तरा नक्षत्रमें मनुष्य जो-जो दान देते हैं, वह महान् फलसे युक्त एवं अनन्त होता है—यह शास्त्रोंका निश्चय है ।। १५ ।।
हस्ते हस्तिरथं दत्त्वा चतुर्युक्तमुपोषितः ।
प्राप्नोति परमाँल्लोकान् पुण्यकामसमन्वितान् ।। १६ ।।
हस्तनक्षत्रमें उपवास करके ध्वजा, पताका, चँदोवा और किंकिणीजाल—इन चार वस्तुओंसे युक्त हाथी जुते हुए रथका दान करनेवाला मनुष्य पवित्र कामनाओंसे युक्त उत्तम लोकोंमें जाता है ।। १६ ।।
चित्रायां वृषभं दत्त्वा पुण्यगन्धांश्च भारत ।
चरन्त्यप्सरसां लोके रमन्ते नन्दने तथा ।। १७ ।।
भारत! जो लोग चित्रा नक्षत्रमें वृषभ एवं पवित्र गन्धका दान करते हैं, वे अप्सराओंके लोकमें विचरते और नन्दनवनमें रमण करते हैं ।। १७ ।।
स्वात्यामथ धनं दत्त्वा यदिष्टममात्मनः ।
प्राप्नोति लोकान् स शुभानिह चैव महद् यशः ।। १८ ।।
स्वाती नक्षत्रमें अपनी अधिक-से-अधिक प्रिय वस्तुका दान करके मनुष्य शुभ लोकोंमें जाता है और इस जगत्में भी महान् यशका भागी होता है ।। १८ ।।
विशाखायामनड्वाहं धेनुं दत्त्वा च दुग्धदाम् ।
सप्रासंगं च शकटं सधान्यं वस्त्रसंयुतम् ।। १९ ।।
पितॄन् देवांश्च प्रीणाति प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते ।
न च दुर्गाण्यवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ।। २० ।।
जो विशाखा नक्षत्रमें गाड़ी ढोनेवाले बैल, दूध देनेवाली गाय, धान्य, वस्त्र और प्रासंगसहित शकट दान करता है, वह देवताओं और पितरोंको तृप्त कर देता है तथा मृत्युके पश्चात् अक्षय सुखका भागी होता है। वह जीते जी कभी संकटमें नहीं पड़ता और मरनेके बाद स्वर्गलोकमें जाता है ।। १९-२० ।।
दत्त्वा यथोक्तं विप्रेभ्यो वृत्तिमिष्टां स विन्दति ।
नरकादींश्च संक्लेशान् नाप्नोतीति विनिश्चयः ।। २१ ।।
पूर्वोक्त वस्तुओंका ब्राह्मणोंको दान करके मनुष्य इच्छित जीविका-वृत्ति पा लेता है और नरक आदिके कष्ट भी कभी नहीं भोगता। ऐसा शास्त्रोंका निश्चय है ।।
अनुराधासु प्रावारं वरान्नं समुपोषितः ।
दत्त्वा युगशतं चापि नरः स्वर्गे महीयते ।। २२ ।।
जो मनुष्य अनुराधा नक्षत्रमें उपवास करके ओढ़नेका वस्त्र और उत्तम अन्न दान करता है, वह सौ युगोंतक स्वर्गलोकमें सम्मानपूर्वक रहता है ॥ २२ ॥ कालशाकं तु विप्रेभ्यो दत्त्वा मर्त्यः समूलकम् । ज्येष्ठायामृद्धिमिष्टां वै गतिमिष्टां स गच्छति ॥ २३ ॥ जो मनुष्य ज्येष्ठा नक्षत्रमें ब्राह्मणोंको समयोचित शाक और मूली दान करता है, वह अभीष्ट समृद्धि और सद्गतिको प्राप्त होता है ॥ २३ ॥ मूले मूलफलं दत्त्वा ब्राह्मणेभ्यः समाहितः । पितॄन् प्रीणयते चापि गतिमिष्टां च गच्छति ॥ २४ ॥ मूल नक्षत्रमें एकाग्रचित्त हो ब्राह्मणोंको मूल-फल दान करनेवाला मनुष्य पितरोंको तृप्त करता और अभीष्ट गतिको पाता है ॥ २४ ॥ अथ पूर्वास्वषाढासु दधिपात्राण्युपोषितः । कुलवृत्तोपसम्पन्ने ब्राह्मणे वेदपारगे ॥ २५ ॥ पुरुषो जायते प्रेत्य कुले सुबहुगोधने । पूर्वाषाढ़ा नक्षत्रमें उपवास करके कुलीन, सदाचारी एवं वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणको दहीसे भरे हुए पात्रका दान करनेवाला मनुष्य मृत्युके पश्चात् ऐसे कुलमें जन्म लेता है, जहाँ गोधनकी अधिकता होती है ॥ उदमन्थं ससर्पिष्कं प्रभूतमधिफाणितम् । दत्त्वोत्तरास्वषाढासु सर्वकामानवाप्नुयात् ॥ २६ ॥ जो उत्तराषाढ़ा नक्षत्रमें जलपूर्ण कलशसहित सत्तूकी बनी हुई खाद्य वस्तु, घी और प्रचुर माखन दान करता है, वह सम्पूर्ण मनोवांछित भोगोंको प्राप्त कर लेता है ॥ दुग्धं त्वभिजिते योगे दत्त्वा मधुघृतप्लुतम् । धर्मनित्यो मनीषिभ्यः स्वर्गलोके महीयते ॥ २७ ॥ जो नित्य धर्मपरायण पुरुष अभिजित् नक्षत्रके योगमें मनीषी ब्राह्मणोंको मधु और घीसे युक्त दूध देता है, वह स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है ॥ २७ ॥ श्रवणे कम्बलं दत्त्वा वस्त्रान्तरितमेव वा । श्वेतेन याति यानेन स्वर्गलोकानसंवृतान् ॥ २८ ॥ जो श्रवण नक्षत्रमें वस्त्रवेष्टित कम्बल दान करता है, वह श्वेत विमानके द्वारा खुले हुए स्वर्गलोकमें जाता है ॥ गोप्रयुक्तं धनिष्ठासु यानं दत्त्वा समाहितः । वस्त्रराशिधनं सद्यः प्रेत्य राज्यं प्रपद्यते ॥ २९ ॥ जो धनिष्ठा नक्षत्रमें एकाग्रचित्त होकर बैलगाड़ी, वस्त्र-समूह तथा धन दान करता है, वह मृत्युके पश्चात् शीघ्र ही राज्य पाता है ॥ २९ ॥ गन्धान् शतभिषायोगे दत्त्वा सागुरुचन्दनान् ।
प्राप्नोत्यप्सरसां संघान् प्रेत्य गन्धांश्च शाश्वतान् ॥ ३० ॥ जो शतभिषा नक्षत्रके योगमें अगुरु और चन्दन-सहित सुगन्धित पदार्थोंका दान करता है, वह परलोकमें अप्सराओंके समुदाय तथा अक्षय गन्धको पाता है ॥ ३० ॥
पूर्वाभाद्रपदायोगे राजमाषान् प्रदाय तु । सर्वभक्षफलोपेतः स वै प्रेत्य सुखी भवेत् ॥ ३१ ॥ पूर्वाभाद्रपदा नक्षत्रके योगमें बड़ी उड़द या सफेद मटरका दान करके मनुष्य परलोकमें सब प्रकारकी खाद्य वस्तुओंसे सम्पन्न हो सुखी होता है ॥ ३१ ॥
औरभ्रमुत्तरायोगे यस्तु मांसं प्रयच्छति । स पितॄन् प्रीणयति वै प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते ॥ ३२ ॥ जो उत्तराभाद्रपदा नक्षत्रके योगमें औरभ्र फलका गूदा दान करता है, वह पितरोंको तृप्त करता और परलोकमें अक्षय सुखका भागी होता है ॥ ३२ ॥
कांस्योपदोहनां धेनुं रेवत्यां यः प्रयच्छति । सा प्रेत्य कामानादाय दातारमुपतिष्ठति ॥ ३३ ॥ जो रेवती नक्षत्रमें कांसके दुग्धपात्रसे युक्त धेनुका दान करता है वह धेनु परलोकमें सम्पूर्ण भोगोंको लेकर उस दाताकी सेवामें उपस्थित होती है ॥ ३३ ॥
रथमश्वसमायुक्तं दत्त्वाश्विन्यां नरोत्तमः । हस्त्यश्वरथसम्पन्ने वर्चस्वी जायते कुले ॥ ३४ ॥ जो नरश्रेष्ठ अश्विनी नक्षत्रमें घोड़े जुते हुए रथका दान करता है, वह हाथी, घोड़े और रथसे सम्पन्न कुलमें तेजस्वी पुत्ररूपसे जन्म लेता है ॥ ३४ ॥
भरणीषु द्विजातिभ्यस्तिलधेनुं प्रदाय वै । गाः सुप्रभूताः प्राप्नोति नरः प्रेत्य यशस्तथा ॥ ३५ ॥ जो भरणी नक्षत्रमें ब्राह्मणोंको तिलमयी धेनुका दान करता है, वह इस लोकमें बहुत-सी गौओंको तथा परलोकमें महान् यशको प्राप्त करता है ॥ ३५ ॥
भीष्म उवाच
इत्येष लक्षणोद्देशः प्रोक्तो नक्षत्रयोगतः । देवक्या नारदेनेह सा स्नुषाभ्योऽब्रवीदिदम् ॥ ३६ ॥ भीष्मजी कहते हैं—राजन्! इस प्रकार नक्षत्रोंके योगमें किये जानेवाले विविध वस्तुओंके दानका संक्षेपसे यहाँ वर्णन किया गया है। नारदजीने देवकीसे और देवकीजीने अपनी पुत्रवधुओंसे यह विषय सुनाया था ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि नक्षत्रयोगदानं नाम चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें नक्षत्रयोग सम्बन्धी दान नामक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६४ ॥
अध्याय (पृष्ठ 610)
पञ्चषष्टितमोऽध्यायः
सुवर्ण और जल आदि विभिन्न वस्तुओंके दानकी महिमा
भीष्म उवाच
सर्वान् कामान् प्रयच्छन्ति ये प्रयच्छन्ति काञ्चनम् ।
इत्येवं भगवानत्रिः पितामहसुतोऽब्रवीत् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! ब्रह्माजीके पुत्र भगवान् अत्रिका प्राचीन वचन है कि 'जो सुवर्णका दान करते हैं, वे मानो याचककी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण कर देते हैं' ॥ १ ॥
पवित्रमथ चायुष्यं पितॄणामक्षयं च तत् ।
सुवर्णं मनुजेन्द्रेण हरिश्चन्द्रेण कीर्तितम् ॥ २ ॥
राजा हरिश्चन्द्रने कहा है कि 'सुवर्ण परम पवित्र, आयु बढ़ानेवाला और पितरोंको अक्षय गति प्रदान करनेवाला है' ॥ २ ॥
पानीयं परमं दानं दानानां मनुरब्रवीत् ।
तस्मात् कूपांश्च वापींश्च तडागानि च खानयेत् ॥ ३ ॥
मनुजीने कहा है कि 'जलका दान सब दानोंसे बढ़कर है।' इसलिये कुएँ, बावड़ी और पोखरे खुदवाने चाहिये ॥ ३ ॥
अर्धं पापस्य हरति पुरुषस्येह कर्मणः ।
कूपः प्रवृत्तपानीयः सुप्रवृत्तश्च नित्यशः ॥ ४ ॥
जिसके खुदवाये हुए कुएँमें अच्छी तरह पानी निकलकर यहाँ सदा सब लोगोंके उपयोगमें आता है, वह उस मनुष्यके पापकर्मका आधा भाग हर लेता है ॥ ४ ॥
सर्वं तारयते वंशं यस्य खाते जलाशये ।
गावः पिबन्ति विप्राश्च साधवश्च नराः सदा ॥ ५ ॥
जिसके खोदवाये हुए जलाशयमें गौ, ब्राह्मण तथा श्रेष्ठ पुरुष सदा जल पीते हैं, वह जलाशय उस मनुष्यके समूचे कुलका उद्धार कर देता है ॥ ५ ॥
निदाघकाले पानीयं यस्य तिष्ठत्यवारितम् ।
स दुर्गं विषमं कृत्स्नं न कदाचिदवाप्नुते ॥ ६ ॥
जिसके बनवाये हुए तालाबमें गरमीके दिनोंमें भी पानी मौजूद रहता है, कभी घटता नहीं है, वह पुरुष कभी अत्यन्त विषम संकटमें नहीं पड़ता ॥ ६ ॥
बृहस्पतेर्भगवतः पूष्णश्चैव भगस्य च ।
अश्विनोश्चैव वह्नेश्च प्रीतिर्भवति सर्पिषा ॥ ७ ॥
घी दान करनेसे भगवान् बृहस्पति, पूषा, भग, अश्विनीकुमार और अग्निदेव प्रसन्न होते हैं ॥ ७ ॥
परमं भेषजं ह्येतद् यज्ञानामेतदुत्तमम् । रसानामुत्तमं चैतत् फलानां चैतदुत्तमम् ॥ ८ ॥ घी सबसे उत्तम औषध और यज्ञ करनेकी सर्वश्रेष्ठ वस्तु है। वह रसोंमें उत्तम रस है और फलोंमें सर्वोत्तम फल है ॥ ८ ॥
फलकामो यशस्कामः पुष्टिकामश्च नित्यदा । घृतं दद्याद् द्विजातिभ्यः पुरुषः शुचिरात्मवान् ॥ ९ ॥ जो सदा फल, यश और पुष्टि चाहता हो वह पुरुष पवित्र हो मनको वशमें करके द्विजातियोंको घृत दान करे ॥ ९ ॥
घृतं मासे आश्वयुजि विप्रेभ्यो यः प्रयच्छति । तस्मै प्रयच्छतो रूपं प्रीतौ देवाविहाश्विनौ ॥ १० ॥ जो आश्विन मासमें ब्राह्मणोंको घृत दान करता है, उसपर देववैद्य अश्विनीकुमार प्रसन्न होकर यहाँ उसे रूप प्रदान करते हैं ॥ १० ॥
पायसं सर्पिषा मिश्रं द्विजेभ्यो यः प्रयच्छति । गृहं तस्य न रक्षांसि धर्षयन्ति कदाचन ॥ ११ ॥ जो ब्राह्मणोंको घृतमिश्रित खीर देता है, उसके घरपर कभी राक्षसोंका आक्रमण नहीं होता ॥ ११ ॥
पिपासया न म्रियते सोपच्छन्दश्च जायते । न प्राप्नुयाच्च व्यसनं करकान् यः प्रयच्छति ॥ १२ ॥ जो पानीसे भरा हुआ कमण्डलु दान करता है, वह कभी प्याससे नहीं मरता। उसके पास सब प्रकारकी आवश्यक सामग्री मौजूद रहती है और वह संकटमें नहीं पड़ता ॥ १२ ॥
प्रयतो ब्राह्मणाग्रे यः श्रद्धया परया युतः । उपस्पर्शनषड्भागं लभते पुरुषः सदा ॥ १३ ॥ जो पुरुष सदा एकाग्रचित्त हो ब्राह्मणके आगे बड़ी श्रद्धाके साथ विनययुक्त व्यवहार करता है, वह पुरुष सदा दानके छठे भागका पुण्य प्राप्त कर लेता है ॥ १३ ॥
यः साधनार्थं काष्ठानि ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छति । प्रतापनार्थं राजेन्द्र वृत्तवद्द्भ्यः सदा नरः ॥ १४ ॥ सिद्ध्यन्त्यर्थाः सदा तस्य कार्याणि विविधानि च । उपर्युपरि शत्रूणां वपुषा दीप्यते च सः ॥ १५ ॥ राजेन्द्र! जो मनुष्य सदाचारसम्पन्न ब्राह्मणोंको भोजन बनाने और तापनेके लिये सदा लकड़ियाँ देता है, उसकी सभी कामनाएँ तथा नाना प्रकारके कार्य सदा ही सिद्ध होते रहते हैं और वह शत्रुओंके ऊपर-ऊपर रहकर अपने तेजस्वी शरीरसे देदीप्यमान होता है ॥ १४-१५ ॥
भगवांश्चापि सम्प्रीतो वह्निर्भवति नित्यशः ।
न तं त्यजन्ति पशवः संग्रामे च जयत्यपि ॥ १६ ॥
इतना ही नहीं, उसके ऊपर सदा भगवान् अग्निदेव प्रसन्न रहते हैं। उसके पशुओंकी हानि नहीं होती तथा वह संग्राममें विजयी होता है ॥ १६ ॥
पुत्राञ्छ्रियं च लभते यश्छत्रं सम्प्रयच्छति ।
न चक्षुर्व्याधिं लभते यज्ञभागमथाश्नुते ॥ १७ ॥
जो पुरुष छाता दान करता है उसे पुत्र और लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। उसके नेत्रमें कोई रोग नहीं होता और उसे सदा यज्ञका भाग मिलता है ॥ १७ ॥
निदाघकाले वर्षे वा यश्छत्रं सम्प्रयच्छति ।
नास्य कश्चिन्मनोदाहः कदाचिदपि जायते ।
कृच्छ्रात् स विषमाच्चैव क्षिप्रं मोक्षमवाप्नुते ॥ १८ ॥
जो गर्मी और बरसातके महीनोंमें छाता दान करता है, उसके मनमें कभी संताप नहीं होता। वह कठिन-से-कठिन संकटसे शीघ्र ही छुटकारा पा जाता है ॥ १८ ॥
प्रदानं सर्वदानानां शकटस्य विशाम्पते ।
एवमाह महाभागः शाण्डिल्यो भगवानृषिः ॥ १९ ॥
प्रजानाथ! महाभाग भगवान् शाण्डिल्य ऋषि ऐसा कहते हैं कि 'शकट (बैलगाड़ी) का दान उपर्युक्त सब दानोंके बराबर है' ॥ १९ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६५ ॥
जूता, शकट, तिल, भूमि, गौ और अन्नके दानका माहात्म्य
षट्षष्टितमोऽध्यायः
जूता, शकट, तिल, भूमि, गौ और अन्नके दानका माहात्म्य
युधिष्ठिर उवाच
दह्यमानाय विप्राय यः प्रयच्छत्युपानहौ ।
यत् फलं तस्य भवति तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! गर्मीके दिनोंमें जिसके पैर जल रहे हों, ऐसे ब्राह्मणको जो जूते पहनाता है, उसको जो फल मिलता है, वह मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
उपानहौ प्रयच्छेद् यो ब्राह्मणेभ्यः समाहितः ।
मर्दते कण्टकान् सर्वान् विषमान्निस्तरत्यपि ॥ २ ॥
स शत्रूणामुपरि च संतिष्ठति युधिष्ठिर ।
यानं चाश्वतरीयुक्तं तस्य शुभ्रं विशाम्पते ॥ ३ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! जो एकाग्रचित्त होकर ब्राह्मणोंके लिये जूते दान करता है, वह सब कण्टकोंको मसल डालता है और कठिन विपत्तिसे भी पार हो जाता है। इतना ही नहीं, वह शत्रुओंके ऊपर विराजमान होता है। प्रजानाथ! उसे जन्मान्तरमें खच्चरियोंसे जुता हुआ उज्ज्वल रथ प्राप्त होता है ॥ २-३ ॥
उपतिष्ठति कौन्तेय रौप्यकाञ्चनभूषितम् ।
शकटं दम्यसंयुक्तं दत्तं भवति चैव हि ॥ ४ ॥
कुन्तीकुमार! जो नये बैलोंसे युक्त शकट दान करता है, उसे चाँदी और सोनेसे जटित रथ प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
युधिष्ठिर उवाच
यत् फलं तिलदाने च भूमिदाने च कीर्तितम् ।
गोदाने चान्नदाने च भूयस्तद् ब्रूहि कौरव ॥ ५ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— कुरुनन्दन! तिल, भूमि, गौ और अन्नका दान करनेसे क्या फल मिलता है? इसका फिरसे वर्णन कीजिये ॥ ५ ॥
भीष्म उवाच
शृणुष्व मम कौन्तेय तिलदानस्य यत् फलम् ।
निशम्य च यथान्यायं प्रयच्छ कुरुसत्तम ॥ ६ ॥
**भीष्मजीने कहा—**कुन्तीनन्दन! कुरुश्रेष्ठ! तिलदानका जो फल है, वह मुझसे सुनो और सुनकर यथोचित रूपसे उसका दान करो ॥ ६ ॥
पितॄणां परमं भोज्यं तिलाः सृष्टाः स्वयम्भुवा ।
तिलदानेन वै तस्मात् पितृपक्षः प्रमोदते ॥ ७ ॥
ब्रह्माजीने जो तिल उत्पन्न किये हैं, वे पितरोंके सर्वश्रेष्ठ खाद्य पदार्थ हैं। इसलिये तिल दान करनेसे पितरोंको बड़ी प्रसन्नता होती है ॥ ७ ॥
माघमासे तिलान् यस्तु ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छति ।
सर्वसत्त्वसमाकीर्णं नरकं स न पश्यति ॥ ८ ॥
जो माघ मासमें ब्राह्मणोंको तिल दान करता है, वह समस्त जन्तुओंसे भरे हुए नरकका दर्शन नहीं करता ॥ ८ ॥
सर्वसत्रैश्च यजते यस्तिलैर्यजते पितॄन् ।
न चाकामेन दातव्यं तिलश्राद्धं कदाचन ॥ ९ ॥
जो तिलोंके द्वारा पितरोंका पूजन करता है, वह मानो सम्पूर्ण यज्ञोंका अनुष्ठान कर लेता है। तिल-श्राद्ध कभी निष्काम पुरुषको नहीं करना चाहिये ॥ ९ ॥
महर्षेः कश्यपस्यैते गात्रेभ्यः प्रसृतास्तिलाः ।
ततो दिव्यं गता भावं प्रदानेषु तिलाः प्रभो ॥ १० ॥
प्रभो! ये तिल महर्षि कश्यपके अंगोंसे प्रकट होकर विस्तारको प्राप्त हुए हैं; इसलिये दानके निमित्त इनमें दिव्यता आ गयी है ॥ १० ॥
पौष्टिका रूपदाश्चैव तथा पापविनाशनाः ।
तस्मात् सर्वप्रदानेभ्यस्तिलदानं विशिष्यते ॥ ११ ॥
तिल पौष्टिक पदार्थ है। वे सुन्दर रूप देनेवाले और पापनाशक हैं। इसलिये तिल-दान सब दानोंसे बढ़कर है ॥ ११ ॥
आपस्तम्बश्च मेधावी शङ्खश्च लिखितस्तथा ।
महर्षिर्गौतमश्चापि तिलदानैर्दिवं गताः ॥ १२ ॥
परम बुद्धिमान् महर्षि आपस्तम्ब, शंख, लिखित तथा गौतम—ये तिलोंका दान करके दिव्यलोकको प्राप्त हुए हैं ॥ १२ ॥
तिलहोमरता विप्राः सर्वे संयतमैथुनाः ।
समा गव्येन हविषा प्रवृत्तिषु च संस्थिताः ॥ १३ ॥
वे सभी ब्राह्मण स्त्री-समागमसे दूर रहकर तिलोंका हवन किया करते थे, तिल गोघृतके समान हविके योग्य माने गये हैं, इसलिये यज्ञोंमें गृहीत होते हैं एवं हरेक कर्मोंमें उनकी आवश्यकता है ॥ १३ ॥
सर्वेषामिति दानानां तिलदानं विशिष्यते ।
अक्षयं सर्वदानानां तिलदानमिहोच्यते ॥ १४ ॥
अतः तिलदान सब दानोंसे बढ़कर है। तिलदान यहाँ सब दानोंमें अक्षय फल देनेवाला बताया जाता है।। उच्छिन्ने तु पुरा हव्ये कुशिकर्षिः परंतपः। तिलैरग्नित्रयं हुत्वा प्राप्तवान् गतिमुत्तमाम्॥ १५॥ पूर्वकालमें परंतप राजर्षि कुशिकने हविष्य समाप्त हो जानेपर तिलोंसे ही हवन करके तीनों अग्नियोंको तृप्त किया था; इससे उन्हें उत्तम गति प्राप्त हुई॥ १५॥ इति प्रोक्तं कुरुश्रेष्ठ तिलदानमनुत्तमम्। विधानं येन विधिना तिलानामिह शस्यते॥ १६॥ कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार जिस विधिके अनुसार तिलदान करना उत्तम माना गया है, वह सर्वोत्तम तिलदानका विधान यहाँ बताया गया॥ १६॥ अत ऊर्ध्वं निबोधेदं देवानां यष्टुमिच्छताम्। समागमे महाराज ब्रह्मणा वै स्वयम्भुवा॥ १७॥ महाराज! इसके बाद यज्ञकी इच्छावाले देवताओं और स्वयम्भू ब्रह्माजीका समागम होनेपर उनमें परस्पर जो बातचीत हुई थी, उसे बता रहा हूँ, इसपर ध्यान दो॥ देवाः समेत्य ब्रह्माणं भूमिभागे यियक्षवः। शुभं देशमयाचन्त यजेम इति पार्थिव॥ १८॥ पृथ्वीनाथ! भूतलके किसी भागमें यज्ञ करनेकी इच्छावाले देवता ब्रह्माजीके पास जाकर किसी शुभ देशकी याचना करने लगे, जहाँ यज्ञ कर सकें॥ १८॥
देवा ऊचुः भगवंस्त्वं प्रभुर्भूमेः सर्वस्य त्रिदिवस्य च। यजेमहि महाभाग यज्ञं भवदनुज्ञया॥ १९॥ **देवता बोले—**भगवन्! महाभाग! आप पृथ्वी और सम्पूर्ण स्वर्गके भी स्वामी हैं; अतः हम आपकी आज्ञा लेकर पृथ्वीपर यज्ञ करेंगे॥ १९॥ नाननुज्ञातभूमिर्हि यज्ञस्य फलमश्नुते। त्वं हि सर्वस्य जगतः स्थावरस्य चरस्य च॥ २०॥ प्रभुर्भवसि तस्मात्त्वं समनुज्ञातुमर्हसि। क्योंकि भूस्वामी जिस भूमिपर यज्ञ करनेकी अनुमति नहीं देता, उस भूमिपर यदि यज्ञ किया जाय तो उसका फल नहीं होता। आप सम्पूर्ण चराचर जगत्के स्वामी हैं; अतः पृथ्वीपर यज्ञ करनेके लिये हमें आज्ञा दीजिये॥
ब्रह्मोवाच ददानि मेदिनीभागं भवद्भ्योऽहं सुरर्षभाः॥ २१॥ यस्मिन् देशे करिष्यध्वं यज्ञान् काश्यपनन्दनाः।
ब्रह्माजीने कहा—काश्यपनन्दन सुरश्रेष्ठगण! तुमलोग पृथ्वीके जिस प्रदेशमें यज्ञ करोगे, वही भूभाग मैं तुम्हें दे रहा हूँ॥ २१ १/२॥
देवा ऊचुः
भगवन् कृतकार्याः स्म यक्ष्महे स्वाप्तदक्षिणैः॥ २२॥
इमं तु देशं मुनयः पर्युपासन्ति नित्यदा।
देवताओंने कहा—भगवन्! हमारा कार्य हो गया। अब हम पर्याप्त दक्षिणावाले यज्ञपुरुषका यजन करेंगे। यह जो हिमालयके पासका प्रदेश है, इसका ऋषि-मुनि सदासे ही आश्रय लेते हैं (अतः हमारा यज्ञ भी यहीं होगा)॥
ततोऽगस्त्यश्च कण्वश्च भृगुरत्रिर्वृषाकपिः॥ २३॥
असितो देवलश्चैव देवयज्ञमुपागमन्।
ततो देवा महात्मान ईजिरे यज्ञमच्युतम्॥ २४॥
तथा समापयामासुर्यथाकालं सुरर्षभाः।
तदनन्तर अगस्त्य, कण्व, भृगु, अत्रि, वृषाकपि, असित और देवल देवताओंके उस यज्ञमें उपस्थित हुए। तब महामनस्वी देवताओंने यज्ञपुरुष अच्युतका यजन आरम्भ किया और उन श्रेष्ठ देवगणोंने यथासमय उस यज्ञको समाप्त भी कर दिया॥ २३-२४ १/२॥
त इष्ट्वाज्ञास्त्रिदशा हिमवत्यचलोत्तमे॥ २५॥
षष्ठमंशं क्रतोस्तस्य भूमिदानं प्रचक्रिरे।
पर्वतराज हिमालयके पास यज्ञ पूरा करके देवताओंने भूमिदान भी किया, जो उस यज्ञके छठे भागके बराबर पुण्यका जनक था॥ २५ १/२॥
प्रादेशमात्रं भूमेस्तु यो दद्यादनुपस्कृतम्॥ २६॥
न सीदति स कृच्छ्रेषु न च दुर्गाण्यवाप्नुते।
जिसको खोदखादकर खराब न कर दिया गया हो, ऐसे प्रादेशमात्र भूभागका भी जो दान करता है, वह न तो कभी दुर्गम संकटोंमें पड़ता है और न पड़नेपर कभी दुःखी ही होता है॥ २६ १/२॥
शीतवातातपसहां गृहभूमिं सुसंस्कृताम्॥ २७॥
प्रदाय सुरलोकस्थः पुण्यान्तेऽपि न चाल्यते।
जो सर्दी, गर्मी और हवाके वेगको सहन करनेयोग्य सजी-सजायी गृह-भूमि दान करता है, वह देवलोकमें निवास करता है। पुण्यका भोग समाप्त होनेपर भी वहाँसे हटाया नहीं जाता॥ २७ १/२॥
मुदितो वसति प्राज्ञः शक्रेण सह पार्थिव॥ २८॥
प्रतिश्रयप्रदानाच्च सोऽपि स्वर्गे महीयते।
पृथ्वीनाथ! जो विद्वान् गृहदान करता है, वह भी उसके पुण्यसे इन्द्रके साथ आनन्दपूर्वक निवास करता और स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है ॥ २८ १/२ ॥
अध्यापककुले जातः श्रोत्रियो नियतेन्द्रियः ॥ २९ ॥
गृहे यस्य वसेत् तुष्टः प्रधानं लोकमश्नुते ।
अध्यापक-वंशमें उत्पन्न श्रोत्रिय एवं जितेन्द्रिय ब्राह्मण जिसके दिये हुए घरमें प्रसन्नतासे रहता है, उसे श्रेष्ठ लोक प्राप्त होते हैं ॥ २९ १/२ ॥
तथा गवार्थं शरणं शीतवर्षसहं दृढम् ॥ ३० ॥
आसप्तमं तारयति कुलं भरतसत्तम ।
भरतश्रेष्ठ! जो गौओंके लिये सर्दी और वर्षासे बचानेवाला सुदृढ़ निवासस्थान बनवाता है, वह अपनी सात पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है ॥ ३० १/२ ॥
क्षेत्रभूमिं ददल्लोके शुभां श्रियमवाप्नुयात् ॥ ३१ ॥
रत्नभूमिं प्रदद्यात् तु कुलवंशं प्रवर्धयेत् ।
खेतके योग्य भूमि दान करनेवाला मनुष्य जगत्में शुभ सम्पत्ति प्राप्त करता है और जो रत्नयुक्त भूमिक दान करता है, वह अपने कुलकी वंश-परम्पराको बढ़ाता है ॥ ३१ १/२ ॥
न चोषरां न निर्दग्धां महीं दद्यात् कथंचन ॥ ३२ ॥
न श्मशानपरीतां च न च पापनिषेविताम् ।
जो भूमि ऊसर, जली हुई और श्मशानके निकट हो तथा जहाँ पापी पुरुष निवास करते हों, उसे ब्राह्मणको नहीं देना चाहिये ॥ ३२ १/२ ॥
पारक्ये भूमिदेशे तु पितॄणां निर्वपेत् तु यः ॥ ३३ ॥
तद्भूमिं वापि पितृभिः श्राद्धकर्म विहन्यते ।
जो परायी भूमिमें पितरोंके लिये श्राद्ध करता है, अथवा जो उस भूमिको पितरोंके लिये दानमें देता है, उसके वे श्राद्धकर्म और दान दोनों ही नष्ट होते (निष्फल हो जाते) हैं ॥ ३३ १/२ ॥
तस्मात् क्रीत्वा महीं दद्यात् स्वल्पामपि विचक्षणः ॥ ३४ ॥
पिण्डः पितृभ्यो दत्तो वै तस्यां भवति शाश्वतः ।
अतः विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह थोड़ी-सी भी भूमि खरीदकर उसका दान करे। खरीदकर अपनी की हुई भूमिमें ही पितरोंको दिया हुआ पिण्ड सदा स्थिर रहनेवाला होता है ॥ ३४ १/२ ॥
अटवीपर्वताश्चैव नद्यस्तीर्थानि यानि च ॥ ३५ ॥
सर्वाण्यस्वामिकान्याहुर्न हि तत्र परिग्रहः ।
इत्येतद् भूमिदानस्य फलमुक्तं विशाम्पते ॥ ३६ ॥