भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 612, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 612

भगवांश्चापि सम्प्रीतो वह्निर्भवति नित्यशः ।
न तं त्यजन्ति पशवः संग्रामे च जयत्यपि ॥ १६ ॥
इतना ही नहीं, उसके ऊपर सदा भगवान् अग्निदेव प्रसन्न रहते हैं। उसके पशुओंकी हानि नहीं होती तथा वह संग्राममें विजयी होता है ॥ १६ ॥

पुत्राञ्छ्रियं च लभते यश्छत्रं सम्प्रयच्छति ।
न चक्षुर्व्याधिं लभते यज्ञभागमथाश्नुते ॥ १७ ॥
जो पुरुष छाता दान करता है उसे पुत्र और लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। उसके नेत्रमें कोई रोग नहीं होता और उसे सदा यज्ञका भाग मिलता है ॥ १७ ॥

निदाघकाले वर्षे वा यश्छत्रं सम्प्रयच्छति ।
नास्य कश्चिन्मनोदाहः कदाचिदपि जायते ।
कृच्छ्रात् स विषमाच्चैव क्षिप्रं मोक्षमवाप्नुते ॥ १८ ॥
जो गर्मी और बरसातके महीनोंमें छाता दान करता है, उसके मनमें कभी संताप नहीं होता। वह कठिन-से-कठिन संकटसे शीघ्र ही छुटकारा पा जाता है ॥ १८ ॥

प्रदानं सर्वदानानां शकटस्य विशाम्पते ।
एवमाह महाभागः शाण्डिल्यो भगवानृषिः ॥ १९ ॥
प्रजानाथ! महाभाग भगवान् शाण्डिल्य ऋषि ऐसा कहते हैं कि 'शकट (बैलगाड़ी) का दान उपर्युक्त सब दानोंके बराबर है' ॥ १९ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६५ ॥